फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

IIT Student Suicide Case: काश समय पर हो गई होती ओसीडी की पहचान, तो बच सकती थी जान...

विज्ञापन
1 of 4
मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम के लिए सख्ती से काम करने की जरूरत - फोटो : istock
पिछले 10 दिनों में आईआईटी संस्थानों से सामने आए आत्महत्या के दो मामलों ने देश में मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकताओं पर जोर दिया है। रविवार रात (18 दिसंबर) को आईआईटी बसर के 17 वर्षीय छात्र ने कैंपस में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस मामले के ठीक एक हफ्ते पहले 11 दिसंबर को आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर को भी कथित तौर पर आत्महत्या के बाद मृत पाया गया था। इस तरह से रोजाना न जाने कितनी मौतें आत्महत्या के कारण हो जाती है, जिन्हें असल में रोका जा सकता है, अगर समय रहते ऐसे लोगों को आवश्यक इलाज और काउंसिलिंग मिल सके।

आईआईटी बसर के 17 वर्षीय छात्र ने अपने आत्महत्या नोट में साफ जिक्र किया है कि वह काफी समय से ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) से परेशान था। इसके कारण उसका पढ़ाई में ध्यान केंद्रित नहीं हो पा रहा था। इस समस्या से परेशान होकर उसने आत्महत्या की। इस बारे में मनोचिकित्सकों का कहना है कि अगर समय रहते साथियों ने छात्र में ओसीडी के लक्षणों या व्यवहार में परिवर्तन को पहचाना होता और समय पर इलाज मिल गया होता तो शायद इस मौत को रोका जा सकता था।

मनोचिकित्सक कहते हैं, आत्महत्या के बढ़ते मामले अपील करते हैं कि देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता से ध्यान देने की और वृहद स्तर पर इसकी स्क्रीनिंग की जरूरत है जिससे भविष्य में इस तरह से मौत के मामलों में कमी लाई जा सके। 
विज्ञापन

2 of 4
मानसिक स्वास्थ्य विकारों पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत - फोटो : istock
ओसीडी हो या तनाव, इसे हल्के में न लें

ओसीडी की स्थिति में कोई भी विचार आपको बार-बार बाध्यकारी रूप से परेशान करते रह सकते हैं। इस तरह के व्यवहार करने पर आप खुद को मजबूर पाते हैं, जैसे बार बार साफ-सफाई करने के बाद भी गंदगी नजर आते रहना, दरवाजा लॉक करने के बाद भी लगना जैसे शायद बंद न हो आदि। इस तरह की समस्या आगे चलकर अवसाद जैसे गंभीर मानसिक विकारों का भी कारण बन सकती है।

डॉक्टर कहते हैं, तनाव हो या ओसीडी, ऐसे किसी भी मामले को हल्के में लेने की गलती, आगे चलकर बड़ी समस्याओं का कारण बन सकती है। छात्र ने सुसाइड लेटर में आत्महत्या के लिए ओसीडी की दिक्कत को कारण बताया है। ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर के कई मामलों में आपके लिए दैनिक जीवन के सामान्य कार्यों को करना भी काफी कठिन हो जाता है। वहीं ओसीडी के कुछ मामले आत्मघाती विचारों को भी प्रेरित कर सकते हैं, जिसके चलते व्यक्ति बार-बार खुद को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता रहता है।

अगर समय रहते आसपास के लोग इस तरह के व्यवहार की पहचान कर लें और रोगी को उचित इलाज मिल जाए तो न सिर्फ ओसीडी को ठीक किया जा सकता है, साथ ही आत्महत्या को रोकने में भी इससे मदद मिल सकती है। 
विज्ञापन

3 of 4
मानसिक रोगों के देशव्यापी स्क्रीनिंग की जरूरत - फोटो : istock
देशव्यापी स्क्रीनिंग की जरूरत

आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताते हुए वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, कोरोना महामारी के बाद से जिस तरह से मानसिक स्वास्थ्य विकारों के मामले बढ़े हैं, ऐसे में देशव्यापी स्क्रीनिंग की सख्त जरूरत है, जिससे रोगियों की पहचान की जाए जो आत्महत्या रोकथाम में बड़ी भूमिका निभा सकती है। डॉ सत्यकांत, मध्यप्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही आत्महत्या रोकथाम नीति टास्कफोर्स के प्रमुख सदस्यों में से हैं। अमर उजाला से बातचीत में डॉ सत्यकांत कहते हैं, आईआईटी के इस मामले से सबक लेकर हम देश में बहुत सारे लोगों को आत्महत्या से बचा सकते हैं, इसके लिए जरूरी है कि जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य विकारों और सुसाइडल थॉट्स से परेशान लोगों की स्क्रीनिंग की जाए।

डॉ सत्यकांत कहते हैं, जिस तरह से कोरोना के समय में हमने एक व्यक्ति के संक्रमित होने पर आसपास के लोगों की जांच की थी, उसी तरह आईआईटी में इस मामले के सामने आने के बाद क्यों न पूरे संस्थान की स्क्रीनिंग कर ली जाए। इस तरह के प्रयासों से अगर एक की भी जान बच सकती है तो यह निश्चित ही बड़ी कामयाबी होगी, और इसी तरह के प्रयास अन्य संस्थानों में भी किए जाने की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि भारत में छात्र आत्महत्या के मामले 2022 में अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 की तुलना में छात्र आत्महत्या में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। इन मौतों में से 14 मामले कोटा से सामने आए हैं। 
विज्ञापन

4 of 4
आत्महत्या रोकथाम कैसे की जाए? - फोटो : iStock

डिप्रेशन जैसे विकारों की समय से पहचान, बचा सकती है जान


मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डिप्रेशन, ओसीडी और अन्य मानसिक स्वास्थ्य विकारों की समय पर पहचान जरूरी है, इसमें परिवार, दोस्तों और सहकर्मी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि  विश्व स्तर पर 5% वयस्क अवसाद से पीड़ित हैं। भारत में भी यह खतरा काफी तेजी से बढ़ता हुआ देखा जा रहा। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल दो लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य विकारों को एक कारण के तौर पर देखा गया है। जून 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अवसाद की व्यापकता दर 4.50% है। 

डॉ सत्यकांत कहते हैं कि छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर ध्यान देकर और इससे सबक लेकर अगर शैक्षणिक संस्थानों के साथ स्क्रीनिंग शुरू कर दी की जाए तो यह आत्महत्या रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

पर क्या वास्तव में यह करना इतना आसान है?


मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी बड़ी चुनौती

मानसिक स्वास्थ्य के मामलों की स्क्रीनिंग फिलहाल बड़ी चुनौती नजर आ रही है। हाल ही में हुए अध्ययन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी के कारण वैश्विकस्तर पर 5 से 19 वर्ष की आयु वालों में आत्महत्या की दर बढ़ी हुई देखी जा रही है। जामा पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अमरिका जैसे देश भी विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे हैं। विश्लेषण में शामिल 3,000 से अधिक काउंटियों में से दो-तिहाई से अधिक में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की कमी देखी गई है।

भारत के लिए भी यह बड़ी समस्या बनी हुई है, देश में 135 करोड़ की आबादी पर फिलहाल मान्यताप्राप्त मनोचिकित्सकों की संख्या 15 हजार के करीब है। डॉ सत्यकांत कहते हैं, देश में स्क्रीनिंग की मांग बढ़ने से मनोचिकित्सकों की आवश्यकता बढ़ेगी जो एक बड़ी जरूरत है। भारत सरकार आत्महत्या रोकथाम को लेकर प्रयास कर रही है, ऐसे में मनोचिकित्सकों की सीट बढ़ाने और रोगियों की समय रहते पहचान करने की दिशा में काम करने की सख्त आवश्यकता है। आत्महत्या रोकथाम नीति को सफल बनाने के लिए इस दिशा में ध्यान दिया जाना चाहिए।


----------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें