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कोविड-19: क्या कोरोना से बचा सकता है विटामिन-डी? जानिए शरीर को क्यों है इसकी जरूरत

Thu, 08 Apr 2021 07:44 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
विटामिन डी हड्डियों, दांतों और मांसपेशियों को मजबूत करता है और स्वस्थ रखता है, लेकिन अब वैज्ञानिकों को लगता है कि ये शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली को भी मजबूत करता है और इसी वजह से ये कोविड-19 जैसे वायरस से लड़ने में भी कारगर साबित हो सकता है। विटामिन डी को आमतौर पर धूप से मिलने वाले विटामिन के रूप में जाना जाता है, क्योंकि ये हमारे शरीर में तब बनता है जब त्वचा पर सूरज की किरणें पड़ती हैं। ये शरीर को कैल्शियम और फॉस्फेट पचाने में मदद करता है जो हड्डियों, दांतों और मांसपेशियों को मजबूत और स्वस्थ रखते हैं। ऐसा शोध में भी साबित हुआ है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
बॉयोमेडिकल रिसर्च से पता चलता है कि रिकेट्स, ऑस्टियोमलेशिया और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी हड्डी की बीमारियां विटामिन डी की कमी से ही होती हैं, लेकिन ऑयरलैंड के यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क में विटामिन डी और पोषण के विशेषज्ञ प्रोफेसर केविन कैशमैन का कहना है कि विटामिन डी की भूमिका इससे भी अधिक है। वो कहते हैं, 'जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है, ऐसे लोगों के लिए वायरस से होने वाले संक्रमण के चपेट में आने का खतरा भी अधिक होता है। ये ऐसी बाते हैं जिन पर इस साल खूब चर्चा हो रही है।' कैशमैन कहते हैं, 'बीते दो दशकों में विटामिन डी को लेकर नई समझ बनी है और पता चला है कि ये हड्डियों के बाहर भी भूमिका निभाता है। विटामिन डी प्रतिरोधक प्रणाली को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
क्या विटामिन डी कोविड-19 से लड़ाई में मदद कर सकता है?

प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं कि वैज्ञानिक ये मान रहे हैं कि विटामिन डी की मामूली कमी से भी शरीर में कैंसर, हृदयरोग संबंधी बीमारियों, डायबिटीज और संक्रामक एवं सूजन संबंधी रोगों का खतरा बढ़ जाता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन क्या विटामिन डी और कोविड 19 का कोई सीधा संबंध हैं?

प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं कि शीर्ष वैज्ञानिक समीक्षाओं से संकेत मिलता है कि 'इस बात के तो पर्याप्त सबूत हैं कि विटामिन डी की कमी और शरीर पर कोविड-19 के असर में संबंध हैं। लेकिन अभी इतने पक्के सबूत नहीं है कि लोगों को कोविड से बचने के लिए विटामिन डी के सप्लीमेंट लेने की सलाह दी जा सके।' हालांकि प्रोफेसर कैशमैन मानते हैं कि कोविड-19 महामारी ने विटामिन-डी की कमी को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। वो मानते हैं कि इस दिशा में रिसर्च सही ट्रैक पर है। वो कहते हैं, 'आज आम राय ये है कि अभी पक्के सबूत नहीं हैं, लेकिन ट्रायल चल रहे हैं और नए सबूत मिल रहे हैं। कोविड-19 को अभी एक साल ही हुआ है। मजबूत डाटा मिलने में समय लगता है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'हमें ये तो पक्का पता है कि विटामिन डी हमारी हड्डियों को मजबूत रखता है, लेकिन अगर ये भी पता चला कि इसका सांस संबंधी बीमारियों पर भी सकारात्मक असर होता है तो ये एक अतिरिक्त फायदा होगा।' वो कहते हैं, 'इस दिशा में शोध रोचक स्थिति में तब होंगे जब हम ये स्वीकार कर लेंगे कि विटामिन डी की कमी से सांस संबंधी बीमारियां, फ्लू और सर्दी आदि भी प्रभावित होते हैं।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
विटामिन डी मिलता कहां से है?

प्रोफेसर कैशमैन के मुताबिक विटामिन डी मुख्य तौर पर धूप से मिलता है, लेकिन इसकी मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि आपकी चमड़ी पर धूप कितनी तेज पड़ रही है। ये ऐसी चीज है जो इस बात से प्रभावित होती है कि आप दुनिया में कहां और किस समय होते हैं। एक साधारण नियम ये है कि जितना आप भूमध्य रेखा के करीब होंगे, उतना ज्यादा विटामिन डी आपको मिलेगा। लेकिन बावजूद इसके भारत और कई अफ्रीकी देशों के लोग विटामिन डी की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। फिर ऐसा क्यों है?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'इसकी कई वजहें हैं, जैसे कि लोग कैसे कपड़े पहनते हैं, अपने शरीर को कितना ढंका रखते हैं और क्या तेज धूप की वजह से वो छांव में अधिक रहते हैं।' इसके अलावा प्रदूषण भी धूप को रोक सकता है। एक और वजह चमड़ी का रंग भी हो सकता है। यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक यूरोप में 12 प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी है। लेकिन जब आप यूरोप के कई नस्ली समूहों में देखते हैं, तो विटामिन डी की कमी दो से तीन गुणा तक बढ़ जाती है, क्योंकि मेलानिन, प्राकृतिक धूप अवरोधक की तरह काम करता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हमें अपनी डाइट में विटामिन डी कैसे मिलता है?

भोजन भी विटामिन डी का स्रोत हो सकता है। तैलीय मछली, लाल मांस, अंडे की जर्दी और दूध उत्पाद भी विटामिन डी का स्रोत हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर लोगों के लिए सिर्फ भोजन से पर्याप्त विटामिन डी हासिल करना मुश्किल है। प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'विटामिन डी में समृद्ध अधिकतर खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो पशुओं से मिलते हैं जबकि पौधों में विटामिन डी नहीं होता है। इसका मतलब ये है कि शाकाहारी लोग या ऐसे लोग जो महंगा मांसाहार नहीं खरीद सकते हैं, उनमें विटामिन डी की कमी होने की आशंका ज्यादा होती है।' 

मंगोलिया में काम करने वाली संस्था क्रिस्टीना नोबल चिल्ड्रेन फाउंडेशन से जुड़ीं अमारा बोर कहती हैं कि विटामिन-डी वाला भोजन काफी महंगा होता है और कम आय वाले लोगों की पहुंच से बाहर होता है। वो कहती हैं, 'हालांकि सरकार ने आटे में विटामिन-डी मिलाने का फैसला लिया है और ये सबसे ज्यादा खपत वाला खाद्य पदार्थ भी होता है। ऐसे में विटामिन डी की कमी को दूर करने का ये एक प्रभावी तरीका हो सकता है।'

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क्या आप अधिक विटामिन डी ले सकते हैं?

पब्लिक हेल्थ में काम करने वाली अधिकतर संस्थाएं रोजाना कम से कम 10 माइक्रोग्राम विटामिन-डी लेने की सलाह देती हैं, लेकिन यदि सौ माइक्रोग्राम से अधिक विटामिन डी लिया जाए, तो ये नुकसानदेह भी हो सकता है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में विटामिन डी लेने से हड्डियों में कैल्शियम की मात्रा बढ़ सकती है, जिसकी वजह से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और किडनी और दिल को भी नुकसान पहुंच सकता है। प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'कई बार आप अलग-अलग गोलियां खाने से या फिर ऐसे सप्लीमेंट लेने से भी विटामिन डी की अधिकता का शिकार हो सकते हैं, जिनमें विटामिन डी ज्यादा होता है, लेकिन समृद्ध खाद्य पदार्थ के जरिये विटामिन डी की अधिकता होना मुश्किल है, क्योंकि इनमें बहुत कम मात्रा में ये विटामिन मिलाया जाता है।' 

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इसके अलावा विटामिन डी और कैसे मिल सकता है?

विटामिन की गोलियां या सप्लीमेंट लेना भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन दुनिया की बड़ी आबादी के लिए ये महंगा साबित हो सकता है। प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'ऐसे में फूड चेन में ही विटामिन मिलाना एक विकल्प हो सकता है। इसे उन खाद्य पदार्थों में मिलाया जा सकता है, जिन्हें हम आमतौर पर रोजाना खाते हैं।' इस प्रक्रिया को फोर्टिफिकेशन कहा जाता है। ये तकनीक विकसित देशों में करीब अस्सी सालों से इस्तेमाल की जा रही है और विकासशील देशों में भी अब चलन में हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि दुनियाभर में विटामिन डी की कमी से निबटने का ये सबसे कारगर तरीका भी है। 

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किन खाद्य पदार्थों को समृद्ध किया जा सकता है, ये जगह पर निर्भर करता है, लेकिन दूध आधारित उत्पाद और सोया, ओट्स, बादाम, चावल, फ्रूट जूस, और खाद्य तेलों में भी इसे मिलाया जा सकता है। यहां तक अंडों में भी विटामिन मिलाया जा सकता है। विटामिन डी की कमी का स्तर क्या है, इसके हिसाब से सरकारें या तो खाद्य पदार्थों में विटामिन मिलाने के कार्यक्रम को अनिवार्य कर सकती हैं या फिर इसे उत्पादकों पर छोड़ सकती हैं। 

इस समय कनाडा और फिनलैंड जैसे देशों में ही खाने में विटामिन डी मिलाया जा रहा है। इन दोनों ही देशों में प्राकृतिक धूप लोगों को कम ही मिल पाती है। फिनलैंड की हेल्सिंकी यूनिवर्सिटी में खाद्य पदार्थों और पोषण के विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस्टेल लैमबर्ग-अलार्ड्ट कहते हैं, 'विचार ये है कि ऐसे खाद्य पदार्थ में विटामिन डी मिलाया जाए जो आमतौर पर लोग खाते हैं ताकि लोगों को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी मिलता रहे, बिना ये सोचे हुए कि वो क्या खा रहे हैं।' 
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प्रोफेसर कैशमैन मानते हैं कि महामारी फिनलैंड की तरह दूसरों देशों को भी सोचने के लिए प्रेरित करेगी कि आम लोगों को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी कैसे दिया जाए। ये बहुत महंगा भी नहीं है। उदाहरण के तौर पर एक टन आटे में विटामिन डी मिलाने पर कुछ रुपये ही खर्च होते हैं। एक स्वस्थ और पोषित आबादी होने के दीर्घकालिक फायदे भी हैं। जर्मनी में हुए के शोध से पता चला है कि ब्रेड में विटामिन बढ़ाने से 65 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में फ्रैक्चर होने की संभावना दस प्रतिशत तक कम होगी, जिससे स्वास्थ्य पर सालाना खर्च में 38 करोड़ डॉलर तक की कमी आएगी। प्रोफेसर कैशमैन कहते हैं, 'ये बहुत बड़ी बचत है।' 
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