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आखिर कब खत्म होगा कोरोना वायरस, इससे लड़ने को कबतक तैयार हो पाएगा मानव शरीर? 

Tue, 05 May 2020 04:34 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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दुनियाभर में नए कोरोना वायरस के टीके पर रिसर्च चल रही है - फोटो : PTI
इस समय दुनियाभर में नए कोरोना वायरस के टीके पर रिसर्च चल रही है। रोज नई प्रगति की खबरें आ रही हैं। लॉकडाउन की वजह से घरों में कैद लोगों में ये खबरें एक नई उम्मीद जगाती हैं। उन्हें लगता है कि घर में कैद रहने के दिन अब खत्म होने वाले हैं। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में लॉकडाउन से कुछ रियायतें दी हैं। वहीं भारत में भी लॉकडाउन में कई तरह की राहत दी गई है। 

लॉकडाउन से कब और कितनी रियायत दी जाएगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि एंटीबॉडी टेस्ट की कितनी जरूरत है। अगर हम ये पता कर सकें कि किसी को नए कोरोना वायरस ने संक्रमित किया था और वो ठीक हो चुका है। और अब उसके शरीर में इस वायरस से लड़ने की क्षमता विकसित हो चुकी है। तो ऐसे लोगों को दोबारा काम पर जाने की इजाजत दी जा सकती है। इसके लिए पहली शर्त तो ये है कि एक ऐसे एंटीबॉडी टेस्ट को विकसित किया जाए, जो भरोसेमंद हो। क्योंकि हाल ही में भारत में शुरू किए गए एंटीबॉडी टेस्ट को बीच में रोकना पड़ा था। इनके नतीजों पर जानकारों को भरोसा नहीं था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
एंटीबॉडी असल में एक प्रोटीन होती है, जो हमारा शरीर किसी संक्रमण के दौरान बनाता है। इससे हमारे शरीर पर हमला करने वाले वायरस, कीटाणु या किसी अन्य रोगी बनाने वाले जीव को निशाना बनाया जाता है। ये एंटीबॉडी उस विषाणु से लिपट कर उसे खत्म कर देते हैं। या फिर हमारे शरीर की इम्यून कोशिकाओं को आदेश देते हैं कि वो इन हमलावर विषाणुओं या कीटाणुओं को खत्म कर दें।

किसी भी संक्रमण के बाद हमारे खून में एंटीबॉडी प्रोटीन बची रह जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि अगर कहीं वो हमलावर वायरस या बैक्टीरिया दोबारा शरीर में आए, तो उसे फिर से खत्म किया जा सके। लेकिन, नए कोरोना वायरस के साथ भी ऐसा हो ये जरूरी नहीं। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मारिया वान कर्खोव ने चेतावनी दी थी कि ये वायरस इससे पहले इंसान के शरीर में कभी नहीं रहा था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
इंपीरियल कॉलेज लंदन की कैटरीना पोलॉक कहती हैं कि अभी ये वायरस हमारे शरीर के लिए नया है। अभी हम इसके बारे में बहुत सी नई बातें जान रहे हैं। किसे ये वायरस संक्रमित करता है और ये क्यों सबसे अहम सवाल है। अगर इस वायरस से कोई भी संक्रमित नहीं होगा, तो हमारी चिंता दूर होगी। जब भी कोई नया वायरस इंसानों पर हमला करता है। तो हर व्यक्ति का शरीर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के मुताबिक उससे मुकाबला करता है। ये हर इंसान में अलग होती है। जो उसकी उम्र, लड़ने की शक्ति और आनुवांशिक कारणों से निर्धारित होती है।

आम तौर पर संक्रमण होने पर हमारे शरीर का तापमान बढ़ जाता है। शरीर में वायरस को निगलने वाली कोशिकाएं फैगोसाइट्स बनने लगती हैं। जल्द ही वायरस को शरीर से मार भगाया जाता है। इसे एडैप्टिव इम्यून रिस्पॉन्स या प्रतिक्रियात्मक प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हमारे शरीर में दो तरह की इम्यून कोशिकाएं होती हैं। टी (T) और बी (B) कोशिकाएं। बी कोशिकाएं, पहले हमला कर चुके कीटाणुओं या विषाणुओं से लड़ने के लिए एंटीबॉडी निर्मित करती हैं। अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एइकिको इवासाकी कहती हैं कि, 'टी कोशिकाएं हमारे शरीर की उन कोशिकाओं को खत्म कर देती हैं, जिनमें वायरस का संक्रमण हो चुका होता है।'

किसी भी वायरस का पहला संक्रमण होने पर हमारे शरीर को उससे निपटने में थोड़ा समय लगता है। मगर दूसरी बार उसी वायरस के अटैक से निपटने को हमारा शरीर तैयार होता है। क्योंकि तब तक एंटीबॉडी का निर्माण हो चुका होता है।

मगर, ये सिद्धांत कोरोना वायरस पर लागू होता है या नहीं, फिलहाल कहना मुश्किल है। अब तक की रिसर्च ये बताती हैं कि एक बार संक्रमित हो चुके व्यक्ति पर अगर कोरोना वायरस दोबारा हमला करता है, तो वो फिर से संक्रमित हो सकता है। ये रिसर्च चूहों और मकाक बंदरों पर हुई है।
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Plasma - फोटो : Social Media
चीन में कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हुए तीस फीसदी लोगों में एंटीबॉडी नहीं पाए गए। यानी ये लोग बिना वायरस से लड़ने की एंटीबॉडी प्रोटीन विकसित किए हुए ही ठीक हो गए थे। प्रोफेसर इवासाकी कहती हैं कि, 'शायद इन लोगों की टी कोशिकाओं ने ज्यादा फुर्ती से काम किया। और वायरस को मार भगाया। इसलिए एंटीबॉडी विकसित नहीं हुई।'

नए कोरोना वायरस के कुछ मरीजों को ठीक हुए लोगों के प्लाज्मा से सुरक्षित किया जा सकता है। प्लाज्मा असल मे हमारे खून का सीरम होता है। जो किसी वायरस के संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति से खून निकाल कर, उसमें से बाकी कोशिकाएं छांट कर तैयार किया जाता है। तब केवल सीरम या एंटीबॉडी बचता है। जिसे मरीजों को चढ़ाया जाता है। इसे सीरम थेरेपी भी कहते हैं।
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प्लाज्मा थेरेपी - फोटो : social media
लेकिन, प्रोफेसर एइकिको इवासाकी का कहना है कि प्लाज्मा थेरेपी को बहुत से लोगों के इलाज के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए कोरोना वायस से ठीक हुए लोगों से खून निकालना होगा। फिर उसमें से एंटीबॉडी वाला सीरम अलग करना होगा। फिर इसे मरीजों को चढ़ाया जाएगा। ये खून देने और खून चढ़ाने जैसी प्रक्रिया है। फिर भी मरीज को ठीक होने में समय लगेगा। ये इलाज अस्पतालों में ही मुमकिन है। दूर दराज के इलाकों में कोरोना वायरस के मरीजों की प्लाज्मा थेरेपी कर पाना संभव नहीं।

आम तौर पर किसी वायरस का प्रकोप फैलने के बाद बहुत से लोगों में इससे लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है। लेकिन, इसमें कई बरस लग सकते हैं। इसीलिए, साइंस पत्रिका ने कहा है कि हमें शायद 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना पड़े।
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कोरोना वायरस: अभी ये महामारी फैल ही रही है और इस पर रिसर्च भी जारी है - फोटो : PTI
कोरोना वायरस के अन्य प्रकोपों, जैसे कि सार्स या मर्स का टीका भी अब तक नहीं खोजा जा सका है। वायरस के प्रकोप से ठीक हुए व्यक्ति को काम पर लौटने की इजाजत देने से पहले उसका पीसीआर टेस्ट फिर से करना होगा। जिससे ये पता चले कि उसके शरीर में जिंदा वायरस तो नहीं।

प्रोफेसर इवासाकी कहती हैं कि करीब 30 फीसदी लोगों में वायरस से लड़ने की एंटीबॉडी नहीं बनती। वहीं कैटरीना पोलॉक का कहना है कि, 'अभी ये महामारी फैल ही रही है और इस पर रिसर्च भी जारी है। ऐसे में हम लोगों के जहन में उठ रहे हर सवाल का जवाब नहीं दे सकते।' इसलिए, लॉकडाउन से कब छुटकारा मिलेगा, दुनिया कोरोना वायरस से पहले वाली सामान्य जिंदगी कब जी सकेगी, ये बता पाना मुश्किल है।
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