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Coronavirus: भारत में वैक्सीन के मुकाबले हर्ड इम्यूनिटी का इंतजार करना क्या सही होगा?

Wed, 30 Sep 2020 04:48 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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Corona vaccine, Herd Immunity - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
भारत में कोरोना के अब तक 62 लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 51.87 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं और तकरीबन 10 लाख के आसपास अब भी एक्टिव मामले हैं। पिछले दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का एक बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ये कहते सुने जा सकते हैं कि भारत अभी हर्ड इम्यूनिटी से काफी दूर है। पिछले तीन रविवार से देश के स्वास्थ्य मंत्री जनता से 'संडे संवाद' कर रहे हैं। इस दौरान लोग उनसे सवाल पूछते हैं और वो चुनिंदा सवालों के जवाब देते हैं।

इसी क्रम में 27 सितंबर को बेंगलूरू के रहने वाले सोमनाथ ने स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन से सवाल पूछा था, "आईसीएमआर के सीरो सर्वे की रिपोर्ट ने लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। लोग ये सोच कर बेपरवाह हो गए हैं कि ज्यादातर लोगों को कोरोना संक्रमण हो चुका है या फिर आने वाले दिनों में हो ही जाएगा। जनता की इस तरह की मानसिकता के साथ सरकार कोविड-19 बीमारी से कैसे निपट सकती है?"

 
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Coronavirus prevention - फोटो : iStock
इस सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने कहा, "आईसीएमआर ने देश में अब तक दो सीरो सर्वे किए हैं। पहला मई के महीने में किया था। उस वक्त पता चला था कि देश में 0.73 फीसदी लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में हैं। दूसरा सीरो सर्वे हाल ही में आईसीएमआर ने किया है। इसमें देश के 21 राज्यों के 70 जिलों से सैम्पल लिए गए। इस सीरो सर्वे के नतीजों से ये पता चलता है कि भारत अभी भी हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति से काफी दूर है। 

स्वास्थ्य मंत्री के जवाब के बाद से ही जनता सोशल मीडिया पर हर्ड इम्यूनिटी के बारे में कई तरह के सवाल पूछ रही है जैसे हर्ड इम्यूनिटी क्या है, कब तक आएगी और इसका इंतजार क्यों करना चाहिए? ये रिपोर्ट एक कोशिश है कि हर्ड इम्यूनिटी से जुड़े आपके तमाम सवालों का जवाब एक जगह ही दिया जा सके।
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स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन - फोटो : ANI
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के मुताबिक, "किसी भी जनसंख्या में हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति तब हासिल की जाती है जब जनसंख्या के 60 से 70 फीसदी लोगों में बीमारी फैल जाती है। अगर सीरो सर्वे के नतीजे ये बता रहे हैं कि भारत में हर्ड इम्यूनिटी वाली स्थिति नहीं आई है, तो इससे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में अब भी ऐसी बहुत बड़ी जनसंख्या है जो कोविड-19 की बीमारी से अब तक बची हुई है। जनता पूरी तरह सीरो सर्वे के नतीजों के बारे में ठीक से समझ नहीं पाई है। इसलिए लोगों को सावधानी बरतना नहीं छोड़ना चाहिए।"

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Herd Immunity, Coronavirus - फोटो : iStock/Amar Ujala
हर्ड इम्यूनिटी क्या है?
अगर कोई बीमारी आबादी के बड़े हिस्से में फैल जाती है और इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी के संक्रमण को बढ़ने से रोकने में मदद करती है तो जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से 'इम्यून' हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं। उनमें वायरस का मुकाबला करने को लेकर सक्षम एंटी-बॉडीज तैयार हो जाती हैं। जब कुल आबादी के 60 से 70 फीसदी लोग, किसी बीमारी से प्रभावित हो जाते हैं तो माना जाता है कि उस आबादी में 'हर्ड इम्यूनिटी' की स्थिति पहुंच गई है। इससे उन 30-40 फीसदी लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए 'इम्यून' हैं।
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Coronavirus - फोटो : Pixabay
ऐसा इसलिए भी मुमकिन हो पाता है क्योंकि वायरस जब भी दूसरे के शरीर में इंफेक्शन पैदा करने के लिए तैयार होता है, तो वो पहले से ही संक्रमित होता है, उनके पास पहले से ही इम्यूनिटी होती है। ऐसे में 'चेन ऑफ ट्रांसमिशन' टूट जाती है। पब्लिक हेल्थ केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. के श्रीनाथ रेड्डी इसको एक उदाहरण के साथ समझाते हैं। हर्ड इम्यूनिटी बिना संक्रमण वालों को वैसे ही सुरक्षा देती है जैसे कि एक वीआईपी चल रहा है और उसके आस पास कई गार्ड हैं, जो उन्हें सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।
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नमूना लेता स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
सीरो सर्वे और हर्ड इम्यूनिटी का संबंध
सीरो सर्वे ये पता लगाने के लिए कराया जाता है कि आखिर कितनी आबादी बीमारी से संक्रमित हो चुकी है। मसलन दिल्ली के पहले सीरो सर्वे में पता चला था कि दिल्ली की एक चौथाई जनता कोविड-19 बीमारी से संक्रमित हो चुकी है। दिल्ली के दूसरे सीरो सर्वे में पता चला कि 29 फीसदी जनता संक्रमित हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सीरो सर्वे के नतीजों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति आई है या नहीं। 

डॉ. रेड्डी कहते हैं कि सीरो सर्वे में भी कई बार गलत नतीजे निकलते हैं जिसे 'फॉल्स पॉजिटिव' कहा जाता है। जब बड़े पैमाने पर इस तरह के सर्वे होते हैं तो ऐसे 'फॉल्स पॉजिटिव' मामलों की संख्या बढ़ जाती है। इसलिए सीरो सर्वे के आधार पर हर्ड इम्यूनिटी के बारे में आकलन करना पूरी तरह सही नहीं होता। सीरो सर्वे में जो दूसरी बात गौर करने वाली होती है वो ये कि कई बार जो एंटी बॉडी सीरो सर्वे में मिलती हैं, वो कोविड-19 बीमारी से जुड़ी हैं या नहीं इसका पता लगाना मुश्किल होता है। डॉक्टर रेड्डी इस बात को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं।
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Human body - फोटो : Pixabay
सीरो सर्वे में हमारे शरीर के अंदर एंटीबॉडी पैदा हुई हैं या नहीं इस बारे में पता चलता है। उसी आधार पर हम ये बताते हैं कि कितनी जनता अब कोविड-19 की चपेट में आ चुकी है। कोविड-19 बीमारी से शरीर में जिस तरह की एंटी बॉडी पैदा होती हैं, उसी से मिलती जुलती एंटी बॉडी छह दूसरी बीमारियों में भी पैदा होती हैं, जैसे सार्स, मर्स और चार तरह के कॉमन कोल्ड वाली बीमारियों में। इस तरह की इम्यूनिटी को 'क्रॉस इम्यूनिटी' कहते हैं। ऐसे में सीरो सर्वे के नतीजों में पायी गई एंटी बॉडी के आधार पर ये पता लगाना कि एंटी बॉडी वाले हर इंसान को कोविड-19 बीमारी ही है, ये थोड़ा मुश्किल है। कई बार लोगों के शरीर में कॉमन कोल्ड होने की वजह से एंटी -बॉडी पैदा हो सकती है। डॉ. रेड्डी इस बात से भी आगाह करते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हर्ड इम्यूनिटी या वैक्सीन, किसका करें इंतजार?
डॉ. रेड्डी के मुताबिक मान लीजिए हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति भी किसी-किसी राज्य में आ जाए तो भी वैक्सीन का इंतजार करना पड़ेगा। वो इसके पीछे कारण भी गिनाते हैं - मान लीजिए अगर दिल्ली में 60-70 फीसद जनता को संक्रमण हो गया है और रायपुर में केवल 10 फीसदी ही संक्रमित हैं, तो दिल्ली के वो लोग जो संक्रमित नहीं हैं, वो दिल्ली में हर्ड इम्यूनिटी की वजह से कोरोना संक्रमण से बच सकते हैं। लेकिन किसी वजह से अगर वो रायपुर गए, तो वो भी संक्रमित हो सकते हैं। यही वजह है कि हर्ड इम्यूनिटी के इंतजार के बजाए हमें कोरोना वायरस से सुरक्षा के इंतजाम हर समय करने की जरूरत है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे
एक तो भारत अभी हर्ड इम्यूनिटी की स्टेज पर नहीं है। दूसरा कुछ राज्यों में हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति आ भी जाए तो भी कोरोना संक्रमण से बचने का वो कारगर उपाय नहीं है, क्योंकि लोगों की एक जगह से दूसरे जगह की आवाजाही शुरू हो चुकी है। तीसरी समस्या ये है कि सीरो सर्वे में जो एंटी बॉडी बनने की बात सामने आ रही है वो सौ फीसदी विश्वसनीय नहीं हैं क्योंकि वो एंटीजन टेस्ट होते हैं और सबसे अहम बात ये कि शरीर में पायी जाने वाली एंटी बॉडी कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए कारगर हैं, ये सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। कई बार दूसरे कोरोना वायरस से लड़ने के लिए बनी एंटीबॉडी भी शरीर में पायी जाती हैं।
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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
डॉ. रेड्डी इसीलिए हर्ड इम्यूनिटी के बजाए 'हर्ड प्रोटेक्शन' शब्द को ज्यादा मुफीद मानते हैं। हर्ड इम्यूनिटी की वजह से उन लोगों में इम्यूनिटी पैदा होती हैं, जिनको संक्रमण नहीं हुआ है और वो दूसरे लोगों की वजह से छुप जाते हैं और बच जाते हैं। यानी वो कुदरती रूप से आपको बीमारी से नहीं बचाता, आप किसी दूसरे के ऊपर बीमारी से बचने के लिए निर्भर होते हैं।

मगर वैक्सीन हर किसी को दी जा सकती है। एक बार प्रभावशाली वैक्सीन लगने पर आपकी सुरक्षा कुदरती रूप से होती है और आप दूसरों पर निर्भर नहीं करते। इसलिए डॉक्टरों और जानकारों की सलाह है कि जब तक वैक्सीन ना आ जाए आप हर्ड इम्यूनिटी का इंतजार ना करें। सोशल वैक्सीन का इस्तेमाल करें। मास्क लगाएँ, हाथ धोएं और दूसरों के साथ दो गज की दूरी बनाए रखें।


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