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Alert: रोज एक डिब्बी सिगरेट पीने जितनी खतरनाक है ये स्थिति, बच्चे-वयस्क सभी चपेट में; विशेषज्ञों ने किया अलर्ट

Tue, 18 Aug 2026 05:10 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

 सोशल मीडिया पर हजारों-लाखों फॉलोअर्स के बावजूद कई लोग अंदर से अकेलापन महसूस करते हैं। अकेलेपन तनाव, नींद और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। 
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तनाव, स्ट्रेस - फोटो : Freepik.com
फोन में सैकड़ों नंबर हैं और सोशल मीडिया पर हजारों दोस्त, पोस्ट डालते ही लाइक और कमेंट की लाइन लग जाती है पर असल जिंदगी में खालीपन है। अगर आपके साथ भी ये दिक्कत है तो यकीन मानिए आप अकेले नहीं है, ये समस्या दुनियाभर में करोड़ों लोग झेल रहे हैं। अकेलापन यानी लोनलीनेस वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती समस्या है, जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सभी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि दुनिया का हर छठा व्यक्ति अकेलेपन का शिकार है, ये स्थिति खामोश महामारी का रूप लेती जा रही है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कोरोना के बाद अब अकेलेपन की समस्या को एक नई 'साइलेंट महामारी' के रूप में देख रहे हैं।

वयस्कों से लेकर बच्चे तक सभी इसका शिकार देखे जा रहे हैं। एक अन्य अध्ययन में विशेषज्ञों की टीम ने पाया कि जिन लोगों ने बचपन में अकेला महसूस किया, उनमें बड़े होने पर डिमेंशिया का खतरा काफी ज्यादा था। 

मसलन स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अकेलेपन की स्थिति सेहत के लिए 15 सिगरेट जितनी नुकसानदायक है। 
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थकान - फोटो : Freepik.com
अकेलापन का बढ़ता खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, आज का अकेलापन थोड़ा अजीब है। पहले अकेलेपन का मतलब अक्सर आसपास किसी का न होना समझा जाता था। अब भीड़ के बीच रहकर, ऑफिस में लोगों के साथ बैठकर और सोशल मीडिया पर लगातार जुड़े रहने के बावजूद इंसान खुद को अकेला महसूस कर सकता है। स्क्रीन पर चेहरे बहुत हैं, लेकिन दिल की बात कहने वाले कितने हैं, यह सवाल ज्यादा मायने रखता है।
 
  • अकेलापन का सेहत पर गंभीर असर हो सकता है। लंबे समय तक सामाजिक जुड़ाव की कमी तनाव, नींद, मूड और जीवनशैली को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब इसे खतरनाक स्थिति बताते हैं। 
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अकेलेपन का शिकार - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

मेडिकल विशेषज्ञ कहते हैं, इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में जहां पूरी दुनिया बस एक क्लिक पर जुड़ी नजर आती है, वहीं इंसान अकेला और अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
 
  • घंटों स्क्रीन से चिपके रहने और सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहने के कारण लोग इस कदर अकेलेपन के शिकार हो रहे हैं कि दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे एक वैश्विक महामारी मानने लगे हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया के जाने-माने लेखक पॉल डेली कहते हैं कि इंसानी दिमाग को खोखला करके टेक कंपनियां अमीर बनती जा रही हैं।
  • लोग यह जानते हुए भी कि सोशल मीडिया उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है, इससे दूर नहीं हो पा रहे हैं।
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अकेलेपन का बढ़ता खतरा - फोटो : adobe stock images
युवा पीढ़ी अकेलेपन का सबसे ज्यादा शिकार

पॉल डेली कहते हैं, 25 वर्ष तक की युवा पीढ़ी इस अकेलेपन की लत की सबसे बड़ा शिकार है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह पीढ़ी ऐसे माहौल में पली-बढ़ी है जहां लगातार ऑनलाइन रहना एक अनिवार्यता बन गया है। दूसरी तरफ, टेक कंपनियां खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में ऐसा एल्गोरिदम इस्तेमाल करती हैं, जिससे लोग इससे बाहर ही नहीं आ पाते। वह अपने आसपास के लोगों और समाज से कटकर अकेलेपन के शिकार होते जाते हैं।

70% से अधिक युवा फोमो यानी पीछे रह जाने के डर से देर रात तक स्क्रीन स्क्रॉल करते रहते हैं। न्यूरोसाइंस के मुताबिक, नोटिफिकेशन और लाइक्स दिमाग में डोपामाइन नामक हार्मोन रिलीज करते हैं, जो जुए या नशीले पदार्थों की लत की तरह ही होता है।



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स्रोत:
Loneliness Is More Dangerous Than Smoking 15 Cigarettes A Day


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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