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Coronavirus Vaccine: क्या भारत के लिए सबसे बेहतर है ऑक्सफोर्ड वैक्सीन? जानिए इसके बारे में सबकुछ

Tue, 24 Nov 2020 09:10 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत में कोरोना वैक्सीन - फोटो : Pixabay
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भारत में कोरोना के बिगड़ते हालात पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। इस बैठक में उन्होंने कोरोना से लड़ाई में 'टेस्ट, ट्रेस और आईसोलेट' के मूल मंत्र को फिर से दोहराया। इसके अलावा वैक्सीन पर एक प्रेजेंटेशन भी राज्यों के साथ साझा की गई। उन्होंने कहा, 'कोरोना वैक्सीन को लेकर दुनियाभर से खबरें आ रही हैं। दुनिया में और हमारे देश में भी कई वैक्सीन रिसर्च का काम आखिरी स्टेज में पहुंचा है। भारत सरकार हर डेवलपमेंट पर नजर रखे हुए है। उनसे संपर्क में भी है। अभी ये तय नहीं है कि वैक्सीन की एक डोज होगी, दो डोज होगी या तीन डोज होगी। ये भी तय नहीं है कि इस वैक्सीन की कीमत कितनी होगी, उस वैक्सीन की कीमत कितनी होगी। यानी इन सभी सवालों के जवाब हमारे पास नहीं हैं। जो इसके बनाने वाले हैं उनमें सरकारें भी हैं, कॉरपोरेट वर्ल्ड भी है, अलग-अलग प्रतिस्पर्धा है, देशों के भी अपने-अपने राजनयिक हित भी हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी इंतजार करना पड़ता है। इसलिए वैश्विक संदर्भ में ही हमें भी आगे बढ़ना पड़ेगा।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दरअसल सोमवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कोरोना वैक्सीन को लेकर चार सवाल पूछे थे। उन्होंने लिखा था कि 
  • भारत सरकार किस कोरोना वैक्सीन कैंडिडेट को चुन रही है और क्यों?
  • किन लोगों को वैक्सीन लगाने में प्राथमिकता दी जाएगी और कैसे वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाया जाएगा?
  • क्या पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल मुफ्त टीकाकरण के लिए किया जाएगा?
  • कब तक भारत के सभी लोगों का टीकाकरण संभव हो पाएगा? 
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प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : Twitter
कोरोना वैक्सीन पर प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?

इनमें से पीएम केयर्स फंड के सवाल के अलावा प्रधानमंत्री ने दूसरे सभी सवालों का जवाब मंगलवार की बैठक में दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, भारत सरकार ने फिलहाल किसी कोरोना वैक्सीन के कैंडिडेट को नहीं चुना है। वैक्सीन किसको पहले लगेगी, इसका मोटा खाका तैयार है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन और राज्य सरकारों से बातचीत के बाद ही फाइनल ड्राफ्ट तैयार होगा। इसके पहले भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन कह चुके हैं कि हेल्थ वर्कर्स और 65 साल से अधिक उम्र वालों को कोरोना के टीकाकरण अभियान में प्राथमिकता दी जाएगी। 



उन्होंने ये भी बताया कि टीकाकरण का अभियान लंबा चलने वाला है। कुछ जानकारों की राय में इसमें कई साल लग सकते हैं, लेकिन सब कुछ वैक्सीन आने और उसके कारगर होने, उसके कितने डोज की जरूरत पड़ेगी, इन सब बातों पर निर्भर करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये भी साफ किया कि वैक्सीन के लिए स्पीड भी जरूरी है और सेफ्टी भी। इसलिए जो भी वैक्सीन भारत सरकार अपने नागरिकों को देना तय करेगी, वो सभी वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरेगी। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस समय वैक्सीन की रेस में दो भारतीय वैक्सीन आगे चल रहे हैं, जिनमें से एक भारत बायोटेक और आईसीएमआर के साथ मिल कर बनाई जा रही कोवैक्सीन है। दूसरे देशों में जो प्रयास चल रहे हैं, उनमें से ऑक्सफोर्ड की एस्ट्राजेनेका वैक्सीन पर भारत सरकार का सबसे बड़ा दांव लगा है। हालांकि केंद्र सरकार ने खुलकर इस बारे में कभी नहीं कहा कि उन्होंने ऑक्सफोर्ड की एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के लिए अब तक कोई करार किया है या नहीं या फिर वैक्सीन के लिए ऑर्डर भी दिए हैं या नहीं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ऑक्सफोर्ड वैक्सीन क्या भारत के लिए सबसे बेहतर है?

भारत में अब तक जिन वैक्सीन के शुरुआती नतीजे सामने आए हैं, उनमें से ऑक्सफोर्ड वैक्सीन सबसे उपयुक्त मानी जा रही है, जानकार इसके पीछे तरह तरह की दलीलें दे रहे हैं। जैसे-

ऑक्सफोर्ड वैक्सीन को स्टोर करना आसान है

भारत सरकार अगर ऑक्सफोर्ड वैक्सीन खरीदने का फैसला करती है, तो भारत सरकार को वैक्सीन स्टोर करने के लिए अलग से बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन को नार्मल फ्रिज कंडीशन में स्टोर किया जा सकता है जबकि फाइजर और मॉडर्ना वैक्सीन के लिए अलग से कोल्ड स्टोरेज पर काम करना होगा। इन दोनों वैक्सीन को माइनस 20 से माइनस 70 डिग्री के तापमान की जरूरत पड़ेगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत ऑक्सफोर्ड वैक्सीन खरीदेगा तो वैक्सीन और पैसों की बर्बादी कम होगी

अगर स्टोरेज के तरीके बहुत ही स्पेसिफिक होते हैं, तो वैसी सूरत में गलत तरीके से रखने पर वैक्सीन की बर्बादी की आशंका बढ़ जाती है। किसी भी कारण से वो तापमान नहीं मिल पाया तो वैक्सीन की पूरी खेप बर्बाद हो सकती है। इससे वैक्सीन के साथ-साथ पैसों की भी बर्बादी होगी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ऑक्सफोर्ड वैक्सीन की कीमत भारत के हिसाब से कम है

सब जानते है कि ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के साथ भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ने उत्पादन के लिए करार किया है। किसी दूसरे देश में बनने वाली वैक्सीन भारत में बनने वाली वैक्सीन से हर हाल में सस्ती पड़ेगी। भारत की जनसंख्या के हिसाब से वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने में सरकार सफल होंगी। भारत में वैक्सीन बनाने का फायदा इस तरह से भी मिल सकता है कि वैक्सीन दूसरे देशों के मुकाबले भारत सरकार को पहले मिले। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पहले की स्लाइड में लिखे दावों में कितना दम है?

लेकिन आईसीएमआर के साथ पूर्व में जुड़े वैज्ञानिक रमन गंगाखेडकर कहते हैं, 'आज की तारीख में उपलब्ध डेटा के आधार पर ये कहना बहुत ही मुश्किल है कि भारत सरकार किस वैक्सीन को खरीदेगी। अभी तक जिन तीन-चार वैक्सीन के शुरुआती ट्रायल के नतीजे सामने आए हैं, वो ये बताने के लिए काफी नहीं हैं कि वो वैक्सीन सुरक्षित हैं। वैक्सीन इस्तेमाल के लिए सुरक्षित है इसका पता कम से कम छह महीने के फॉलो-अप के बाद ही चलता है। अभी तक किसी वैक्सीन के फाइनल ट्रायल को छह महीने नहीं हुए हैं। हर दूसरी वैक्सीन आज दावा कर रही है कोरोना से बचाव में वो 90 फीसदी सफल है, कोई 95 फीसदी सफल है, लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नतीजे बहुत कम दिनों के आधार पर निकले हैं। समय बीतने के साथ इस दर में कमी आना स्वाभाविक है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रमन गंगाखेडकर फिलहाल पुणे के सीजी पंडित नेशनल चेयर से जुड़े हैं। उन्होंने कहा, 'समय बीतने के साथ वैक्सीन लगाने के बाद भी लोग वायरस के सामने एक्सपोज होंगे, तब असल में पता चलेगा कि वैक्सीन कितने वक्त के लिए कारगर है।'  

इसलिए हमें हर वैक्सीन कैंडिडेट के फाइनल रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। इतना जरूर है कि ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के तीसरे फेज का ट्रायल फाइजर और मॉडर्ना के मुकाबले ज्यादा दिनों तक चला, लेकिन औसतन कितने दिन तक वॉलेंटियर का फॉलो-अप किया गया, ये अभी भी साफ नहीं है। रमन गंगाखेडकर कहते हैं, आज की तारीख में ये कहना कि ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ही भारत के लिए सबसे अच्छी है, ये ऐसा ही है कि चुनाव से पहले अखबार में उम्मीदवारों की स्टोरी पढ़ कर ये बता दें कि जीत किसकी हुई है। इस समय में ऐसा कुछ भी कहना बेमानी है।
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