मानसून सीजन में औसत से कम बारिश ने बासमती की पैदावार पर संकट खड़ा कर दिया है। बासमती बेल्ट कहे जाने वाले जम्मू, सांबा और कठुआ जिले के मैदानी इलाकों में मौसम की मार पड़ी है। इस क्षेत्र में 800 एमएम की बारिश की जरूरत होती है। लेकिन इस बार 600 एमएम बारिश ही रिकॉर्ड हुई है। इससे बासमती की पैदावार पर 20 से 25 फीसदी तक का असर पड़ सकता है। अक्तूबर माह में दो बार बारिश होने पर भी सिंचाई की जरूरत पूरी नहीं हो पाई है।
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सबसे ज्यादा सूखा जम्मू, कठुआ और सांबा जिला में रहा है। सिंचाई की व्यवस्था होने के बावजूद बारिश के पानी की जरूरत बनी रहती है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे 50 से अधिक गांवों में बीजाई का काम भी नहीं हो पाया। जिन जगहों में ट्यूबवेल या सिंचाई की अन्य सुविधाएं हैं, वहां भी फसल के लिए पानी पूरा नहीं हो पाया है। अगस्त माह में भी स्कॉस्ट की टीमें अलग-अलग जिलों का दौरा कर चुकी है।
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अक्तूबर माह के अंतिम सप्ताह में फसल की कटाई का काम शुरू हो जाता है। नवंबर माह से गेहूं की बीजाई शुरू होती है। अब फसल पकने में कम समय बचा है। आने वाले समय में चार से पांच बारिश समय पर हो जाती हैं तो कुछ हद तक नुकसान कम हो सकता है। शेरे कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (स्कॉस्ट) जम्मू के रिसर्च निदेशक जेपी शर्मा के अनुसार धान की फसल की अच्छी पैदावार के लिए बारिश की जरूरत है।
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अभी तक उम्मीद से कम बारिश हुई है। 800 एमएम बारिश अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है। 200 एमएम तक की कमी दर्ज की गई, जिसका असर फसलों की पैदावार पर पड़ेगा।
मैदानों में कम, पहाड़ों पर ज्यादा बारिश
जम्मू संभाग के मैदानी जिलों में जहां कम बारिश हुई है, वहीं पर्वतीय इलाकों में बारिश का पैमाना अच्छा रहा है। हालांकि पर्वतीय इलाकों में धान की फसल बड़े पैमाने पर नहीं होती। लेकिन जहां भी धान लगाया जाता है, अच्छी बारिश से फसल की पैदावार भी अच्छी रहने के आसार हैं।