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ध्यान दें: अक्सर रात में आते हैं डरावने सपने? यह डेमेंशिया का संकेत तो नहीं, जानिए अध्ययन में क्या पता चला

Sat, 24 Sep 2022 07:20 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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डरावने सपने के कारणों को जानिए - फोटो : iStock
सपने क्यों आते हैं, किन सपनों के क्या मतलब हो सकते हैं? इस बारे में आपने लोगों से अलग-अलग तरह की बातें सुनी होंगी। हालांकि विज्ञान का, सपनों को लेकर तर्क अलग है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सपने असल में रैंडम ख्याल होते हैं। एक्टिवेशन सिंथेसिस मॉडल के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि सपने, हमारे दिमाग की गतिविधि को समझने का तरीका हो सकते हैं। हमारा दिमाग एमिग्डाला और हिप्पोकैम्पस जैसे मस्तिष्क के हिस्सों से सिग्नल लेता है और उनकी व्याख्या करने की कोशिश करता है, जिसके परिणामस्वरूप सपने आते हैं।

सपने कई प्रकार के हो सकते हैं। नाइटमेयर्स जिसे डरावने सपने के तौर पर भी जाना जाता है, यह दिमाग की स्थिति के बारे में समझने में भी मदद कर सकते हैं।  क्या आपको भी अक्सर रात में डरावने सपने परेशान करते हैं? इस बारे में अध्ययन कर रही शोधकर्ताओं की टीम ने एक बड़ा खुलासा किया है।

शोधकर्ताओं ने अध्ययन की रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि मध्यम आयु वर्ग के लोग जिन्हें नियमित रूप से बुरे सपने आते हैं, उनमें यह उम्र बढ़ने पर डेमेंशिया होने के अधिक खतरे का संकेतक भी हो सकता है। यानी कि अगर आपको अक्सर रात में डरावने सपने आते रहते हैं तो यह आपके भविष्य में डेमेंशिया के शिकार होने के जोखिम को काफी बढ़ा देता है। आइए इस बारे में विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।
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डेमेंशिया के खतरे के बारे में जानिए - फोटो : istock
डरावने सपने और डेमेंशिया का लिंक

बर्मिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने तीन अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि बार-बार बुरे सपने आते रहना, इसके कारण रात में अक्सर नींद से जग जाना और परेशान रहना, डेमेंशिया विकसित होने का खतरा बढ़ा सकता है। डेमेंशिया, चीजों को याद रखने, सोचने या निर्णय लेने की क्षमता में गड़बड़ी की समस्या है, जिसके कारण व्यक्ति के लिए रोजमर्रा की गतिविधियों को करने में भी कई तरह की कठिनाई हो सकती है।

अल्जाइमर रोग डेमेंशिया का सबसे आम प्रकार है। डेमेंशिया ज्यादातर, उम्र बढ़ने के साथ होने वाली समस्या है। अगर आप भी अक्सर डरावने सपने से परेशान रहते हैं तो आपके भी भविष्य में डेमेंशिया से पीड़ित होने का खतरा बढ़ जाता है।
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डरावने सपने का मानसिक स्वास्थ्य से संबंध - फोटो : istock
अध्ययन में क्या पता चला?

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने मध्यम आयु वर्ग के 600 (35 से 64 वर्ष की आयु) और 79 और उससे अधिक आयु के 2,600 प्रतिभागियों  के डेटा का अध्ययन किया। इसमें नींद की गुणवत्ता और मस्तिष्क स्वास्थ्य का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि मध्यम आयु वर्ग के जिन लोगों ने सप्ताह में कम से कम एक बार बुरे-डरावने सपने आने की सूचना दी, उनमें अगले 10 साल में संज्ञानात्मक गिरावट की समस्याओं का जोखिम अन्य की तुलना में चार गुना अधिक पाया गया।

टीम ने पाया कि नींद की गुणवत्ता में कमी के कारण बुरे सपने अधिक आते हैं और समय के साथ ये दिमाग में उन प्रोटीन्स को बढ़ाने लगते हैं जिसके कारण डेमेंशिया होने का जोखिम बढ़ जाता है।

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नाइटमेयर्स की समस्या और खतरा - फोटो : istock
क्या कहते हैं शोधकर्ता?

जर्नल में शोधकर्ताओं ने बताया कि नाइटमेयर्स की समस्या लोगों के बीच काफी सामान्य है। हालांकि इनका नैदानिक महत्व अब तक काफी हद तक अनजान रहा है। अध्ययन के प्रमुख लेखक आबिदेमी आई. ओटाइकू ने  बताया कि मस्तिष्क के दाहिने हिस्से के भीतर न्यूरोडीजेनेरेशन के परिणामस्वरूप इस तरह की दिक्कतों का अनुभव अधिक हो सकता है। यह लोगों के लिए सपने देखते समय अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना कठिन कर देती है। इसके लिए लोगों को नींद की गुणवत्ता में सुधार करने पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
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डेमेंशिया विकसित होने की आशंका - फोटो : Pixabay
पुरुषों में नाइटमेयर्स और डेमेंशिया का खतरा अधिक

शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में नाइटमेयर्स और डेमेंशिया का खतरा अधिक पाया गया है। उदाहरण के लिए, साप्ताहिक आधार पर बुरे सपने का अनुभव करने वाले उम्रदराज लोगों में अन्य लोगों की तुलना में डेमेंशिया विकसित होने की आशंका पांच गुना अधिक पाई गई। महिलाओं में हालांकि इसके जोखिम में वृद्धि की दर केवल 41 प्रतिशत थी। विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की गुणवत्ता को ठीक रखकर इस तरह की समस्याओं से बचाव किया जा सकता है। 



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स्रोत और संदर्भ
Nightmares in middle age linked to dementia risk

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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