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स्क्रीन टाइम बढ़ जाने से आंखों पर इस तरह पड़ रहा है प्रभाव, 20 की संख्या रखेगी आंखों को स्वस्थ

Tue, 01 Jun 2021 05:27 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हमारी सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ना तो लाजमी है - फोटो : Pixabay

Medically Reviewed by Dr. Nikhil Sardar
डॉ. निखिल सरदार
नेत्र विशेषज्ञ, नानावटी हॉस्पिटल, मुंबई
डिग्री- एमबीबीएस, डीओएमएस, एमडी
अनुभव- 25 वर्ष से अधिक
पिछले वर्ष से लॉकडाउन और ‘वर्क फ्रॉम होम' के कारण हम आराम पसंद भी हो गए हैं और इसका हमारी सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ना तो लाजमी है। ऑफिस का काम, ऑनलाइन क्लासेस, वेब सीरीज, वीडियो कॉल्स और भी कई सारी चीजों के कारण बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी का स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। जिसका प्रभाव पूरी तरह से उनकी आंखों पर भी पड़ा है। आंखों में खुजली, लालपन, जलन, दर्द आदि समस्याएं बहुत सामान्य होती जा रही हैं लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना मतलब खुद ही का हित न सोच पाने जैसा है। अभी भी हमारे पास वक्त है कि हम अपनी आंखों के स्वास्थ्य का ध्यान रख लें। अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखकर, आंखों के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाकर हम अपनी आंखों को चश्मे से बचाने में कामयाब हो सकते हैं। हमें न सिर्फ खुद की आंखों की सेहत का ख्याल रखना है बल्कि घर पर रहने वाले अन्य सदस्य जिनका कि समय इनदिनों मोबाइल या कंप्युटर पर खूब गुजर रहा है, उनकी भी आंखों का ख्याल रखना होगा। आंखों से जुड़ी कुछ कसरतें करना होंगी, यह एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। अगली स्लाइड्स से जानिए किन तरीकों से आप अपनी आंखों की सेहत को सुधार सकते हैं। 

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बदलाव आपके ऊपर हावी न हो पाए - फोटो : Social media

समय के साथ छेड़छाड़ न करें
लॉकडाउन का सीधा अर्थ है कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन का घर में सिमट जाना और पूरी तरह बदल जाना। लेकिन यह बदलाव आपके ऊपर हावी न हो पाए यह आपको ही सुनिश्चित करना है। जिस तरह समय बताने के लिए हमारे पास घड़ी होती है, उसी तरह हमारे शरीर में भी एक प्राकृतिक घड़ी मौजूद होती है। यदि हम उस घड़ी से छेड़छाड़ करके अपना सोने-जागने का वक्त बदलते हैं तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर असर होता है। आंखों को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो बेसमय काम करना नहीं है। दिन में सोना और रात में अंधेरे में स्क्रीन पर काम करना या मोबाइल पर कोई फिल्म देखना आपकी आंखों के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है। 

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कम्प्युटर विज़न सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है - फोटो : pixa

आंखों की नमी जाने लगती है
मुम्बई स्थित नानावटी हॉस्पिटल में कार्यरत नेत्र विशेषज्ञ डॉ. निखिल सरदार बताते हैं कि लोगों का स्क्रीन टाइम बढ़ जाने के कारण कम्प्युटर विज़न सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है। जब भी आप कम्प्युटर पर या किसी स्क्रीन पर काम करते हैं तो आपकी आंखों को बार-बार ध्यान लगाना पड़ता है। तेजी से बदलती तस्वीरों और शब्दों का प्रसंस्करण करके आंखें तेजी से मस्तिष्क तक वे तस्वीरें भेजती हैं। इस कारण आंखों की मांसपेशियों पर दबाव बनता है। लगातार स्क्रीन पर ध्यान देने के कारण हम पलकें भी औसत से कम झपकाते हैं, जिसका असर यह होता है कि आंखों की नमी जाती रहती है उसके साथ ही आंखों में समय के साथ धुंधलापन भी छाने लगता है। उम्र बीतने के साथ आंखों के प्राकृतिक लेंस कमजोर पड़ने लग जाते हैं।

 

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लोगों के चश्मे का नम्बर बढ़ा है - फोटो : iStock

होने लगती है ये समस्या
डॉ. निखिल आगे बताते हैं कि दफ्तर के काम के घर आ जाने से और बच्चों की पढ़ाई स्मार्टफोन और टैबलेट पर विस्थापित हो जाने से लोगों के चश्मे का नम्बर बढ़ा है और पहले की तुलना में अधिक लोग अब आंखों की जांच और चश्मे की ओर रुख कर रहे हैं। पहले अधिक उम्र में चश्मे की जरूरत पड़ती थी और वह भी सिर्फ पढ़ाई के लिए, लेकिन अब स्थिति यह है कि 40 के बाद ही रीडिंग चश्मे की आवश्यकता आ पड़ती है। आंखों में धुंधलापन, रूखापन, आंखों में जलन या दोहरी दृष्टि यानी डबल विजन जैसी समस्याएं आम हो चली हैं।

 

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हर 20 मिनट के बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें - फोटो : social media
बीस की संख्या को न भूलें
एक मिनट में कम से कम 12 से 15 बार पलकें झपकाना आवश्यक है। 20:20:20 नियम का पालन करें। हर 20 मिनट के बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें। 20 बार पलकें झपकाना भी एक अच्छा विकल्प है। यदि आप कम्प्युटर या लैपटॉप पर काम या पढ़ाई करते हैं तो उसकी स्क्रीन को 20 डिग्री नीचे की ओर झुकाकर रखें। आंखों से सूखापन दूर करने के लिए आर्टिफिशियल टियर ड्रॉप्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। स्क्रीन को कम से कम 25 इंच की दूरी पर रखें। छोटी स्क्रीन पर काम न करें। जितनी बड़ी स्क्रीन होगी आपकी आंखों के लिए उतनी ही सहूलियत रहेगी। एंटीग्लेयर चश्मे का इस्तेमाल करें। 

नोट- यह लेख नानावटी हॉस्पिटल के डॉक्टर निखिल सरदार से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉक्टर निखिल सरदार पिछले 25 सालों से प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्होंने अपनी डिग्री प्रवर कॉलेज ऑफ फिजियोथैरेपी , अहमदाबाद से ली है। 

 

अस्वीकरण- अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

 
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