मातृत्व को संसार का सबसे बड़ा सुख माना जाता है। यह नई जिम्मेदारियों का समय भी होता है, जिसके साथ कई तरह की शारिरिक और मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति में बदलाव भी आ जाता है। बच्चे के जन्म के उत्साह और खुशी से लेकर भय और चिंता तक, प्रसव काल कई तरह की भावनात्मक चुनौतियों वाला समय माना जाता है। इसी वजह से अक्सर महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन की समस्या देखने को मिलती है।
इस अनुभव को बेबी ब्लू के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें मिजाज में बदलाव, चिंता और सोने में कठिनाई, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन जैसी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं।
आमतौर पर प्रसव के बाद पहले दो से तीन दिनों के भीतर ही इस तरह के अनुभव होने शुरू हो सकते हैं, वहीं कुछ महिलाओं में ऐसी दिक्कतें लंबे समय तक भी बनी रह सकती हैं, जिसपर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता होती है। प्रसवोत्तर अवसाद या पोस्टपार्टम डिप्रेशन, कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि महिलाओं में यह काफी सामान्य है। इस दौरान उनके विशेष ख्याल रखने की आवश्यकता होती है। आइए महिलाओं के जीवन से जुड़ी पोस्टपार्टम डिप्रेशन की इस समस्या को विस्तार से समझते हैं।