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CoronaVirus: क्या सर्दियों में ज्यादा कहर बरपाएगा कोरोना? चार विशेषज्ञों से जानें, कितनी खतरनाक होगी स्थिति

Wed, 30 Sep 2020 03:58 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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Coronavirus India - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
धरती के एक बड़े हिस्से में मौसम बदल रहा है, सर्दियां दस्तक दे रही हैं और यही वो समय होता है जब कोल्ड-फ्लू यानी सर्दी-जुकाम आम बात हो जाती है। लेकिन इस बार की सर्दी दुनिया के कई वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रही है। डर इस बात का है कि ठंडी हवाओं के साथ बदलते मौसम की वजह से, कोरोना वायरस अपनी अधिक ताकत के साथ तेजी से फैल सकता है।

कई वैज्ञानिकों को ये आशंका है कि सर्दी के मौसम में दुनिया को कोरोना वायरस की 'सेंकेंड वेव' का सामना करना पड़ सकता है, जो पहले से 'कहीं अधिक जानलेवा' होगी। ये पूर्वानुमान भले ही जटिल और बेहद अनिश्चित लगे, लेकिन उत्तरी गोलार्ध के देशों के लिए चिंता का सबब कहा जा रहा है। सवाल तो यही है कि सर्दी के मौसम में क्या कोरोना वायरस और कहर बरपाएगा, क्या पहले से कहीं अधिक लोग कोरोना वायरस का शिकार बनेंगे?
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कोरोना वायरस - फोटो : PTI

आशंका तो यही है कि कोरोना वायरस ने यदि अपने परिवार के अन्य वायरस की तरह व्यवहार किया तो सर्दियों में इसका संक्रमण बढ़ जाएगा।"

ये दावा है कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इनवॉयरमेंटल हेल्थ साइंसेज डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर मिकेला मार्टिनेज का जो बदलते मौसम के साथ किसी वायरस के स्वरूप में आने वाले बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन करती हैं। मिकेला मार्टिनेज का मानना है कि संक्रामक रोगों के ग्राफ में सालभर उतार-चढ़ाव आता रहता है। वो कहती हैं, "इंसानों में होने वाले हर संक्रामक रोग का एक खास मौसम होता है। जैसे सर्दियों में फ्लू और कॉमन-कोल्ड होता है, उसी तरह गर्मियों में पोलिया और वसंत के मौसम में मीजल्स और चिकन-पॉक्स फैलता है। चूंकि सारे संक्रामक रोग मौसम के हिसाब से बढ़ते हैं, इसलिए ये माना जा रहा है कि कोरोना भी सर्दी में बढ़ेगा।"

वैज्ञानिक इसकी दो मुख्य वजहें मानते हैं। कोरोना वायरस के संबंध में अभी तक जो प्रमाण मिले हैं, वो बताते हैं कि ह्यूमिडिटी जब बहुत अधिक होती है, कोरोना वायरस के लिए फैलना मुश्किल होता है। मिकेला मार्टिनेज के मुताबिक, "फ्लू के मामले में ये होता है कि वायरस तापमान और हवा में मौजूद नमी के हिसाब से फैलता है। ये पक्के तौर पर एक समस्या है। वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से जाएगा या नहीं, ह्यूमिडिटी इसमें अहम रोल अदा करती है।"
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
इसका मतलब ये हुआ कि सर्दियों में तापमान गिरने से जब ह्यूमिडिटी में कमी आएगी, तब ये वायरस हवा में अधिक से अधिक समय तक मौजूद रह सकता है। मिकेला मार्टिनेज कहती हैं, "हम यह जानते हैं कि ये वायरस बंद जगहों में भी तेजी से फैलता है। सर्दियों में लोग बंद जगहों में अधिक रहते हैं। इन दो तथ्यों को जब हम इंसानों के व्यवहार के साथ मिलाकर देखते हैं तो यही लगता है कि सर्दियों में कोरोना वायरस तेजी से फैलेगा।"

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में ऐसे कई अध्ययन किए हैं जो बदलते मौसम के साथ वायरस की ताकत में आए बदलाव को दर्शाते हैं। लेकिन प्रयोगशाला में मिले नतीजों की अपनी सीमाएं होती हैं और जरूरी नहीं कि प्रयोगशाला के बाहर भी वही नतीजे निकलें। पर संक्रमण के दायरे में जब लाखों लोग आ जाते है, तो ये जंगल में लगी आग जैसा हो सकता है।

मिकेला मार्टिनेज कहती हैं, "आप इस तरह सोचिए कि संक्रामक रोग, जंगल में लगी आग की तरह होते हैं। थोड़ी बहुत बारिश से आग कुछ समय के लिए कम हो सकती है, लेकिन बुझती नहीं है। कोरोना मरीज जंगल की आग की तरह पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। इस साल तो ये आग नहीं बुझने वाली।" शायद यही वजह है कि ब्रिटेन में सरकार की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कोरोना वायरस की सेंकेंड वेब में पहले से कहीं अधिक लोगों की जान सकती है।

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कोरोना वायरस मरीज (File Photo) - फोटो : iStock
न्यूयॉर्क टाइम्स में हेल्थ एंड साइंस जर्नलिस्ट कैथरीन वू सर्दी में कोरोना वायरस के मामले बढ़ने की आशंका पर चिंता जताते हुए, इलाज के मौजूदा तरीकों और उसमें इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ओर ध्यान देने की बात कहती हैं। उनका मानना है, "शोधकर्ता कोरोना के खिलाफ कई तरीके आजमा रहे हैं। पहला ये कि शुरुआती दिनों में ही मरीज को कोई ऐसी दवा दी जाए जिससे कोरोना वायरस शरीर के भीतर अपनी मौजूदगी बढ़ा ना सके और संक्रमण को बढ़ने से रोका जा सके। दूसरा ये कि मरीज का इम्यून सिस्टम कमजोर ना हो पाए। इसके लिए रेमडेसिवीर और डेक्सामेथासोन का इस्तेमाल किया जा रहा है।"

ट्रायल्स में इन दोनों ही दवाओं के उत्साहवर्धक नतीजे मिले हैं। डेक्सामेथासोन की उपलब्धता को लेकर फिलहाल कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन रेमडेसिवीर का तीन महीने का पूरा स्टॉक अमेरिका ने खरीद लिया है। वो कहती हैं, "हमेशा से यही होता आया है। महामारी के समय कोई दवा कारगर साबित होती है तो सब उस दवा के पीछे भागते हैं और फिर वो दवा मिलना बंद हो जाती है। मुझे कई डॉक्टरों ने बताया है कि मरीज रेमडेसिवीर के लिए तरस रहे हैं।"
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प्लाज्मा थैरेपी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media
कोरोना वायरस के इलाज के लिए जो तीसरा तरीका आजमाया जा रहा है वो है ब्लड प्लाज्मा थैरेपी। ब्लड प्लाज्मा थैरेपी के बारे में कैथरीन वू का मानना है, "संक्रामक रोगों के इलाज के लिए ये तरीका 100 साल से ज्यादा समय से अपनाया जा रहा है। ये काम तो करता है, लेकिन दिक्कत ये है कि एक व्यक्ति का प्लाज्मा दूसरे व्यक्ति पर असर करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। ब्लड प्लाज्मा थैरेपी, गैम्बलिंग की तरह है।"

कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित देशों में ऐसे लाखों लोग हैं जो संक्रमित होने के बाद सही समय पर मिले इलाज की वजह से ठीक हो गए। लेकिन क्या सर्दी के मौसम में कोरोना वायरस इन लोगों को दोबारा निशाना नहीं बनाएगा? इस सवाल पर कैथरीन वू का मानना है, "अभी तक ऐसे चिंताजनक मामले सामने नहीं आए हैं, जिनमें कोरोना संक्रमण से ठीक हुए व्यक्ति को, दोबारा कोरोना हो गया हो। दोबारा संक्रमित होना बहुत बड़ी समस्या बन सकता है। फिलहाल इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एक बार कोरोना संक्रमण होने के बाद दोबारा संक्रमण नहीं होगा।"
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कोरोना वायरस (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
इम्यूनिटी की ढाल कोरोना वायरस से आखिर कब तक बचाएगी, ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। इससे ना सिर्फ कोरोना को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी, बल्कि असरदार वैक्सीन बनाने का राज भी इसी सवाल में छिपा हुआ है। फिलहाल वैक्सीन को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई है, उसकी वजह से सर्दियों में कोरोना के मामले बढ़ने की आशंका, चिंता की लकीरों को और गहरा कर देती है। "ये बात बहुत स्पष्ट है कि जब अगला फ्लू सीजन आएगा, हमें कोरोना इंफेक्शन की सेकेंड वेव का सामना करना पड़ेगा। सवाल ये है कि सेकेंड वेव से हम कैसे निपटेंगे, बीमारी को फैलने से कैसे रोकेंगे और संक्रमित हुए मरीजों का ठीक से इलाज कैसे करेंगे।" ये सवाल हैं जूडिथ वाल के जो बार्सिलोना यूनिवर्सिटी में 'हेल्थ एंड लेबर इकॉनोमिक्स' की प्रोफेसर हैं।

प्रोफेसर जूडिथ का मानना है कि साल 2020 के पहले आठ महीनों में जो अनुभव हुए हैं, उनसे सबक सीखना जरूरी है। सर्दियों में कोरोना का खतरा बढ़ने की आशंकाओं पर वो कहती हैं, "सिस्टम में तालमेल बढ़ाना होगा। प्राइमरी हैल्थ सेंटर्स और बड़े अस्पतालों में तालमेल की जरूरत है। लोकल लेवल पर ज्यादा से ज्यादा टेस्ट करने होंगे और केवल गंभीर मरीजों को ही बड़े अस्पताल में भर्ती कराना होगा, सेकेंड वेव की नौबत आने पर सिस्टम तभी कारगर तरीके से काम कर पाएगा।"
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कोरोना वायरस जांच (फाइल फोटो) - फोटो : iStock
इतना ही नहीं, सर्दी में कोरोना इंफेक्शन के बढ़ते मामलों पर काबू पाने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रैसिंग और बेहतर तरीके से करना होगा। प्रोफेसर जूडिथ का मानना है कि पहले आठ महीनों में कॉन्टैक्ट ट्रैसिंग ठीक से नहीं हुई, जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा है। फिर भी उनका मानना है, "अब आम लोग, हेल्थ केयर सिस्टम और राजनीतिक नेतृत्व पहले के मुकाबले ज्यादा तैयार हैं। इसलिए मैं इस मामले में आशावादी हूं कि हम सेकेंड वेव से निपट लेंगे। पहले के मुकाबले कम लोगों की जान जाएगी और पहले के मुकाबले कम पाबंदियां लगाई जाएंगी।"

प्रोफेसर जूडिथ का ये विश्वास, हिम्मत तो बढ़ाता है, लेकिन अलग-अलग देशों के अलग-अलग हालातों की वजह से हर जगह लागू नहीं होता। एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज की एक रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि सर्दी के मौसम में हालात बेकाबू होने पर सिर्फ ब्रिटेन में ही 2.51 लाख लोगों की मौत हो सकती है। वैज्ञानिकों को अभी ये नहीं पता कि दुनियाभर में हाहाकार मचाने वाला कोरोना वायरस, जब सर्दियों में परेशान करने वाले बाकी वायरसों के संपर्क में आएगा, तब उनमें किस तरह की होड़ लगेगी।

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जांच के लिए नमूना लेता स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
जियो-पॉलिटिक्स ऑफ इमोशन के लेखक डोमिनिक मोइजी का मानना है कि दुनिया के ज्यादातर देशों का राजनीतिक नेतृत्व ऐसा नहीं है जो कोरोना वायरस की सेकेंड बेव से निपटने के लिए अपने देश में पूरी तरह से तैयार हो। उनका मानना है, "आप भले ही ना डर रहे हों, लेकिन मैं जरूर भयभीत हूं। हम बहुत ही अजीब हालात से गुजर रहे हैं, जिसके पीछे बहुत ही अजीब तरह के लोग हैं।" डोमिनिक मोइजी का पहला तर्क ये है कि पूरब और पश्चिम के लोगों में बड़ा फर्क है और एक की चिंता, दूसरे के लिए बेपरवाही का सबब है।

वो कहते हैं, "हम सब भले ही किसी एक चीज से डरते हो, लेकिन उस भय के प्रति हमारा रवैया अलग-अलग होता है। मसलन एशिया का सिविक सेंस अलग है। लोग वहां मास्क लगा रहे हैं। वो जानते हैं कि व्यक्तिगत जीवन के लिए सामूहिक जीवन का क्या महत्व है। लेकिन पश्चिमी जगत में हम देख रहे हैं कि सामूहिक उत्तरदायित्व को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया जाता है।" डोमिनिक मोइजी यहां एक और दिलचस्प बात कहते हैं। उन्हें लगता है कि "मैं" और "हम" जैसे शब्द, कोरोना जैसी महामारी में बड़ा फर्क ला सकते हैं।

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कोरोना की जांच के लिए नमूना एकत्र करते स्वास्थ्य कर्मी(File Photo) - फोटो : PTI
डोमिनिक मोइजी कहते हैं, "मुझे लगता है कि ये एक बड़ा खतरा है। हमें एक नए संतुलन की जरूरत है जहां पूरब में अधिक व्यक्तिगत आजादी और पश्चिम में अधिक सामूहिक जिम्मेदारी हो।" अलग-अलग देशों में भले ही अलग-अलग मिजाज की सरकारें हैं, लेकिन सर्दी में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ना तमाम सरकारों के लिए खतरे की दस्तक हो सकती है।

डोमिनिक मोइजी के मुताबिक, "कोरोना संकट के स्वास्थ्य संबंधी आयाम, लोकप्रिय नेताओं और उनकी सरकारों के लिए परेशानी की वजह बन सकते हैं। ब्राजील में बोलसोनारो और अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप इसके उदाहरण कहे जा सकते हैं। इसी तरह कोरोना संकट के आर्थिक आयाम उदारवादी लोकतांत्रिक देशों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं।"

आम लोगों की हेल्थ और देश की इकॉनमी में से किसे ज्यादा तवज्जो दी जाए, इस बारे में दुनिया के नेताओं की राय और रुख अलग-अलग रहा है। इस पहलू पर डोमिनिक मोइजी कहते हैं, "कोरोना इंफेक्शन के पहले दौर ने दुनियाभर की लोकप्रिय सरकारों की असलियत सामने ला दी। कोरोना इंफेक्शन के दूसरे दौर में बेहद खराब माली हालत की वजह से लोगों का गुस्सा उस हद तक बढ़ सकता है जो पहले कभी नजर नहीं आया था।"

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नमूना लेता स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
कोरोना संकट ने अलग-अलग देशों के बीच मतभेदों की खाई और भी गहरी कर दी है। इसकी वजह से उन देशों के नेता कोरोना वायरस के खिलाफ मिलकर लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। डोमिनिक मोइजी का मानना है, "अमेरिका और चीन के बीच नया कोल्ड-वॉर कोरोना संकट की वजह से काफी बढ़ गया है। डोनल्ड ट्रंप को अमेरिका के लिए एक बाहरी दुश्मन मिल गया। इसी तरह चीन को भी खुशी हुई कि कोरोना की वजह से अमेरिका की नींद उड़ गई।"

इस तनाव का असर कोरोना वायरस के खिलाफ जारी मेडिकल रिसर्च पर भी पड़ा। क्या इस तनाव से ये भी तय होगा कि वैक्सीन पहले कौन बनाएगा और किसे वैक्सीन देर से मिलेगी? इस बारे में डोमिनिक मोइजी का मानना है, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो देश सबसे पहले कोरोना की वैक्सीन बना लेगा, वो एक तरह से अपनी ताकत का ही प्रदर्शन करेगा। लेकिन इस बात की भी संभावना है कि वैक्सीन बनाने में अलग-अलग देश, एक साथ कामयाब हो जाएं। तब वैक्सीन को ब्लैकमेल करने के लिए किसी हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।"
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नमूना लेते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
सर्दी के मौसम में क्या कोरोना वायरस और कहर बरपाएगा, क्या पहले से कहीं अधिक लोग कोरोना वायरस का शिकार बनेंगे? इस सवाल के जबाव अपने भीतर कई आयाम समेटे हुए हैं। ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि ठंड के दिनों में कोरोना वायरस ज्यादा परेशान करेगा। कोरोना वायरस के पहले दौर में दुनिया तैयार नहीं थी, किसी को कोई अनुभव नहीं था और लोगों ने भी जमकर लापरवाही भी की।

लेकिन अब दुनिया कोरोना वायरस के बारे में पहले से अधिक जानती है और उसके पास कोरोना वायरस से लड़ने का अनुभव भी है। इसलिए तमाम दिक्कतों के बावजूद, सर्दियों में भी कोरोना से निपटा जा सकता है, जरूरत है तो बस गलतियों से सबक सीखने की।
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