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अलर्ट: कोरोना संक्रामितों में देखे जा रहे हैं दो तरह के ब्लैक फंगस, आंख के अलावा इन अंगों को भी हो सकता है नुकसान

Tue, 01 Jun 2021 11:48 AM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला
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म्यूकोरमाइकोसिस के मामले (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : istock
Medically reviewed by-
डॉ आशीष जैन
वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ

डॉ हार्दिक शाह
ईएनटी विशेषज्ञ, अहमदाबाद


देश में कोरोना के कम होते आंकड़ों के बीच ऐसा लगने लगा था कि जिंदगी दोबारा सामान्य होने जा रही है। इसी दौरान म्यूकोरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) के मामलों ने लोगों में एक अलग तरह के भय और अराजकता की स्थिति  पैदा कर दी। सामान्यतौर पर कमजोर इम्यूनिटी और हाई ब्लड शुगर वाले कोरोना के मरीजों में म्यूकोरमाइकोसिस के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना के रोगियों में पिछले दिनों दो तरह के म्यूकोरमाइकोसिस के मामले देखने को मिले हैं।
आइए स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर इस लेख में ब्लैक फंगस के इन दोनों प्रकार के बारे में विस्तार से जानते हैं।
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म्यूकोर्मिसेट्स फैला रहे हैं ब्लैक फंगस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social media
म्यूकोरमाइकोसिस क्या है?
कोविड-19 के रोगियों में देखे जा रहे म्यूकोरमाइकोसिस के दोनों प्रकारों के बारे में जानने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आखिर म्यूकोरमाइकोसिस क्या है? वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ आशीष जैन बताते हैं कि ब्लैक फंगस संक्रमण एक गंभीर स्थिति है जो म्यूकोर्मिसेट्स नामक मोल्ड्स के समूह के कारण होती है। यह फंगस हमारे आसपास पाया जाता है, हालांकि इंसान की प्रतिरोधक क्षमता इसे हमारे ऊपर हावी नहीं होने देती है। यही कारण है कि ब्लैक संक्रमण के मामले ज्यादा चर्चा में नहीं रहे हैं, कोरोना के कारण कमजोर हुई इम्यूनिटी ने इस फंगस को बढ़ने का मौका दे दिया है।
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अनियंत्रित ब्लड शुगर वाले लोगों के लिए ज्यादा खतरा - फोटो : iStock
कोरोना के मरीजों में क्यों बढ़ रहे हैं ब्लैक फंगस के मामले?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीजों (जैसे अनियंत्रित ब्लड शुगर, इम्यूनोसप्रेसिव दवाइयों का सेवन करने वाले और कैंसर रोगियों) में इस संक्रमण के मामले पहले भी देखे जाते रहे हैं। हालांकि कोरोना के समय में इसमें अचानक से उछाल देखने को मिला है। कोविड-19 के इलाज के दौरान बहुत ज्यादा स्टेरॉयड दवाओं का सेवन करने, ह्यूमिडिफायर में अस्वच्छ पानी के प्रयोग और औद्योगिक ऑक्सीजन के उपयोग के चलते कोरोना को मरीजों में ब्लैक फंगस के मामले देखने को मिल रहे हैं।

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दो तरह के म्यूकोरमाइकोसिस के मामले सामने आए (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
ईएनटी विशेषज्ञ डॉ हार्दिक शाह के मुताबिक पर्यावरण में मौजूद कई प्रकार के कवकों के कारण म्यूकोरमाइकोसिस की समस्या हो सकती है। कोविड-19 मरीजों के संदर्भ में बात करें तो फिलहाल उनमें दो तरह के म्यूकोरमाइकोसिस के मामले देखे जा रहे हैं-
  • पहला-राइनो-ऑर्बिटो-सेरेब्रल म्यूकोरमाइकोसिस (आरओसीएम)
  • दूसरा- पल्मोनरी म्यूकोरमाइकोसिस।
आइए दोनों के बारे में जानते हैं।
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नाक, आंखों और मस्तिष्क में संक्रमण हो सकता है ब्लैक फंगस संक्रमण - फोटो : Social media
राइनो-ऑर्बिटो-सेरेब्रल म्यूकोरमाइकोसिस (आरओसीएम)
डॉक्टरों के अनुसार आरओसीएम के कारण लोगों के नाक, आंखों और मस्तिष्क में संक्रमण हो सकता है। यह संक्रमण नाक से शुरू होकर साइनस मार्ग से होते हुए आंख और मस्तिष्क तक पहुंच जाता है। आरओसीएम से संक्रमित लोगों को मुख्यरूप से बंद नाक, नाक से असामान्य स्राव, चेहरे पर सूजन, दर्द और सुन्नता, आंखों में लालिमा जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। इसके अलावा रोगियों को गंभीर सिरदर्द, आंखों में दर्द, धुंधला दिखाई देने और कुछ मामले में आंशिक अंधेपन की समस्या भी हो सकती है।
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पल्मोनरी म्यूकोरमाइकोसिस फेफड़ों को पहुंचाता है नुकसान - फोटो : iStock
पल्मोनरी म्यूकोरमाइकोसिस
पल्मोनरी म्यूकोरमाइकोसिस मुख्य रूप से उन लोगों को प्रभावित करता है जो इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड होते हैं, यानी कि जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है। आरओसीएम के विपरीत यह फेफड़ों और श्वसन प्रणाली को ज्यादा प्रभावित करता है। पल्मोनरी म्यूकोरमाइकोसिस की समस्या वाले लोगों को बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ और सीने में दर्द जैसे लक्षणों का अनुभव हो सकता है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है वैसे लोगों को प्ल्यूरल इफ्यूजन (फेफड़ों के बाहर असामान्य मात्रा में द्रव इकट्ठा होना) की समस्या हो सकती है। समय पर इस स्थिति का इलाज बेहद आवश्यक हो जाता है।

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नोट: यह लेख वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ आशीष जैन और अहमदाबाद में ईएनटी विशेषज्ञ डॉ हार्दिक शाह से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें तथा किसी भी दवा का सेवन बिना डॉक्टरी सलाह के न करें।
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