प्रतीकात्मक तस्वीर
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माना जाता है कि फॉल्स निगेटिव (जहां संक्रमित लोगों की पहचान नहीं हो पाती) की वजह से आरएटी टेस्ट 50 फीसदी नतीजे गलत दे देता है, हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये टेस्ट वायरस हॉटस्पॉट वाले इलाकों में उपयोगी हो सकते हैं। हरियाणा की अशोका यूनिवर्सिटी में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ, प्रोफेसर गौतम मेनन कहते हैं, 'मामले की पहचान करने की क्षमता कम संवेदनशील आरएटी टेस्ट और गोल्ड स्टैंडर्ड पीसीआर टेस्ट के सापेक्ष मिश्रण पर निर्भर करती है।' सिर्फ भारत ही इस टेस्ट का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, लगातार आ रही संक्रमण की लहरों से जूझ रहे कुछ यूरोपीय देश भी रैपिड टेस्टिंग करने लगे हैं।