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कोरोना वायरस: बैक्टीरिया और विषाणुओं को मार सकती है ये खास कोटिंग

Thu, 25 Jun 2020 01:34 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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क्या कोरोना वायरस को मार सकती है ये कोटिंग? - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
दुनिया में हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाएगी। जी हां, एक करोड़। जिस तेजी से कीटाणु और अन्य रोगजनक जीव, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं, उससे एंटीबायोटिक दवाएं, कई बीमारियों से लड़ने में बेअसर साबित हो जाएंगी। और इससे आगे चल कर हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाने का अंदेशा है। अभी तक हर साल दुनिया भर में सात लाख लोग ऐसे रोगों से मर जाते हैं, जिन पर दवाओं का असर नहीं होता। पिछले एक दशक में हानिकारक बैक्टीरिया के खिलाफ जिन एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा सकता था, उनका असर अब कम होता जा रहा है।
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Bacteria - फोटो : Pixabay
इसी दौरान, अन्य रोग पैदा करने वाले वायरस, फफूंद और अन्य परजीवी भी इन दवाओं से लड़ने की शक्ति विकसित कर रहे हैं। मतलब ये कि इनकी वजह से जो बीमारियां होती हैं, उनका इलाज करना और भी मुश्किल हो रहा है। जानकारों का कहना है कि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत ऐसे रोगाणुओं से होगी, जिन पर मौजूदा दवाओं का असर नहीं होता। हम सभी दिन भर में न जाने कितनी चीजें छूते हैं। उन सभी पर कई प्रकार के कीटाणु, जीवाणु और वायरस चिपके रहते हैं। वो किसी ना किसी सूरत में हमारे शरीर में दाखिल हो जाते हैं और हमें बीमार करते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोविड-19 महामारी का वायरस Sars CoV-2 गत्ते पर 24 घंटे तक जिंदा रह सकता है, जबकि प्लास्टिक और स्टील वगैरह पर तीन दिन तक। कुछ बैक्टीरिया, ग़ैर जानदार चीजों पर कई महीने तक रह तक जिंदा सकते हैं। इसीलिए, लगातार हर सतह को साफ रखने की सलाह दी जाती है। जानकार कहते हैं, अब जबकि हम जान चुके हैं कि किस प्रकार की सतह पर कौन-सा कीटाणु या बैक्टीरिया कितनी देर तक जिंदा रह सकता है तो क्यों ना हम एंटी बैक्टीरियल परत के लेप का इस्तेमाल शुरू कर दें। तांबे की मिश्रित धातुओं को इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प माना गया है।

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तांबे के बर्तन - फोटो : सोशल मीडिया
ये धातु महज दो घंटे में 99.9 फीसद बैक्टीरिया मारने की क्षमता रखती है। प्राचीन काल में भारत और यूनान के लोग तो खाना तांबे के बर्तनों में ही बनाते थे। भारत में तो आज भी तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। यूनान में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भी तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल होता था। लेकिन आज ये धातु महंगी होने की वजह से कम इस्तेमाल होने लगी हैं। इसकी जगह स्टील और प्लास्टिक ने ले ली है। तांबे के बर्तनों की साफ-सफाई भी आसान काम नहीं है। इसीलिए कुछ लोग इसे नापसंद करते हैं। महंगा होने की वजह से अगर हम तांबे के बर्तन इस्तेमाल नहीं कर सकते तो इसकी कलई चढ़ाकर तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
मिसाल के लिए डोर बेल या लिफ्ट के बटन, दरवाजों के हैंडल कॉपर कोटिंग वाले बनाए जा सकते हैं। इससे कीटाणुओं और वायरस का असर बहुत हद तक कम हो सकता है। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि मेडिकल ट्रांसप्लांट में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिक एंटीबैक्टीरियल सरफेस तैयार करने के लिए प्रकृति से भी प्रेरणा ले रहे हैं।

मिसाल के लिए सिकाडा कीड़ा अपने पंखों से अपनी सफाई के लिए मशहूर है। उनके पंख सुपरहाइड्रोफोबिक हैं। मतलब ये कि वो अपने पंखों पर पानी टिकने नहीं देते। जैसे ही पानी की बूंदे उस पर गिरती हैं, वो फिसल जाती हैं और अपने साथ पंखों पर चिपके कीटाणु भी बहा ले जाती हैं। अब इसी तर्ज पर नई तरह की सतहें तैयार करने पर काम किया जा रहा है।
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Special Coating - फोटो : Pixabay
रिसर्चर टाइटेनियम और टाइटेनियम मिश्रित धातुओं के बारे में ज्यादा उत्साहित हैं। इन्हें हाई टेंपरेचर पर आसानी से पिघलाया जा सकता है। और तेज किनारों के साथ एक महीन चादर बनाई जा सकती है। जिनसे विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को मारा जा सकता है।

इसके अलावा, पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने पर टाइटेनियम डाइऑक्साइड ऐसे पराक्साइड का उत्पादन करता है जो रोगाणुओं को निष्क्रिय करता है। कोरोना वायरस को कमजोर करने के लिए भी इसी तरह की कोटिंग वाली सतहों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
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बैक्टीरिया (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
खुद को बीमारियों से बचाने और रोगाणु खत्म करने के लिए हम प्रकृति से और भी कई तरह की प्रेरणाएं ले सकते हैं। मिसाल के लिए चाय के पेड़ से निकलने वाले तेल में एंटीवायरल एरोसॉल होते हैं। इनके संपर्क में आने पर 5-15 मिनट के भीतर 95 फीसद से अधिक रोगाणु नष्ट हो सकते हैं।

रोगाणुरोधी पौधों के अर्क से कोटिंग वाली सतह तैयार करने पर रिसर्च अभी शुरूआती चरण में है। उम्मीद है कि कामयाबी भी मिल जाएगी। लेकिन इसके लिए जरूरी अवयवों की मात्रा और रोगाणुओं के टारगेट के बारे में अधिक जानकारी होना भी जरूरी है।

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बैक्टीरिया (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
एंटीमाइक्रोबियल सरफेस पर रोगाणु मर कर वहीं चिपके रह जाते हैं। इनकी लगातार सफाई होना बहुत जरूरी है। दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जहां पानी की भारी किल्लत है। ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सतहों का आइडिया सभी देशों के लिए कारगर नहीं है।

आज दुनिया नए कोराना वायरस का सामना कर रही है। इसे काबू में करने के लिए अभी तक के सभी प्रयास नाकाम रहे हैं। ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सरफेस की जरूरत और भी ज्यादा महसूस होती है। इसके अलावा अस्पतालों से जितना कचरा निकलता है वो भी संक्रमण फैलाने की वजह बनता है।
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Coronavirus - फोटो : Pixabay
एक अध्ययन से पता चला है कि चीन में कोविड-19 से जितने लोगों की मौत हुई है, उनमें से 50 फीसदी रोगियों को अन्य कीटाणुओं ने पहले ही संक्रमित कर दिया था। अस्पतालों में कोरोना के मरीजों को एंटीबायोटिक्स ही दी जा रही हैं, भले ही वो वायरस के खिलाफ बेअसर हैं।

इसमें शक नहीं कि हम तरह-तरह के जीवाणुओं से घिरे रहते हैं। बहुतों के खिलाफ तो हमारा शरीर खुद ही लड़ लेता है और बहुतों को खत्म करने के लिए दवाएं लेने पड़ती हैं। लेकिन, जिस तरह कोविड-19 वायरस हमारी जिंदगी में नासूर बनकर घुस गया है, उससे और उस जैसे अन्य रोगी बनाने वाले जीवों से लड़ने के लिए हमें जल्द ही अन्य विकल्प तलाशने होंगे। रोगाणु मारने वाली सतह का लेप, इसका एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
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