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म्यूकॉरमाइकोसिस: कोरोना के बीच भारत में अब ब्लैक फंगस संक्रमण का खतरा? ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान

Fri, 07 May 2021 12:46 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
Medically Reviewed by Dr. Parvesh Malik

डॉ. परवेश मलिक 
फिजिशियन, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल
डिग्री- एम.बी.बी.एस, एमडी (जनरल मेडिसिन)  


भारत में तेजी से बढ़ रहे कोरोना संक्रमण के बीच एक नई और दुर्लभ बीमारी ने भी दस्तक दे दी है, जिसे ब्लैक फंगस या म्यूकॉरमाइकोसिस बीमारी के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीजों में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछले साल भी ब्लैक फंगस संक्रमण के कई मामले सामने आए थे और इसके कारण कई लोगों ने अपनी जान भी गंवा दी थी। दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. मनीष मुंजाल ने बताया कि पिछले छह दिनों में अस्पताल में म्यूकॉरमाइकोसिस के छह मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा, 'हम कोविड-19 द्वारा ट्रिगर किए गए इस खतरनाक संक्रमण (ब्लैक फंगस) में फिर से वृद्धि देख रहे हैं।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल इस जानलेवा संक्रमण के कारण कई रोगियों की आंखों की रोशनी कम हो गई थी या चली गई थी और नाक और जबड़े की हड्डियों को नुकसान पहुंचा था। डॉक्टरों का कहना है कि यह संक्रमण आमतौर पर उन मरीजों में देखा जा रहा है जो रिकवरी स्टेज पर हैं, लेकिन उन्हें मधुमेह, किडनी, कैंसर या हार्ट फेल्योर जैसी बीमारियां हैं।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉक्टरों का कहना है कि कोविड-19 रोगियों के उपचार में स्टेरॉयड का उपयोग फंगल संक्रमण का एक कारण हो सकता है। पिछले साल भी डॉक्टरों का यही कहना था कि ज्यादा स्टेरॉयड लेने वाले मरीजों में भी ये बीमारी नजर आने लगी है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कितना खतरनाक है ब्लैक फंगस? 
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्लैक फंगस संक्रमण यानी म्यूकॉरमाइकोसिस बीमारी एक गंभीर बीमारी है, लेकिन यह कोई नई बीमारी नहीं है। इस बीमारी की वजह से नाक, कान और गले के अलावा शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचता है। यह बीमारी इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की वजह से होती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
शरीर में कैसे घुसता है ब्लैक फंगस?
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्लैक फंगस हवा में रहता है। यह आपकी नाक से होते हुए बलगम में मिलकर नाक की चमड़ी में घुस जाता है। इसके बाद म्यूकॉरमाइकोसिस बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और मस्तिष्क तक भी चली जाती है। इस बीमारी में मृत्यु दर 50 फसदी है।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
ब्लैक फंगस संक्रमण के लक्षण क्या हैं? 
  • नाक की अंदरुनी दीवारों पर सूखापन आना 
  • नाक के अंदर काली और भूरे रंग की पपड़ियां जमना 
  • नाक बंद होना शुरू हो जाना 
  • ऊपर वाले होठों और गालों का सुन्न होना शुरू हो जाना 
  • आंखों में सूजन आना 
  • आंखों का लाल होना 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
ब्लैक फंगस संक्रमण का इलाज क्या है? 
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि सबसे पहले तो ये सुनिश्चित करना होता है कि मरीज को ब्लैक फंगस संक्रमण ही है। उसके बाद उन्हें बहुत ही स्ट्रान्ग एंटी-फंगस दवाएं दी जाती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि दवाई से संक्रमण ठीक ही हो जाए। अगर दवाई से ठीक नहीं होता है तो शरीर के उस हिस्से को काटकर हटाना पड़ता है, जिसे फंगस संक्रमण के कारण नुकसान हुआ होता है। सबसे जरूरी बात कि इसके इलाज के लिए मरीजों को कई दिनों तक अस्पताल में ही रहना पड़ता है और इसका इलाज भी काफी महंगा होता है। 
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ब्लैक फंगस संक्रमण से बचाव के उपाय 
  • ब्लैक फंगस संक्रमण के लक्षण दिखने पर डॉक्टर की सलाह पर एंटीफंगल थेरेपी की शुरुआत जितनी जल्दी हो सके करनी चाहिए। लोगों को बहुत अधिक धूल के सीधे संपर्क से बचना चाहिए, जहां पर मिट्टी या काई है और आप वहां काम कर रहे हैं तो जूते, लंबी पैंट और दस्ताने पहनें। इसके अलावा त्वचा की चोटों को साबुन और पानी से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। 
नोट: डॉ. परवेश मलिक एक फिजिशियन हैं और वर्तमान में पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में कार्यरत हैं। डॉ. मलिक ने हरियाणा के महर्षि मार्कंडेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च मुल्लाना, से अपना एबीबीएस पूरा किया है। इन्होंने जनरल मेडिसिन में एमडी भी किया। पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में काम करने से पहले डॉ. परवेश ने एम.एम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च महर्षि मार्कंडेश्वर यूनिवर्सिटी में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
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