फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पितृ पक्ष की पौराणिक कथाः क्या सुना है आपने जोगे और भोगे का किस्सा, कुछ ऐसी है पूरी कहानी

Wed, 11 Sep 2019 04:01 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
विज्ञापन
1 of 6
श्राद्ध-तर्पण
पितृ पक्ष की पौराणिक कथा के अनुसार जोगे और भोगे दो भाई थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। जोगे धनी था और भोगे निर्धन। दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था। जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, किंतु भोगे की पत्नी बड़ी सरल हृदय थी। पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितृों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की चेष्टा करने लगा, किंतु उसकी पत्नी समझती थी कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग बातें बनाएंगे।
विज्ञापन

2 of 6
श्राद्ध-तर्पण - फोटो : अमर उजाला
फिर उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी शान दिखाने का यह उचित अवसर लगा। इसलिए वो बोली आप शायद मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, किंतु इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी। दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी। फिर उसने जोगे को अपने पीहर न्यौता देने के लिए भेज दिया।

 
विज्ञापन

3 of 6
श्राद्ध-तर्पण - फोटो : अमर उजाला
दूसरे दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आकर काम में जुट गई, उसने रसोई तैयार की। अनेक पकवान बनाए फिर सभी काम निपटाकर अपने घर आ गई। आखिर उसे भी तो पितृों का श्राद्ध-तर्पण करना था। इस अवसर पर न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी। शीघ्र ही दोपहर हो गई। पितृ भूमि पर उतरे। जोगे-भोगे के पितृ पहले जोगे के यहां गए तो देखा कि उसके ससुराल वाले वहां भोजन पर जुटे हुए हैं। निराश होकर वे भोगे के यहां गए। वहां क्या था? मात्र पितृों के नाम पर अगियारी दे दी गई थी। पितृों ने उसकी राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुंचे।

4 of 6
श्राद्ध-तर्पण
थोड़ी देर में सारे पितृ इकट्ठे हो गए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की बढ़ाई करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी आपबीती सुनाई। फिर वे सोचने लगे कि अगर भोगे समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा न रहना पड़ता, लेकिन भोगे के घर में तो दो जून की रोटी भी खाने को नहीं थी। यही सब सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई। अचानक वे नाच-नाचकर गाने लगे। भोगे के घर धन हो जाए। भोगे के घर धन हो जाए। सांझ होने को हुई। भोगे के बच्चों को कुछ भी खाने को नहीं मिला था।
विज्ञापन

5 of 6
श्राद्ध-तर्पण
उन्होंने मां से कहा- भूख लगी है। तब उन्हें टालने की गरज से भोगे की पत्नी ने कहा- जाओ आंगन में हौदी(टंकीनुमा बर्तन) औंधी रखी है, उसे जाकर खोल लो और जो कुछ मिले, बांटकर खा लेना। बच्चे वहां पहुंचे, तो पाते हैं कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है। वे दौड़े-दौड़े मां के पास पहुंचे और उसे सारी बातें बताईं। आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखा तो वह भी हैरान रह गई।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
श्राद्ध-तर्पण - फोटो : अमर उजाला
इस प्रकार भोगे भी धनी हो गया, लेकिन धन पाकर वह घमंडी नहीं हुआ। दूसरे साल का पितृ पक्ष आया। श्राद्ध के दिन भोगे की स्त्री ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाए। ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया। भोजन कराया, दक्षिणा दी। जेठ-जेठानी को सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया। इससे पितृ बड़े प्रसन्न तथा तृप्त हुए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें