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सेहत की बात: पढ़ाई की उम्र में बीमारियों की मार झेल रहे हैं किशोर, सभी माता-पिता दें ध्यान

Fri, 11 Sep 2026 08:06 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

15 से 20 साल की उम्र में भी एनीमिया, अस्थमा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से लेकर थायरॉयड जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। लगातार थकान, सांस फूलने, ज्यादा प्यास लगने, बार-बार सिरदर्द या कमजोरी जैसे संकेतों को सामान्य मानकर टालना सही नहीं है।
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बच्चों की बीमारियां - फोटो : Amarujala.com/AI
15 से 20 साल की उम्र को आमतौर पर ऐसी उम्र माना जाता है, जब शरीर मजबूत होता है और बीमारियां दूर रहती हैं। लेकिन इस दौरान माता-पिता को बच्चों-किशोरों की सेहत को लेकर सबसे ज्यादा अलर्ट रहने की भी जरूरत होती है। किशोरावस्था में शरीर में तेजी से बदलाव आ रहा होता है। इसी दौरान कई ऐसी बीमारियां सामने आ सकती हैं, जिन्हें अक्सर लोग पढ़ाई का तनाव, कमजोरी या मौसम बदलने की वजह मानकर टाल देते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक किशोरों में खून की कमी, अस्थमा, डायबिटीज, मोटापा और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी देखी जाती हैं। कुछ बीमारियों के जोखिम की शुरुआत भी इसी उम्र में हो सकती है। इसलिए अगर बच्चे में कुछ समय से दिक्कतें बनी हुई हैं तो उन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए।

इस उम्र के बच्चों में बार-बार थकना, सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलने, बहुत ज्यादा प्यास लगने, वजन में अचानक बदलाव जैसी शिकायतों पर माता-पिता को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत होती है।

आइए जानते हैं कि किशोरों में कौन-कौन सी बीमारियों का जोखिम ज्यादा देखा जाता रहा है?
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खून की कमी-एनीमिया का खतरा - फोटो : Freepik.com
किशोरों की स्वास्थ्य समस्याएं

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, 15 से 20 साल की उम्र में  शरीर सबसे तेजी से बदलावों का सामना कर रहा होता है, इसलिए  हर लक्षण को बीमारी मानना सही नहीं है। लेकिन बार-बार होने वाले या बढ़ते लक्षणों को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए है। समय पर जांच से कई बीमारियों की पहचान शुरुआती स्तर पर हो सकती है और किसी बड़े खतरे से बचा जा सकता है।

किशोरों में एनीमिया यानी खून में हीमोग्लोबिन की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या है। 
 
  • खासकर लड़कियों में मासिक धर्म के दौरान ज्यादा रक्तस्राव और आयरन की कमी इसका कारण बन सकती है।
  • लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर आने और हाथ-पैर ठंडे रहने जैसी दिक्कतें बनी रहती हैं तो डॉक्टर की सलाह से हीमोग्लोबिन और जरूरत के अनुसार आयरन की जांच करानी चाहिए।
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अस्थमा की समस्या - फोटो : Freepik
अस्थमा और सांस से जुड़ी समस्याएं

किशोरावस्था में अस्थमा का खतरा भी देखा जाता रहा है। सांस की नलियों में सूजन और संवेदनशीलता के कारण ये दिक्कत होती है। 
 
  • अस्थमा के शिकार बच्चों-किशोरों में बार-बार सांस फूलने, सीने में जकड़न, खांसी या सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आ सकती है। 
  • व्यायाम, धूल, धुआं, परागकण या कुछ एलर्जी इसे बढ़ा सकती हैं।
  • अगर बच्चे को दौड़ने या खेलते समय बार-बार सांस फूलती है, रात में खांसी आती है या मौसम बदलने पर सांस की परेशानी बढ़ती है, तो समय रहते डॉक्टर से मिलकर इसके कारणों का पता जरूर लगाएं।

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बच्चों में डायबिटीज के मामले - फोटो : Adobe Stock
किशोरों में टाइप-1 के मामले

डायबिटीज सिर्फ बढ़ती उम्र की बीमारी नहीं है। किशोरों में टाइप-1 डायबिटीज के मामले सबसे ज्यादा रिपोर्ट किए जाते हैं।
 
  • वहीं मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली कुछ बच्चों में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ा देती है।
  • अगर बच्चे को बार-बार पेशाब आने, बहुत ज्यादा प्यास लगने, बिना वजह वजन कम होना, कमजोरी और धुंधला दिखाई देने जैसी दिक्कतें हैं तो शुगर की जांच जरूर करा लें।
  • माता-पिता में किसी को डायबिटीज है तो ये खतरा और भी बढ़ जाता है।
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बच्चों में ब्लड प्रेशर की समस्या - फोटो : Adobe stock photos
हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉयड की गड़बड़ी
 
  • लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी के कारण किशोरों में हाई ब्लड प्रेशर का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इसके कारण अक्सर सिरदर्द, चक्कर आने, धुंधला दिखाई देना या असामान्य थकान जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। अगर बच्चे का वजन अधिक है, वह शारीरिक रूप से कम मेहनत करता है और चिप्स या जंक फूड ज्यादा खाता है तो ये चीजें ब्लड प्रेशर का खतरा और भी बढ़ा सकती हैं।
 
  • इसी तरह किशोरों-बच्चों में थायरॉयड की दिक्कत भी हो सकती है। थायरॉयड हार्मोन शरीर की ऊर्जा और कई अन्य प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है। थायरॉयड कम होने पर थकान, ठंड लगने, कब्ज और वजन बढ़ने की दिक्कत हो सकती है। वहीं ज्यादा सक्रिय थायरॉयड में वजन कम होने, दिल की धड़कन बढ़े रहने, घबराहट और पसीना ज्यादा आने की समस्या देखी जाती है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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