सभी श्रमिक एक दूसरे के रिश्तेदार हैं और जम्मू आने के बाद पलोड़ा में रह रहे थे। मंगल ने कहा कि जो पैसा वे अपने साथ लाए थे वह खत्म हो चुका है। किसी की तरफ से कोई सहायता प्रदान नहीं की जा रही है। अब काम भी नहीं है, तो पैसे कमाने की आस भी खत्म हो चुकी है।
किसी ने बताया था कि अगर लखनपुर तक पहुंच जाएं तो वहां से घर जाने का साधन मिल सकता है, इसीलिए रात को पैदल ही लखनपुर जाने की कोशिश कर रहे हैं। श्रमिकों का कहना है कि सरकार ट्रेन तो चला रही है, लेकिन इसका किराया इतना ज्यादा है कि वे टिकट खरीदने में असमर्थ हैं। उनके पास खाने-पीने के लिए भी कुछ नहीं है। उन्हें नहीं पता कि आगे क्या होगा, वे अपने घर पहुंच भी पाएंगे या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि कोशिश जारी रखेंगे। मंगल ने कहा ‘मजदूर हैं साहब, हमारे नसीब में धक्के खाना ही लिखा है।’