हमारे घरों में प्रचीन काल से जमीन पर बैठकर खाना खाने की परम्परा रही है। वैसे तो डाइनिंग टेबल के आने के बाद जमीन पर खाने की परंपरा खत्म सी हो गई है लेकिन आज भी कुछ घरों में इसे जारी रखा जा रहा है। वैज्ञानिक भी जमीन पर बैठने के फायदे बताते हैं। जमीन पर खाने के लिए जिस अंदाज में बैठ जाता है उसे योग में सुखासन कहते हैं जिससे रीढ़ की हड्डी और कमर का हिस्सा मजबूत होता है।
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खाने से जुड़ी भारतीय परंपराएं सेहत के लिए वरदान, बेहतर पाचन के लिए हाथ से खाएं
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सिर्फ विदेशों में खाने के बाद डेजर्ट यानि मीठा खाने का चलन नहीं है बल्कि भारत में भी लोग खाने के बाद मीठा खाते हैं। खासतौर से गुड़ खाने की परंपरा रही है। इससे पाचन क्रिया अच्छी रहती है।
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आज भी दक्षिणी भारत में केले के पत्तों पर खाना खाया जाता है। केले के पत्तों में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो कैंसर से बचाते हैं।
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हाथों से खाना कुछ लोग पसंद नहीं करते लेकिन इसके कई फायदे रहे हैं। आयुर्वेद बताता है कि जब हम खाने को हाथों से मुंह तक ले जाते हैं तो इंद्रिया जाग्रत होती हैं जो एक योग मुद्रा है। ये मुद्रा शरीर में प्राण को नियंत्रित करता है जिससे पाचन नियंत्रित होता है। इसके अलावा हाथों से खाने से दिमाग को सिग्नल मिलता है जिससे पाचक रस निकलते हैं और खाने का स्वाद बढ़ जाता है।
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घरों में आज भी सलाह दी जाती है कि खाना खाते समय बात नहीं करनी चाहिए। पहले के समय में तो इसे सख्ती से पालन किया जाता था। वैज्ञानिक जो इसके पीछे कारण बताते हैं कि बोलते रहने से खाना गले में फंसने का खतरा रहता है। साथ ही खाने को अच्छे से चबाना चाहिए इसलिए बात करते समय ये संभव नहीं है।
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पुराने समय में जूठा खाने के लिए सख्ती से मना किया जाता था और आज ही भारत में इसे अच्छा नहीं माना जाता। इसके पीछे कारण है किसी दूसरें का जूठा खाने से स्लाइवा मुंह जाएगा जोकि कई बीमारियों का बुलावा देगा।
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पुराने समय में मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाया जाता था जोकि आज कहीं भी नहीं देखा जाता। लोगों का मानना है कि उस समय एल्यूमिनियम या स्टील का अविष्कार नही हुआ था इसलिए मिट्टी के बर्तनों में पकाते थे। लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि मिट्टी के बर्तनों में पकाने से कैल्शियम, पोटेशियम जैसे पोषक तत्व मिलते थे।