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पीपीई किट से पर्यावरण को खतरा: गलने में लगेंगे 500 साल, तो जलाने में निकलेगी ये जहरीली गैस

Sat, 05 Jun 2021 02:16 PM IST
प्रकाश चंद जोशी हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पीपीई किट अब हमारे पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आ रही है - फोटो : istock
डॉ. राजन गांधी
फिजिशियन
अनुभव - 25 वर्ष

Medically Reviewed by Dr. Rajan Gandhi

कोरोना वायरस की वजह से हर कोई परेशान है। जहां एक तरफ लोग इससे संक्रमित हो रहे हैं, तो वहीं ये वायरस लोगों की जान भी ले रहा है। भले ही आज हमारे पास इस वायरस से लड़ने के लिए मास्क, सैनिटाइजर, पीपीई किट जैसे हथियार हैं। लेकिन एक वक्त वो भी था, जब हमारे पास ये चीजें नहीं थी या न के बराबर थी। वहीं, बात अगर पीपीई किट की करें, तो जो पीपीई किट हमें कोरोना से बचाने में अहम योगदान निभा रही है, जिसे हमारे डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ दिन-रात पहनकर लोगों का इलाज कर रहे हैं, वो ही पीपीई किट अब हमारे पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आ रही है। जी हां, चौंकिए मत लेकिन ये सच है क्योंकि पीपीई किट को गलने में 500 साल लगेंगे। यही नहीं इससे कई और भी खतरे हमारे पर्यावरण को हो सकते हैं। तो चलिए जानते हैं कि आखिर इस पीपीई किट से हमारे पर्यावरण पर क्या खतरे मंडरा रहे हैं।
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ppe kit - फोटो : अमर उजाला
पीपीई किट को 500 साल लगेंगे गलने में
  • दरअसल, एक पीपीई किट में पॉलीप्रोपोलीन से बना बॉडी सूट, लोअर, हेट कवर, बूट, कवर, ग्लव्स और गॉगल्स शामिल होते हैं और अलग से एन95 मास्क भी इसमें शामिल होता है। ऐसे में अगर इसे इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाए, तो इसे गलने में 500 साल लगेंगे। ऐसे में ये हमारे पर्यावरण के लिए किसी खतरे से कम नहीं है, क्योंकि अगर इस तरह इन्हें फेंका जाता है और एक पीपीई किट को गलने में 500 साल लगते हैं, तो इससे समझा जा सकता है कि हमारे पर्यावरण पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा।  
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PPE KIT - फोटो : अमर उजाला
इसलिए लगता है 500 साल का समय
  • अब ये समझना जरूरी है कि आखिर इस्तेमाल के बाद किसी पीपीई किट को गलने में 500 साल का समय क्यों लगता है? भारत में जो ज्यादातर पीपीई किट बनती हैं, वो सिंगल यूज पॉलीप्रोपोलीन से बनती हैं। इसमें 85% पॉलीप्रोपोलीन, 10% पॉलीकार्बोनेट, 4% रबड़ और 1% एल्यूमीनियम (मास्क की पत्ती) होता है। वहीं, पॉलीप्रोपोलीन को हमारे वातावरण में गलने के लिए 500 साल का समय लगता है, और हमारी ज्यादातर (85%) पीपीई किट इसी से बनती हैं।

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PPE kit - फोटो : istock
जलाने पर इतना खतरा
  • वहीं, अगर इस्तेमाल करने के बाद पीपीई किट को किसी भट्टी में जलाया जाए यानी इंसीनरेट किया जाए, तो इससे 3816 किलोग्राम कार्बनडाइऑक्साइड निकलेगी। हम सभी ये जानते हैं कि पेड़ कार्बनडाइऑक्साइड सोखते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि एक पीपीई किट को जलाने के बाद निकली कार्बनडाइऑक्साइड को सोखने में एक पेड़ को 182 दिन लगेंगे। इन दिनों भारत में रोजाना पांच लाख पीपीई किट बनाई जा रही है। ऐसे में इनको जलाने से निकली कार्बनडाइऑक्साइड को सोखने के लिए हमें 9 करोड़ पेड़ चाहिए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सैनिटाइजर कीट-पतंगों को भी मार देता है
  • हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, ताकि ये कोरोना वायरस से हमारी रक्षा कर सके। सैनिटाइजर में इथेलॉन के साथ बेंजालकोनियम क्लोराइड और ट्राइक्लोसन होते हैं और ये केमिकल वायरस के साथ-साथ मधुमक्खियों, तितलियों और कीट-पतंगों को भी मार देते हैं। यही नहीं, सैनिटाइजर में खूशबू आए, इसके लिए इसमें फैथलेट्स मिलाते हैं जो हमारे पेड़-पौधों के लिए खतरनाक माना जाता है।
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लगातार बढ़ रहा है बायो मेडिकल कचरा - फोटो : istock
लगातार बढ़ रहा है बायो मेडिकल कचरा
  • अगर आप बायो मेडिकल कचरे को लेकर उलझन में हैं, तो यहां आपको ये बता दें कि अस्पतालों और प्रयोगशाला से निकला हुआ कचरा (ग्लूकोज की बोतलों, इंजेक्शन, सिरिंज, दवाओं के डिब्बे, दस्ताने आदि) ही बायो मेडिकल कचरा होता है। वहीं, बात अगर इस कचरे की करें, तो कोरोना से होने वाला बायो मेडिकल कचरा लगातार बढ़ रहा है। पीसीबी के आंकड़ें बताते हैं कि जनवरी 2021 में 74 टन, फरवरी में 53 टन, मार्च में 75, अप्रैल में 139 टन और 10 मई 2021 में ये बढ़कर 203 टन पहुंच गया।

नोट: डॉ. राजन गांधी अत्याधिक योग्य और अनुभवी जनरल फिजिशियन हैं। इन्होंने कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से अपना एमबीबीएस पूरा किया है। इसके बाद इन्होंने सीएच में  डिप्लोमा पूरा किया। फिलहाल यह आईसीएचएच से वह उजाला सिग्नस कुलवंती अस्पताल में मेडिकल डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट फिजिशियन के तौर पर काम कर रहे हैं। यह आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के आजीवन सदस्य भी हैं। डॉ. राजन गांधी को इस क्षेत्र में 25 साल का अनुभव है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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