प्रतीकात्मक तस्वीर
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डॉ. रुपाली कहती हैं, 'कुछ मात्रा में स्ट्रेस अच्छा होता है। क्लिनिकल भाषा में इसे पॉजिटिव स्ट्रेस कहते हैं। ये आपको आगे बढ़ने में मदद करता है, लेकिन जब यही स्ट्रेस आपके सोचने की शक्ति कम कर देता है, आपको पैरालाइज कर देता है तो ये नकारात्मक स्ट्रेस हो जाता है। नकारात्मक स्ट्रेस की प्रतिक्रिया हमारे दिमाग से आती है। हमारे दिमाग में एक सेंटर होता है हाइपोथेलमस, जो कई शारीरिक गतिविधियों और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ये हमारे ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम का भी सेंटर होता है। ऐसे में स्ट्रेस जब भी आता है तो तीन तरह से नजर आता है। इनमें एंग्जाइटी लक्षण, शारीरिक लक्षण, और भावनात्मक लक्षण शामिल होते हैं। एंग्जाइटी लक्षण में व्यक्ति बैचेन रहता है, अपना ध्यान एक जगह नहीं लगा पाता है, कई बार ऐसा लगता है कि जैसे व्यक्ति का दिमाग सुन्न हो गया हो, वो कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा हो।'
डॉक्टर रुपाली के अनुसार शारीरिक लक्षण में ये आपके शरीर पर असर करता है जैसे आपके दिल की धड़कने तेज हो जाती हैं, आपको लगता है कि टॉयलेट बार-बार जाना है, गला सूखने लगता है, जी मिचलाने लगता है या ऐसा लगता है जैसे पेट खराब हो गया हो।