डॉ. शैलेंद्र मिश्रा
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इसके बाद डॉ. शैलेंद्र मिश्रा ने खुद कमान संभाली। आक्रोशित भीड़ को कैसे काबू करना है, उनकी बात कैसी सुननी है और उनको कैसे समझाना है, इसकी बेहतरीन मिसाल शैलेंद्र मिश्रा ने पेश करते हुए मजदूरों से उनकी ही भाषा में बात करनी शुरू की। लाउडस्पीकर से निकले भोजपुरी के शब्द जैसे ही मजदूरों के कानों तक पहुंचे वह एकदम शांत से हो गए।