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हडि्डयों और जोड़ों को इस तरह प्रभावित करने लगता है क्षयरोग, लक्षणों को न करें नजरअंदाज

Wed, 21 Apr 2021 09:16 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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टीबी बैक्टीरिया हड्डियों और रीढ़ तक को प्रभावित कर देता है - फोटो : Social Media

Medically Reviewed by Dr. Arunesh kumar
डॉ अरूणेश कुमार, रेस्पिरेटरी मेडिसिन और चेस्ट इंस्टीट्यूट, चीफ
पारस हेल्थकेयर, दिल्ली
डिग्री- एम.बी.बी.एस, सीसीएसटी, एमआरसीपी, पीजी- चेस्ट, टीबी
अनुभव- 20 वर्ष

जो लोग समझते हैं कि टीबी यानी क्षयरोग हमारे फेफड़ों को क्षतिग्रस्त करने वाला पल्मोनरी रोग है, उन्हें दोबारा अपनी सोच पर विचार कर लेना चाहिए। चिकित्सा आंकड़े बताते हैं कि भारत में टीबी के 5 से 10 प्रतिशत मरीज बोन टीबी से पीड़ित होते हैं और बोन टीबी के प्रति लापरवाही बरतने के कारण ऐसे मरीजों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है जिसमें टीबी बैक्टीरिया हड्डियों और रीढ़ तक को प्रभावित कर देता है। भारत तकरीबन एक लाख ऐसे लोगों का ठिकाना है जो ऑस्टियोअर्टिकुलर ट्यूबरकोलोसिस से पीड़ित हैं। अगली स्लाइड्स से जानिए किस तरह क्षयरोग हडि्डयों और जोड़ों को प्रभावित करता है।

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यह रोग हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है - फोटो : Pixabay

रीढ़ के जोड़ को नुकसान पहुंचाता है
हालांकि टीबी शुरू-शुरू में फेफड़ों को ही प्रभावित करता है लेकिन धीरे-धीरे यह रक्तप्रवाह से होते हुए शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है जिसे आम तौर पर एक्स्ट्रापल्मोनरी या डिसेमिनेटेड ट्यूबरकोलोसिस कहा जाता है। आम तौर पर लंबी हड्डियों और वर्टिब्रे (रीढ़ के जोड़) को नुकसान एक्स्ट्रापल्मोनरी ट्यूबरकोलोसिस का बड़ा कारण माना जाता है और यह यह रोग हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही इसमें कोई भी हड्डी प्रभावित हो सकती है लेकिन अमूमन यह रीढ़ और वजन सहने वाले जोड़ों मसलन हाथ, कलाइयों और कुहनियों पर ही आक्रमण करता है। दर्द का प्रकार भी क्षयरोग के सटीक स्थान पर निर्भर करता है। मसलन स्पाइन टीबी के मामले में पीठ के निचले हिस्से में दर्द इतना भयंकर होता है कि मरीज को इलाज कराना पड़ जाता है। 

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बोन टीबी पीड़ित मरीजों को सोते समय ज्यादा तकलीफ होती है - फोटो : social media

अर्थराइटिस से अलग है दर्द
बोन टीबी को शुरुआती चरण में अर्थराइटिस रोग होने की भूल हो जाती है। इसलिए इसे अर्थराइटिस के दर्द से अलग समझने के लिए मरीजों को इसके दर्द की प्रकृति पर गौर करना चाहिए। अर्थराइटिस के ज्यादातर मरीजों को रात में सोते समय राहत महसूस होती है। लेकिन बोन टीबी पीड़ित मरीजों को सोते समय ज्यादा तकलीफ होती है क्योंकि इस दौरान बैक्टीरिया की गतिविधि बढ़ जाती है। 

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बोन इंफेक्शन हड्डियों में लगातार दर्द का कारण होता है - फोटो : सोशल मीडिया

कूल्हे और घुटनों के जोड़ होते हैं क्षतिग्रस्त
स्पाइनल ट्यूबरकुलोसि को ‘‘पाॅट्स’’ रोग भी कहा जाता है जो आम तौर पर रीढ़ के दुर्गम हिस्से को प्रभावित करता है। इसमें लगातार और असह्य पीठ दर्द होता है क्योंकि इसके वायरस वर्टिब्रे को सुरक्षा देने वाले डिस्क को क्षतिग्रस्त करते रहते हैं। जोड़ों का टीबी अकड़न के साथ ही दर्द का कारण बनता है। ट्यूबरकुलोसिस ऑस्टियोमायलिटिस यानी बोन इंफेक्शन हड्डियों में लगातार दर्द का कारण होता है और इसके आसपास के टिश्यू की समस्याएं भी बढ़ जाती हैं, यदि कलाई प्रभावित है तो ‘‘कार्पेल टनेल सिंड्रोम’’ जैसी समस्या होती है। जोड़ो के टीबी से प्रभावित व्यक्ति के कूल्हे और घुटनों के जोड़ धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। 


 

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हड्डियां कमजोर होने लगती हैं - फोटो : अमर उजाला

फैलता है स्पाइनल टीबी
इसी तरह इलाज नहीं होने पर स्पाइनल ट्यूबरकुलोसिस एक वर्टिब्रे से दूसरे वर्टिब्रे तक फैल सकता है, हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और इनके बीच कुशन का काम करने वाली डिस्क क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। गंभीर मामलों में रीढ़ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकती है और स्पाइनल काॅर्ड संकुलित हो सकता है, जो शरीर के निचले हिस्से में लकवे का कारण बन सकता है।  


 
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रीढ़ की हड्डी बाहर निकल आती है - फोटो : social media

निकल सकती है कूबड़
स्पाइनल टीबी यदि वर्टिब्रे और डिस्क को क्षतिग्रस्त करने लग जाए तो रीढ़ की हड्डी बाहर निकल आती है और कूबड़ बन जाती है। स्पाइनल टीबी को यदि सही समय पर नहीं पहचाना जाए और इलाज न हो तो यह गंभीर हो सकता है और गंभीर लकवे का कारण बन सकता है जिसे ठीक होने में वर्षों लग जाते हैं। 

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बोन टीबी से पीड़ित लगभग आधे मरीजों के फेफड़े भी संक्रमित हो जाते हैं, - फोटो : Pixabay

फेफड़े होते हैं संक्रमित
टीबी के मरीजों की हड्डियों में ट्यूबरकुलोसिस के सामान्य लक्षण हो भी सकते हैं और नहीं भी, मसलन बुखार, थकान, रात में पसीना आना और बेवजह वजन कम होना आदि। हालांकि बोन टीबी से पीड़ित लगभग आधे मरीजों के फेफड़े भी संक्रमित हो जाते हैं, लेकिन जब यह रोग आम तौर पर सक्रिय नहीं रहता है तो इसका मतलब है कि बोन टीबी से पीड़ित मरीजों को कफ भी न निकले और उन्हें यह अंदाजा भी नहीं मिल पाता है कि वे ट्यूबरकुलोसिस से पीड़ित हैं। इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट होने में वर्षों लग जाते हैं। 

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संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए थोड़ा ज्यादा वक्त लग जाता है - फोटो : social media

इलाज में लगता है वक्त
इसके अलावा बोन टीबी से पीड़ित मरीज आम तौर पर संक्रामक नहीं होते क्योंकि जब तक आप मरीज के मवाद के संपर्क में नहीं आते तब तक कफ के सक्रिय वायरस कणों के जरिये फैलता रहता है। एक और महत्वपूर्ण बात कि बोन टीबी बोन मैरो को प्रभावित कर सकता है इसलिए समय पर और पूरा इलाज ही मरीजों को इस रोग से पूरी निजात दिला सकता है। इलाज की अवधि स्थान और संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करती है। लेकिन फेफड़ों के टीबी के विपरीत बोन एवं स्पाइन टीबी के इलाज में संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए थोड़ा ज्यादा वक्त लग जाता है।

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इसे डाॅक्टर से परामर्श लिए बगैर बीच में कभी नहीं छोड़ना चाहिए।  - फोटो : Pixabay

दवाइयों का संपूर्ण कोर्स है जरूरी
सामान्य हड्डी के टीबी के इलाज में एक साल लग जाता है और स्पाइन टीबी के मामले में लकवे का इलाज और रिकवरी की अवधि भी शामिल होती है जो मामूली, आंशिक या गंभीर लकवे पर निर्भर करता है। एमडीआर टीबी के मामले में मरीजों पर कई दवाइयां बेअसर हो जाती हैं और इससे पूरी तरह उबरने में लंबा समय लग जाता है। टीबी के मरीजों को दवाइयों का संपूर्ण कोर्स करने की ‘‘सख्त’’ हिदायत दी जाती है और इसे डाॅक्टर से परामर्श लिए बगैर बीच में कभी नहीं छोड़ना चाहिए। 

 

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इसके लक्षणों की अनदेखी न करें - फोटो : Social media
बेड रेस्ट है जरूरी
मरीजों को यह समझना जरूरी है कि टीबी की यदि सही समय पर पहचान हो जाए और सही इलाज कराया जाए तो यह रोग पूरी तरह से साध्य है। बोन टीबी के मामले में बेड रेस्ट, अच्छा खानपान, दवाइयां और फिजियोथेरापी आपको सामान्य जिंदगी की ओर लौटाने में मददगार हो सकती हैं। लिहाजा इसके लक्षणों की अनदेखी न करें या इन्हें हल्के में न लें। यह भी याद रखें कि टीबी आम तौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है लेकिन यह रीढ़, मस्तिष्क और किडनी सहित शरीर के अन्य हिस्सों को भी प्रभावित कर सकता है। यदि उचित चिकित्सा नहीं कराई जाए तो यह रोग घातक साबित हो सकता है। 

नोट- यह लेख पारस हेल्थकेयर के रेस्पिरेटरी मेडिसिन और चेस्ट इंस्टीट्यूट, चीफ डॉ अरूणेश कुमार से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉक्टर अरूणेश कुमार को 20 वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपनी डिग्री पटना मेडिकल कॉलेज से ली है। 

अस्वीकरण- अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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