आत्महत्या रोकथाम कैसे की जाए?
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डिप्रेशन जैसे विकारों की समय से पहचान, बचा सकती है जान
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डिप्रेशन, ओसीडी और अन्य मानसिक स्वास्थ्य विकारों की समय पर पहचान जरूरी है, इसमें परिवार, दोस्तों और सहकर्मी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि विश्व स्तर पर 5% वयस्क अवसाद से पीड़ित हैं। भारत में भी यह खतरा काफी तेजी से बढ़ता हुआ देखा जा रहा। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल दो लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य विकारों को एक कारण के तौर पर देखा गया है। जून 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अवसाद की व्यापकता दर 4.50% है।
डॉ सत्यकांत कहते हैं कि छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर ध्यान देकर और इससे सबक लेकर अगर शैक्षणिक संस्थानों के साथ स्क्रीनिंग शुरू कर दी की जाए तो यह आत्महत्या रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
पर क्या वास्तव में यह करना इतना आसान है?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी बड़ी चुनौती
मानसिक स्वास्थ्य के मामलों की स्क्रीनिंग फिलहाल बड़ी चुनौती नजर आ रही है। हाल ही में हुए अध्ययन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी के कारण वैश्विकस्तर पर 5 से 19 वर्ष की आयु वालों में आत्महत्या की दर बढ़ी हुई देखी जा रही है।
जामा पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अमरिका जैसे देश भी विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं। विश्लेषण में शामिल 3,000 से अधिक काउंटियों में से दो-तिहाई से अधिक में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की कमी देखी गई है।
भारत के लिए भी यह बड़ी समस्या बनी हुई है, देश में 135 करोड़ की आबादी पर फिलहाल मान्यताप्राप्त मनोचिकित्सकों की संख्या 15 हजार के करीब है। डॉ सत्यकांत कहते हैं, देश में स्क्रीनिंग की मांग बढ़ने से मनोचिकित्सकों की आवश्यकता बढ़ेगी जो एक बड़ी जरूरत है। भारत सरकार आत्महत्या रोकथाम को लेकर प्रयास कर रही है, ऐसे में मनोचिकित्सकों की सीट बढ़ाने और रोगियों की समय रहते पहचान करने की दिशा में काम करने की सख्त आवश्यकता है। आत्महत्या रोकथाम नीति को सफल बनाने के लिए इस दिशा में ध्यान दिया जाना चाहिए।
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