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World Asthma Day: अस्थमा के मरीजों को कोरोना वायरस का कितना खतरा, सुरक्षित रहने के लिए क्या करें?

Tue, 05 May 2020 04:20 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ashthma - फोटो : Amar Ujala
कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच अलग-अलग बीमारियों से जूझ रहे लोग थोड़े सशंकित रहते हैं। खासकर बुजुर्ग या फिर जिन्हें पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या हो, उन्हें इस समय कोरोना से ज्यादा खतरा  बताया जा रहा है। ऐसे में अस्थमा यानी दमा के मरीजों को ऐसा लग रहा कि उन्हें कोरोना वायरस का खतरा ज्यादा है। चूंकि कोरोना वायरस फेफड़ों पर हमला करता है, इसलिए अस्थमा के मरीजों को डर है कि कोरोना के संक्रमण से वे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। अस्थमा के मरीजों की चिंता सोशल मीडिया पर चल रहे एक मैसेज ने बढ़ा दी है, जिसमें कहा गया है कि सांस लेने में परेशानी होने पर वे जिस कॉर्टिजोल स्प्रे या इन्हेलर से राहत पाते हैं, उसका इस्तेमाल संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है। कारण कि स्प्रे से शरीर की इम्यूनिटी कमजोर होती है। आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से। 
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अस्थमा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, अस्थमा के मरीजों का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, जिससे किसी प्रकार का वायरल संक्रमण उन्हें जल्दी प्रभावित करता है। चूंकि ये पहले से ही सांस संबंधी परेशानियां झेल रहे होते हैं, ऐसे में कोरोना संक्रमण होने की स्थिति में उनकी स्थिति खराब हो सकती है। डॉक्टर बताते हैं कि जब शरीर की इम्यूनिटी मजबूत नहीं होगी तो वह संक्रमण बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। अस्थमा के मरीजों को घर में रहने और संक्रमण से बचने की सलाह दी जाती है। 
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अस्थमा
अस्थमा के इलाज में कॉर्टिजोन स्प्रे या फिर कॉर्टिजोन टैबलेट का इस्तेमाल आम बात है। इससे एंटी-इंफ्लेमेट्री प्रभाव पड़ता है, जो मरीज के फेफड़ों की पतली नलियों में होने वाली परेशानी को कम करता है। इससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने में मदद मिलती है। जर्मनी में फेफड़ों के विशेषज्ञों ने बयान जारी कर कहा कि अगर अस्थमा के मरीज नियमित तौर पर अपनी दवाइयां लेते रहें तो उनके लिए कोरोना का खतरा ज्यादा नहीं बढ़ेगा। विशेषज्ञों की सलाह है कि उन्हें बिना अपने चिकित्सक की सलाह के दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए। अगर हालत गंभीर होने लगे तो डॉक्टर ऐसे मरीजों की कॉर्टिजोन डोज नियंत्रित कर सकते हैं। 

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अस्थमा
कुछ विशेषज्ञों की राय अलग भी है। बर्लिन शारिटे के मुख्य वायरोलॉजिस्ट क्रिस्टियान ड्रोस्टेन ने सलाह दी थी कि अस्थमा के मरीजों को डॉक्टर से कॉर्टिजोन आधारित दवा के विकल्पों पर बात करनी चाहिए, ताकि उनकी इम्यूनिटी प्रभावित न हो। हालांकि अबतक कॉर्टिजोन युक्त दवाओं का संक्रमण से सीधा कनेक्शन स्थापित नहीं हुआ है, इसलिए जर्मन सोसायटी फॉर न्यूमोलॉजी एंड रेसपिरेटरी मेडिसिन के विशेषज्ञ अबतक इन्हेलर यानी स्प्रे का समर्थन कर रहे हैं। उनके मुताबिक, अस्थमा के मरीजों को कॉर्टिजोन स्प्रे बंद नहीं करनी चाहिए। 
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अस्थमा
सुरक्षित रहने के लिए और क्या करें?
यह बात तो साफ हो चुकी है कि जिन्हें पहले से सांस की समस्या हो, उनका शरीर वायरस संक्रमण से लड़ने में कमजोर साबित हो सकता है। डॉयचे वेले की रिपोर्ट के मुताबिक, फेफड़ों की म्यूकोसा पहले से कमजोर होने के कारण यह खतरा होता है। लंग स्पेशलिस्ट रायनाल्ड फिशर बताते हैं कि अस्थमा के मरीजों में उनके म्यूकोसा में एलर्जी के कारण होने वाला अक्सर इंफ्लेमेशन दिखता है, लेकिन वह निमोनिया का रूप नहीं होता। कई बार अन्य वायरस या बैक्टीरिया भी फेफड़े में परेशानी पैदा करते हैं। डॉक्टर सलाह देते हैं कि अस्थमा के मरीजों के लिए पहले से ही इंफ्लुएंजा और न्यूमोकॉक्कल वैक्सीन लगवाना अच्छा होता है। अस्थमा के मरीजों को इस दौर में फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के साथ  हाइजीन का बहुत ख्याल रखने की जरूरत है।
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