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Coronavirus: वायरस कैसे होता है म्यूटेट? जानिए इसके बारे में सबकुछ

Fri, 25 Dec 2020 09:06 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
कोरोना वायरस के दो नए वैरिएंट मिलने के बाद एक बार फिर दुनियाभर में चिंता है। वैज्ञानिक ये पता लगाने में जुटे हैं कि क्या ये वैरिएंट ज्यादा संक्रामक हैं और क्या कोविड वैक्सीन इन पर काम करेगी? सभी वायरस प्राकृतिक तौर पर म्यूटेट करते हैं यानी अपनी संरचना में बदलाव करते हैं। उसी तरह सार्स-कोव-2 भी करता है। अनुमानित तौर पर एक महीने में एक या दो बदलाव। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पैथोजन इवोल्यूशन की विशेषज्ञ डॉक्टर लूसी वैन डॉर्प कहती हैं, 'अक्सर म्यूटेशन की वजह से वायरस की प्रॉपर्टी पर कम असर पड़ता है। सार्स-कोव-2 के जीनोम में ज्यादातर म्यूटेशन यात्री की तरह हैं, यानी वे वायरस का व्यवहार नहीं बदलते, वे बस साथ चलते रहते हैं।' लेकिन कभी-कभी वायरस इस तरह म्यूटेट कर जाता है, जिससे उसके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को मदद मिलती है। अब ये जानने की कोशिश हो रही है कि क्या नए ब्रिटिश वैरिएंट में भी यही हुआ है जो तेजी से फैलता नजर आ रहा है। 



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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
म्यूटेशन की प्रक्रिया 

एक ऐसा ही लेकिन इससे नहीं जुड़ा एक वैरिएंट दक्षिण अफ्रीका में भी सामने आया है। चिंता की बात ये है कि दोनों ही म्यूटेशन स्पाइक प्रोटीन के जीन में हुए हैं। इसी स्पाइक प्रोटीन के जरिए वायरस मानव कोशिका से चिपक कर दाखिल होता है। ब्रिटेन वाले वैरिएंट में 14 म्यूटेशन हुए हैं, जिससे प्रोटीन बनाने वाले एमिनो एसिड में बदलाव आया और जेनेटिक कोड में कुछ हिस्से खत्म हो गए जिसे डिलीशन कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, इसमें से कुछ म्यूटेशन वायरस फैलने की गति को भी प्रभावित कर सकतेेे हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कई वैरिएंट में स्पाइक प्रोटीन एन-510वाई में म्यूटेशन पाया गया है, दक्षिण अफ्रीका वाले एक वैरिएंट में भी। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक, लैब प्रयोग ये सुझा रहे हैं कि शायद ये म्यूटेशन वायरस को मानव कोशिका से जुड़ने में मदद कर सकतेेे हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, एक और स्पाइक प्रोटीन पी-681एच में म्यूटेशन महत्वपूर्ण हो सकता है। इस प्रोटीन में 69-70 पोजीशन पर जो डिलीशन हुई, उसका संबंध कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों से भी जोड़ा गया जिनके अंदर कई महीनों तक वायरस रहता है। इस डिलीशन की वजह से हमें पता चल सकता है कि वैरिएंट कैसे बना। शायद उस मरीज में जिसका इम्यून सिस्टम कमजोर था, जो वायरस से नहीं लड़ पाया और इस वजह से कई महीनों तक वायरस उसके शरीर में रहा और साथ-साथ म्यूटेट करता रहा। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के प्रोफेसर डेविड रॉबर्टसन ब्रिटेन के उस ग्रुप का हिस्सा हैं, जिसने नए वैरिएंट का आकलन किया है। प्रोफेसर रॉबर्टसन बताते हैं, 'फिलहाल सोच ये है कि वायरस लंबे संक्रमण के दौरान कई म्यूटेशन से बना है।' हालांकि मिंक जानवर के साथ किसी तरह का संबंध नजर नहीं आ रहा। प्रोफ़ेसर रॉबर्टसन कहते हैं, 'अभी ऐसा कोई सबूत नहीं कि मिंक या कोई और जानवर का इससे संबंध है, लेकिन समझदारी इसी में है कि इसे पूरी तरह से खारिज ना किया जाए। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैज्ञानिक अब ब्रिटेन में मिले वैरिएंट के बारे में ज्यादा पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। ये वैरिएंट ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, इटली, आइसलैंड और नीदरलैंड्स में भी मिला है। दक्षिण अफ्रीका में मिला वैरिएंट भी चिंता का विषय है। इसमें भी वायरस के स्पाइक प्रोटीन एन-501वाई में म्यूटेशन हुआ है, लेकिन ये अलग से वायरस में निकल रहा है। दूसरेेे म्यूटेशन की भी जांच की जा रही है। ऐसी आशंका है कि दोनों वैरिएंट उम्मीद से ज्यादा तेजी से फैल रहे हैं, लेकिन अब भी ये साफतौर पर नहीं कहा जा सकता। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैक्सीन पर प्रभाव 

जनवरी में चीन के पहले जीनोम सीक्वेंस को जारी करने के बाद से ही सार्स-कोव-2 को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व वैज्ञानिक कोशिशें हो रही हैं। किसी भी जीव या वायरस के पूरे जीन सेट को जीनोम कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने अब तक सार्स-कोव-2 के 250,000 जीनोम क्रमित (सीक्वेंस) किए हैं और खुले तौर पर साझा किया है। संक्रमित मरीज के स्वैब यानी सैंपल से वायरस के जेनेटिक कोड को निकाला जा सकता है और रीड होने से पहले सीक्वेंसर की मदद से जेनेटिक कोड की संख्या बढ़ाई जा सकती है। 

किसी भी जीव के डीएनए या आरएनए की मोनोमर यूनिट को न्यूक्लियोटाइड कहते हैं। इन न्यूक्लियोटाइड्स की वजह से जीनोम और म्यूटेशन की तुलना की जा सकती है। डॉक्टर वैन डॉर्प कहती हैं, 'इन्हीं कोशिशों और ब्रिटेन की टेस्ट लैबों की वजह से बताया जा सका कि ब्रिटेन में आया वैरिएंट चिंताजनक हो सकता है।' वैज्ञानिक जानकारी अब बहुत तेजी से साझा की जा रही है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या म्यूटेशन की वजह से वैक्सीन प्रभावित होगी, हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा नहीं होगा। कम से कम दीर्घकाल में तो नहीं। डॉक्टर वैन डॉर्प कहती हैं, 'वैक्सीन भी अब आ गई हैं तो ये सवाल अब धीरे-धीरे और महत्वपूर्ण हो जाएगा ताकि किसी संभावित केस का जल्द पता लगा लिया जाए, उसको फॉलो किया जाए और ट्रैक किया जाए। हमें वैक्सीन की संरचना और इसकी डिलीवरी की स्ट्रैटेजी के आकलन के लिए थोड़ा ज्यादा वक्त चाहिए। इसलिए ये कोशिश जारी रहेगी। हालांकि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।'  
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