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Study: बढ़ रहे हैं प्री-टर्म बर्थ के मामले, मां-बच्चे दोनों को खतरा, इन कारणों को पाया गया जिम्मेदार

Sun, 04 Dec 2022 02:33 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्री टर्म बर्थ के बढ़े मामले - फोटो : Pixabay
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने हालिया रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर समय पर पहले बच्चों के जन्म को लेकर चिंता जताई है। प्री-टर्म बर्थ यानी 37 सप्ताह से पहले बच्चे का जन्म कई प्रकार की शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि इससे बच्चे के साथ मां की सेहत को भी नुकसान पहुंचता है। यूएस सहित दुनिया के कई देशों में इस तरह के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक साल 2007 के बाद 2021 में यह आंकड़ा सबसे अधिक दर्ज किया गया। यूएस में ही 3.83 लाख से अधिक बच्चों का जन्म समय से पहले हुआ। स्वास्थ्य विशेष कहते हैं, यह स्थिति कई मामलों में बहुत खतरनाक हो सकती है।

आंकड़ों के मुताबिक 2021 में अमेरिका में जन्मे लगभग 10.5%  बच्चे समय से पहले पैदा हुए थे। इससे पहले साल 2020 में यह आंकड़ा 10.1 फीसदी के करीब का था। भारत में आंकड़ों पर नजर डालें तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पाया कि यहां जन्म लेने वाले पांच में से एक बच्चे का जन्म समय से पहले हो रहा है। इस तरह के जोखिमों से बचाव करना बहुत आवश्यक है। आइए जानते हैं कि समय से पहले जन्म के मामले क्यों बढ़ रहे हैं और इससे सेहत को किस प्रकार से नुकसान हो सकता है?
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समय से पहले बच्चों के जन्म के मामले - फोटो : istock
अध्ययन में क्या पता चला?

इस सप्ताह जारी की गई रिपोर्ट में शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि श्वेत और अश्वेत, दोनों प्रकार की महिलाओं से जन्म लेने वाले बच्चों में यह समस्या देखी जा रही है। विशेषज्ञों ने पाया कि समय से पहले प्रसव से संबंधित कारणों के चलते अश्वेत गर्भवती की मृत्यु होने का खतरा तीन फीसदी अधिक पाया गया। विशेषज्ञों ने समय से पहले जन्म और इसकी जटिलताओं के लिए कई स्थितियों को प्रमुख कारण के तौर पर पाया गया है। 
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प्री टर्म बर्थ का जोखिम - फोटो : Istock
एशियाई देशों में बढ़ रहा है जोखिम

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि एशियाई और प्रशांतद्वीप वाली माताओं से समय से पहले बच्चे के जन्म के मामले भी बढ़े हैं। शोध की रिपोर्ट के मुताबिक कोविड महामारी को भी इसके लिए एक संभावित कारण के तौर पर देखा जा रहा है। महामारी के दौरान प्रसवपूर्व देखभाल में कमी आई, लोगों के लिए समय रहते इलाज प्राप्त कर पाना कठिन हो रहा था, जो गर्भवती की सेहत के लिहाजे से चुनौतीपूर्ण स्थिति मानी जा सकती है। 

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कोरोना वायरस का गर्भावस्था पर असर - फोटो : pixabay
क्या हैं इस समस्या को बढ़ाने वाले कारक?

विशेषज्ञों ने पाया कि 37 सप्ताह पहले ही जन्म के बढ़ते मामलों के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, इसमें कोविड महामारी के दौरान बढ़ी स्वास्थ्य जटिलताओं के साथ  मां की उम्र भी एक कारक हो सकता है। इसके अलावा यदि गर्भवती किसी चिकित्सीय स्थिति की शिकार है या इससे पहले भी वह बच्चे को जन्म दे चुकी है तो इन स्थितियों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। ये स्थितियां प्री-टर्म बर्थ का कारण हो सकती हैं। 
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प्री-टर्म बर्थ के जोखिम - फोटो : istock
प्री-टर्म बर्थ के नुकसान

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि समय से पहले प्रसव पीड़ा होना बच्चे के जन्म से संबंधित कई प्रकार की जटिलताओं का कारण बन सकती है। यह प्रसव के दौरान मृत्यु के जोखिमों को भी बढ़ाने वाली स्थिति हो सकती है। मां के साथ बच्चे के लिए भी समय से पहले जन्म की स्थति को जटिलताओं वाला माना जाता है, इसमें जन्म के समय कम वजन की समस्या, सांस लेने में कठिनाई, अविकसित अंग और दृष्टि संबंधी विकारों का खतरा भी बढ़ जाता है।


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स्रोत और संदर्भ

2022 MARCH OF DIMES REPORT CARD

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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