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अलर्ट: वैक्सीन लगवाने के बाद भी बचकर रहें कोरोना के इस खतरनाक वैरिएंट से, जानें कैसे कर सकते हैं खुद की सुरक्षा

Sat, 10 Jul 2021 01:56 PM IST
प्रकाश चंद जोशी हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वैक्सीन - फोटो : पीटीआई
डॉ. परवेश मलिक 
फिजिशियन, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल
डिग्री- एम.बी.बी.एस, एमडी (जनरल मेडिसिन)

Medically Reviewed by Dr. Parvesh Malik

भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस समेत दुनिया के लगभग सभी देश कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। वहीं, भारत समेत कई अन्य देशों में अब भी कोरोना के कई केस सामने आ रहे हैं। यही नहीं, कोरोना से संक्रमित होने वाले लोग और इससे जान गवाने वाले लोगों के अलावा एक और चिंता सामने है, और वो है इस वायरस के बदलते रूप। कोरोना अब तक कई रूप बदल चुका है और इन दिनों इसका डेल्टा वैरिएंट हर किसी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। इन सबके बीच वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ये वैरिएंट एंटीबॉडीज को भी चकमा दे रहा है, जिसके कारण जो लोग कोरोना की वैक्सीन ले चुके हैं उनके लिए भी ये खतरनाक है। ऐसे में हर कोई इस वायरस के इस रूप से डरा हुआ है, तो चलिए जानते हैं इसके बारे में।
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डेल्टा वैरिएंट काफी खतरनाक - फोटो : pixabay
ऐसे लगाया पता
  • मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांस के वैज्ञानिकों का कहना है कि डेल्टा वैरिएंट एंटीबॉडीज को चमका दे रहा है। वहीं, उन्होंने इस बात का पता लगाया है कि प्राकृतिक संक्रमण और वैक्सीन से कैसे एंटीबॉडीज बनती हैं। ये एंटीबॉडीज अल्फा, बीटा और डेल्टा के साथ वायरस के सबसे पहले रूप से भी बचाने में कारगर है। वैक्सीन ले चुके लोगों के लिए ये खतरा हो सकता है। दरअसल, वैज्ञानिकों ने उन 103 लोगों की जांच की जो संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। इसमें उन्हें पता चला कि डेल्टा वैक्सीन वाले लोग जो अल्फा की चपेट में आए उनकी तुलना में कम संवदेनशील है।
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pfizer vaccine - फोटो : सोशल मीडिया
वैज्ञानिकों ने ऐसे 59 लोगों के सैंपल की भी जांच की, जिन्हें एस्ट्राजेनेका या फिर फाइजर टीके की एक या दो डोज दी जा चुकी थी। यहां उन्होंने पाया कि जहां एक डोज वाले केवल 10 फीसदी में इम्यूनिटी देखी गई जो डेल्टा वा बीटा वैरिएंट को न्यूट्रलाइज करने में सक्षम था, तो वहीं दूसरी तरफ वैक्सीन की दूसरी डोज 95 फीसदी तक असरदार दिखी। हालांकि, दोनों वैक्सीन लगने के बाद एंटीबॉडीज में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखा। इसलिए माना जा रहा है कि डेल्टा वैरिएंट वैक्सीन लगवा चुके लोगों के लिए भी खतरे की घंटी हो सकता है।

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corona patient - फोटो : istock
मृत्यु दर के कम करने में प्रभावी साबित हुई वैक्सीन
  • विशेषज्ञ, डॉक्टर्स, डबल्यूएचओ से लेकर सरकारें तक हर किसी को यह कह रही है कि अगर कोरोना वायरस से खुद को और अपने आसपास के लोगों को सुरक्षित रखना है, तो अपनी बारी आने पर हर किसी को कोरोना की वैक्सीन लेनी चाहिए। हालांकि, वैक्सीन लगवाना पूर्ण समाधान तो नहीं, लेकिन संक्रमण न फैल सके इसलिए ये बेहद जरूरी है। मौजूदा समय में जितनी भी वैक्सीन लोगों को लगाई जा रही हैं, वे जोखिम कारकों, गंभीरता, अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत और मृत्यु दर को कम करने में प्रभावी साबित हुई है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
वैक्सीन के बाद न डरें इन साइड इफेक्ट्स से
  • कोरोना वैक्सीन लेने के बाद कई लोगों में कुछ साइड इफेक्ट्स दिख सकते हैं, जिनमें सिर दर्द होना, कमजोरी आना, बदन दर्द होना, तेज बुखार आना, काफी नींद आना और इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द होना आदि शामिल हैं। लेकिन आपको इन दुष्प्रभावों से न तो डरना है और न ही इन्हें नजरअंदाज करना है। अमूमन जब भी वैक्सीन दी जाती है तो वो शरीर में अपना असर दिखाती है, जिसकी वजह से ये दुष्प्रभाव सामने आते हैं। अगर आपकी तकलीफ ज्यादा बढ़ती है, तो आपको वैक्सीन सेंटर पर तुरंत संपर्क करना चाहिए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
ऐसे करें खुद की सुरक्षा
  • हमें इस वायरस और इसके नए रूप से बचने के लिए मास्क पहनना चाहिए। खुद तो मास्क पहनना ही है, साथ ही अपने बच्चों और आसपास के लोगों को भी मास्क पहनने के लिए जागरूक करना है। सामाजिक दूरी बनाकर रखनी है। भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें, घर के बच्चों और बुजुर्गों को बाहर न जाने दें। वहीं, समय-समय पर साबुन या हैंड सैनिटाइजर की मदद से अपने हाथ साफ करते रहें, बाहर से लाए हुए सामान को सैनिटाइज करें आदि।

नोट: डॉ. परवेश मलिक एक फिजिशियन हैं और वर्तमान में पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में कार्यरत हैं। डॉ. मलिक ने हरियाणा के महर्षि मार्कंडेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च मुल्लाना, से अपना एबीबीएस पूरा किया है। इन्होंने जनरल मेडिसिन में एमडी भी किया। पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में काम करने से पहले डॉ. परवेश ने एम.एम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च महर्षि मार्कंडेश्वर यूनिवर्सिटी में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया है।  

अस्वीकरण: यह लेख मीडिया रिपोर्ट्स और डॉक्टर से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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