दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि सियाचिन में भारतीय सेना की करीब 150 फौजी पोस्ट हैं, जिनमें करीब 10 हजार फौजी तैनात रहते हैं।
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PIC: जाने किन हालातों में सियाचिन में अपना फर्ज निभाते हैं भारतीय सैनिक
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यहां सैनिकों की तैनाती पर रोजाना 4 से 8 करोड़ रुपये खर्च होता है।
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PIC: जाने किन हालातों में सियाचिन में अपना फर्ज निभाते हैं भारतीय सैनिक
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सैनिकों को सियाचिन भेजने से पहले कश्मीर के खिल्लनमर्ग के गुज्जर हट में बने हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल में ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद सैनिकों को सियाचिन ग्लेशियर से पहले बने बेस कैंप के सियाचिन बैटल स्कूल तक ले जाया जाता है। यहां उन्हें पांच हफ्ते की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।
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समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 5,753 मीटर होने के चलते यहां का तापमान माइनस 60 से 70 डिग्री तक पहुंच जाता है। आज (05 फरवरी) को यहां का तापमान न्यूनतम माइनस 22 और अधिकतम माइनस 24 है।
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जब मैदानी इलाकों में भीषण गर्मी होती है, उस वक्त सियाचिन का पारा शून्य से नीचे जाना और बर्फबारी होना आम बात है।
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सियाचिन में पारा इतना कम होता है कि बंदूक का ट्रिगर अगर नंगी उंगली से छू ले तो उंगली उसी पर चिपक सकती है और सुन्न पड़ सकती है।
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सियाचिन में सैनिकों को तीन महीने की तैनाती के दौरान नहाने को नहीं मिलता और न ही वे दाढ़ी बना पाते हैं।
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मुश्किल ट्रेनिंग और जज्बे के बावजूद सैनिकों को हाइपोक्सिया, हाई एल्टीट्यूड एडीमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं, जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है, शरीर के अंग सुन्न हो जाते हैं।
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सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सियाचिन में 1984 से 2012 तक 846 सैनिकों की मौत हो चुकी है। यहां दुश्मन की गोली से ज्यादा बेरहम मौसम की वजह से मौत होती है।
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इतनी ऊंचाई पर हालात इस कदर खराब होते हैं कि सेना के हेलिकॉप्टर नीचे नहीं उतर सकते, बल्कि राशन और दूसरे तरह की सप्लाई को आसमान से ही नीचे गिरा दिया जाता है।