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Coronavirus Vaccine: भारत में आखिर कोरोना वैक्सीन को जल्दबाजी में मंजूरी क्यों दी गई? जानिए सबकुछ

Thu, 07 Jan 2021 02:23 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भारत में कोरोना वैक्सीन - फोटो : iStock
कोरोना वायरस की वैक्सीन जिसे करोड़ों लोगों को दिया जाना है, उसके आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी क्लिनिकल ट्रायल मोड में कैसे दी जा सकती है? भारत के जानेमाने वैक्सीन एक्सपर्ट गगनदीप कांग, इसके जवाब में कहते हैं, 'नो आइडिया, या तो आप क्लिनिकल ट्रायल करते हैं या फिर नहीं करते हैं।' क्लिनिकल ट्रायल तीन चरणों का प्रोसेस है। इससे ये समझने में मदद मिलती है कि वैक्सीन की प्रतिरोधक क्षमता कैसी है और क्या इसके कोई साइड-इफेक्ट भी हैं। रविवार को भारत के ड्रग रेग्यूलेटर ने स्वदेशी वैक्सीन कोवैक्सीन को आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी, वो भी बिना तीसरे चरण के ट्रायल के। भारत सरकार के समर्थन से तैयार की गई इस वैक्सीन को भारत बायोटेक नाम की कंपनी ने बनाया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
प्रतिबंधित इस्तेमाल की मंजूरी

ये कंपनी पिछले 24 सालों से वैक्सीन बना रही है, अब तक इसने 16 वैक्सीन बनाए हैं और 123 देशों में इन्हें एक्सपोर्ट किया है। रेग्यूलेटर के मुताबिक वैक्सीन को 'क्लिनिकल ट्रायल मोड में जनहित को ध्यान में रखते हुए आपात स्थिति में प्रतिबंधित इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है।' ऐसा तब किया गया है जब वैक्सीन हजारों लोगों दी जा रही है और इसके असर और सुरक्षा को लेकर अभी भी जांच चल रही है। रेग्यूलेटर ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रजेनेका की वैक्सीन को भी अप्रूवल दिया है। रेग्यूलेटर ने आश्वासन दिया है कि टीका 'सुरक्षित है और एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रदान करता है', लेकिन अधिकांश वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क, जो कि एक वॉचडॉग है, उनके मुताबिक 'एक अधूरे अध्ययन वाले टीके को मंजूरी देने के पीछे का वैज्ञानिक तर्क' समझ से बाहर है। 

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कोवैक्सिन - फोटो : पीटीआई
बायोटेक ने वैक्सीन को सुरक्षित बताया

भारत बायोटेक का कहना है कि उसके पास कोवैक्सीन के दो करोड़ टीके तैयार हैं और साल के अंत तक दो शहरों में इनकी चार फैसिलिटी में 70 करोड़ टीके बनाने का लक्ष्य है। फर्म के अध्यक्ष डॉ. कृष्णा एला कहते हैं, 'हमारा टीका 200 फीसदी सुरक्षित है।' डॉ. एला ने कहा कि बंदरों और हैम्स्टर्स पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि कोवैक्सिन कोरोना संक्रमण के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि 26,000 में से लगभग 24,000 वॉलंटियर्स तीसरे चरण के परीक्षण में भाग ले चुके हैं और फरवरी तक वैक्सीन की एफिकेसी यानी वैक्सीन कितनी प्रभावी है, उसका डेटा उपलब्ध होगा। वैज्ञानिक संदेह में हैं। देश के प्रमुख वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने बताया, 'चूंकि परीक्षण के तीसरे चरण का कोई डेटा नहीं है, हम नहीं जानते कि यह टीका कितना प्रभावी होगा।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या लोगों को ट्रायल के तहत वैक्सीन दी जाएगी?

'दो चरणों के परिणाम से हमें ये पता है कि टीका सुरक्षित है, क्या होगा यदि हम बिना एफेकेसी जाने टीका लगाने लगें और बाद में पता चले कि ये केवल 50 फीसदी प्रभावी हैं? फिर क्या ये जिन्हें दिया जाएगा, उनके लिए उचित होगा।'  यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि रेग्यूलेटर के यह कहने का क्या मतलब है कि वैक्सीन को 'क्लिनिकल ट्रायल मोड' में दिया जाएगा। आमतौर पर किसी परीक्षण में, वॉलंटियर्स को यह नहीं बताया जाता है कि उन्हें वैक्सीन दी जा रही है या प्लेसबो। कई लोगों को स्वास्थ्य कारणों से भाग लेने नहीं दिया जाता। 

डॉ. एला का कहना है कि वैक्सीन दिए जाने के बाद उनकी फर्म उन लोगों को मॉनीटर करती रहेगी, लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो इससे वैक्सीन देने की प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी। तो क्या रेग्यूलेकर ये कहना चाह रहे थे कि कोक्सैक्सिन को 'क्लिनिकल ट्रायल के चौथे चरण' में दिया जाएगा और ये पहले से चल रही स्टडी का हिस्सा होगा?डॉ एला ने कहा, 'हमें पूरी बात समझने के लिए कुछ समय दें। हम नहीं जानते कि क्या इसे एक परीक्षण के रूप में माना जाएगा।' लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
वैक्सीन को लेकर भ्रम की स्थिति

कोविड टास्क फोर्स के एक वरिष्ठ सदस्य ने ये कह कर और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी कि कोवैक्सिन को एक बैकअप वैक्सीन की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, किसी आपातकाल परिस्थिति से निपटने के लिए, जब केस बहुत तेजी से बढ़ने लगेंगे। लेकिन कुछ जानकार इससे हैरान हैं। महामारी पर शोध करने वाले एक वरिष्ठ शोधकर्ता ने कहा, 'क्या इसका मतलब ये है कि किसी आपातकाल परिस्थिति में कुछ लोगों को वैसी वैक्सीन दी जाएगी, तो कितनी प्रभावी है, ये हमें पता ही नहीं।'  

हालांकि, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ प्रो पॉल ग्रिफिन का कहना है कि वैक्सीन को ऐसे आपातकालीन परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जाना नया नहीं है। आमतौर पर ऐसा तब होता है जब पहले से चल रहे परीक्षण के डेटा से पता चलता है कि वैक्सीन 'सुरक्षित और प्रभावकारी है।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले एक करोड़ की संख्या को पार कर चुके हैं, अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ा है। सरकार की कोशिश है कि जुलाई तक 30 करोड़ का टीकाकरण किया जाए। लेकिन टीके प्रकिया तब शुरू हो रही है, जब नए मामलों की संख्या में कमी आई है। वैक्सीन बनाने के लिए बायोटेक एक जानामाना नाम है जिसने 20 देशों में 7 लाख से अधिक लोगों पर परीक्षण किया है। तो फिर सरकार ने अप्रूवल देने में इतनी जल्दीबाजी क्यों की? क्या कुछ हफ्तों तक वैक्सीन के प्रभाव का डेटा आने का इंतजार नहीं किया जा सकता था? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विपक्ष ने की आलोचना

कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने सरकार के इस कदम की आलोचना की। उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार 'काम से ज्यादा नारों को ऊपर रखती है।' इस मामले में वो 'वैक्सीन राष्ट्रवाद के नाम पर सीना ठोकना चाहते हैं।' उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर दिखने के लिए उन्होंने कॉमन सेंस और सालों से चले आ रहे प्रोटोकॉल को नजरअंदाज किया। भारत वैक्सीन बनाने का पावर हाउस है। दुनियाभर के 60 प्रतिशत वैक्सीन का उत्पादन यहां होता है। दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन प्रोग्राम भारत में चलता है जिसके तहत 5.5 करोड़ महिलाओं और नवजात को 39 करोड़ वैक्सीन दिए जाते हैं। कोवैक्सीन के कारण पैदा हुए भ्रम से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। वायरस जिस तरह से बदल रहा है, मुमकिन है कि भविष्य में हमें एक से अधिक वैक्सीन की जरूरत पड़े। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, 'सभी टीकों को एफिकेसी और सुरक्षा के पर्याप्त सबूतों के आधार पर स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए। टेस्ट और खुराक को लेकर भी स्पष्टता होनी चाहिए।' उन्होंने कहा, 'विज्ञान और सभी के विश्वास के लिए वैक्सीन से संबंधित सभी चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित किया जाता है। हम इस लड़ाई को नहीं जीत सकते हैं यदि हम उन हथियारों पर संदेह करते हैं जो हमें सौंपे जा रहे हैं।' 
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