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जानिए किन कारणों से हो सकता है जेस्टेशनल डायबिटीज और इस पर नियंत्रण पाने के उपाय

Sun, 25 Apr 2021 02:30 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है - फोटो : social media

Medically Reviewed by Dr.Saket Kant

डॉ साकेत कांत, सीनियर कंसल्टेंट, डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी 

डिग्री- एम.बी.बी.एस, एमडी, डीएम

अनुभव- 14 वर्ष

जेस्टेशनल डायबिटीज का निदान गर्भावस्था के दौरान ही किया जाता है।अन्य प्रकार के मधुमेह की तरह, जेस्टेशनल डायबिटीज भी आपकी कोशिकाओं द्वारा हो रहे ग्लूकोज के उपयोग को प्रभावित करता है। यह गर्भावस्था के साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। गर्भावस्था के दौरान इस तरह की जटिलता चिंताजनक है, लेकिन अच्छी खबर यह है कि डॉक्टर द्वारा बताए अनुसार दवा लेने पर, स्वस्थ भोजन खाने पर, नियमित रूप से व्यायाम करके आवश्यकता पड़ने पर इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। स्वस्थ आहार और व्यायाम का पालन करने के बावजूद ग्लूकोज का स्तर अधिक होने पर इंसुलिन थेरेपी की आमतौर पर आवश्यकता होती है। अगली स्लाइड्स से जानिए किन कारणों से यह हो सकता है। 

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टाइप 2 डायबिटीज होने की संभावना अधिक होती है - फोटो : Pixabay

हो सकता है टाइप-2 डायबिटीज
गर्भकालीन मधुमेह वाली महिलाओं में, रक्त शर्करा का स्तर आमतौर पर प्रसव के बाद वापस सामान्य हो जाता है। लेकिन अगर आपको जेस्टेशनल डायबिटीज है, तो टाइप 2 डायबिटीज होने की संभावना अधिक होती है। चिकित्सकिय सलाह पर आप अपने ब्लड शुगर स्तर को बार- बार जांच लें। रक्त शर्करा के स्तर को बनाए रखने से माँ और उसके बच्चे को स्वस्थ रखा जा सकता है और प्रसव के दौरान किसी भी जटिलता को रोका जा सकता है।ॉ

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रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि हो सकती है - फोटो : social media

विभिन्न कारक जो गर्भकालीन मधुमेह को जन्म दे सकते हैं- 

हार्मोनल परिवर्तन 
गर्भावस्था के दौरान, हार्मोन का स्तर बदल जाता है, जिससे शरीर के लिए रक्त शर्करा को कुशलता से संसाधित करना कठिन हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि हो सकती है इसलिए बहुत जरूरी है कि आपके हार्मोन संतुलित हो। 

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स्वास्थ्य स्थिति जो इंसुलिन में उतार-चढ़ाव का कारण बन सकती है - फोटो : सोशल मीडिया

इंसुलिन में उतार-चढ़ाव
पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम (पीसीओएस) या कोई अन्य स्वास्थ्य स्थिति जो इंसुलिन में उतार-चढ़ाव का कारण बन सकती है। उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग, या अन्य कोई समस्या का होना। 

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शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं होना - फोटो : social media

-अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त होना

- पहले से परिवार के किसी सदस्य का मधुमेह से ग्रसित होना

-जेस्टेशनल डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का इतिहास होना

-शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं होना

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फल, सब्जियों और साबुत अनाज का सेवन करें - फोटो : social media

जेस्टेशनल डायबिटीज को रोकने के लिए उपाय-
कुछ सरल कदम उठाकर गर्भावस्था से पहले और दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज और टाइप 2 मधुमेह के विकास के जोखिम को कम किया जा सकता है। 

स्वस्थ खाने पर ध्यान दें
आहार में अधिक से अधिक फल, सब्जियों और साबुत अनाज का सेवन करें। ऐसे खाद्य पदार्थ खाएं जो फाइबर में उच्च और वसा और कैलोरी में कम हों। तला-गला खाना और बाहर की चीजों के सेवन से परहेज करें। चाय-कॉफी का सेवन भी न करें। 

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व्यायाम के अलावा सप्ताह में लगातार 2 दिन मध्यम चाल चलें - फोटो : सोशल मीडिया

शारीरिक रूप से सक्रिय रहें
गर्भावस्था के पहले और दौरान नियमित व्यायाम गर्भकालीन मधुमेह के विकास के जोखिम को रोक सकता है। व्यायाम के अलावा सप्ताह में लगातार 2 दिन मध्यम चाल चलें। ऐसा हर सप्ताह करें। इसके लिए कोई दो दिन पहले से तय करके रख लें। 

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अतिरिक्त वजन को कम करें - फोटो : social media

गर्भावस्था से पहले संतुलित वजन बनाए रखें
यदि आप गर्भवती होने की योजना बना रही हैं, तो सबसे जरूरी है कि कसरत, योग और अपने खानपान में परिवर्तन लाकर अतिरिक्त वजन को कम करें। वजन संतुलित रहेगा तो जेस्टेशनल डायबिटिज होने की संभावना भी कम रहेगी। 

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बहुत अधिक वजन बढ़ना जेस्टेशनल डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है - फोटो : Pixabay

गर्भावस्था के दौरान वजन
गर्भावस्था के दौरान कुछ वजन प्राप्त करना सामान्य और स्वस्थ है। लेकिन बहुत अधिक वजन बढ़ना जेस्टेशनल डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है। स्वस्थ गर्भावस्था में आपका कितना वजन बढ़ना ठीक है, यह जानने के लिए अपने डॉक्टर से बात करें।

नोट- यह लेख आनंद मेडीकेयर,रोहिणी के डॉ साकेत कांत से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉक्टर साकेत कांत पिछले 14 सालों से प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्होंने अपनी डिग्रियां यूसीएमएस दिल्ली विश्वविद्यालय और आईएमएस बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ली है।

अस्वीकरण- अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

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