जब भी कोई संक्रमण फैलता है तो ज्यादातर लोग सामाजिक नियमों का पालन ज्यादा सख्ती से करने लगते हैं। नियमों का पालन करते-करते हम कब नैतिकता के चौकीदार बन जाते हैं, इसकी खबर खुद हमें भी नहीं लगती। मिसाल के लिए रोज नहाना, खाने से पहले हाथ धोना, घर और आसपास के माहौल को साफ रखना हमारी परवरिश का हिस्सा है। लेकिन संक्रमण के इस काल में हम अपने से ज्यादा दूसरों पर नजर रख रहे हैं। दिमाग में सवाल घूमता रहता है कि जो व्यक्ति हमारे साथ काम कर रहा है वो साफ सुधरा है कि नहीं। उसने खाने से पहले हाथ धोए कि नहीं। हद तो यहां तक है कि हम सामने वाले को टोकने से भी नहीं चूकते। इससे रिश्तों में एक अनकही दूरी बनने लगती है।
संक्रमण के दिनों में पता नहीं होता कि कौन व्यकित संक्रमित है। लिहाजा समाज का हर व्यक्ति एक दूसरे को लेकर शक में घिरा रहता है। अजनबियों के मामले में तो ये बात बहुत हद तक लागू होती है। आम तौर से सभी को मुस्कुराकर देखना, मोहब्बत से बात करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन संक्रमण के दिनों में लोग एक दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं। और धीरे-धीरे ये दूरी हमें नस्लीय भेदभाव की ओर ले जाती है। लोगों में एक दूसरे के लिए विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।