चिशोती में खोजीदस्ते मुस्तैद हैं। जेसीबी की मदद से एनडीआरएफ उन जगहों पर शवों की तलाश में लगी है, जहां बादल फटने के बाद भारी भरकम पत्थर और मलबा खिसक कर नीचे आ गया है। यह ऑपरेशन अधिकारियों की निगरानी में चल रहा है। यहां का आंखों देखा हाल बता रहे राकेश शर्मा...
किश्तवाड़ के चिशोती में बादल फटने की घटना को सोमवार को पांच दिन हो गए। मलबे में सांसों की तलाश जारी है। आपदा में अपनों को खोने वालों की आंखें नम हैं और मन हताश है लेकिन उम्मीद बाकी है। चिशोती में करीब एक दर्जन जेसीबी और भारी मशीनों की मदद से मलबे को हटाने का काम चल रहा है। हादसे की घड़ी हमेशा के लिए लोगों के जेहन में बस गई है। हर किसी के पास 14 अगस्त को दोपहर करीब 12 बजे हुए हादसे की एक कहानी है। चिशोती लोगों की जिंदगी की परीक्षा का सबसे बड़ा मैदान बना हुआ है। यहां का आंखों देखा हाल बता रहे राकेश शर्मा...
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : PTI
सुबह 9:30 बजे
चिशोती में खोजीदस्ते मुस्तैद हैं। जेसीबी की मदद से एनडीआरएफ उन जगहों पर शवों की तलाश में लगी है, जहां बादल फटने के बाद भारी भरकम पत्थर और मलबा खिसक कर नीचे आ गया है। यह ऑपरेशन अधिकारियों की निगरानी में चल रहा है और आगामी 48 घंटे तक बरकरार रखा जाएगा।
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : PTI
मलबे में दबे या बहाव में बह चुके लोगों के जिंदा होने की उम्मीद खत्म होती जा रही है। दिन चढ़ने के साथ गांव के लोग भी घरों से निकल कर घटना स्थल पर पहुंच गए हैं। जहां पर दर्जनों दुकानें लगी थीं और अब सिर्फ मलबा नजर आ रहा है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन की तरफ से पहुंच रहे लोग उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएंगे।
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : PTI
हादसे के दौरान माता मचैल के रास्ते में बना पुल बह गया है और अब दूसरी तरफ के इलाके को जोड़ने के लिए सेना ने अस्थायी पुल का निर्माण कर दिया है। इस पुल की मदद से इलाके के दूसरे तरफ के लोग रास्ता पार कर पा रहे हैं। हादसे के बाद जो मोटरसाइकिल या सामान दूसरी तरफ फंस गया था, उसे भी निकालने में मदद मिल गई है।
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : PTI
सुबह 11.00 बजे
भाजपा विधायक और नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा भी चिशोती में डेरा डाले हैं। उन्होंने कहा कि जब तक घर नहीं बन जाएंगे चिशोती नहीं छोडूंगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविंद्र रैना ने हादसे में हुए नुकसान पर केंद्र सरकार से मदद का आश्वासन यहां लोगों को दिया है। उपायुक्त किश्तवाड़ समेत अन्य अधिकारियों ने भी हालात का जायजा लिया। चिशोती में इस हादसे ने जानी नुकसान के साथ ही जमीन, फसल और कारोबार को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। लोग दोबारा पटरी पर लौटना चाह रहे हैं। बर्बाद हो चुके घरों को साफ करते लोग चाहते हैं कि उन्हें दूसरी जगह बसाया जाए।
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : PTI
साथ ही लोग रोजगार और जमीन भी मांग रहे हैं। बहरहाल, जो इस हादसे में जिंदा बच निकले हैं उन्हें जिंदगी गुजारने की चिंता होने लगी है। मौसम यहां लगातार करवट बदल रहा है और अपने ही गांव में उनका कोई घर नहीं है।
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Kishtwar Cloudburst
- फोटो : अमर उजाला
हादसे की पांच कहानियां सैलाब देख गडरिये ने किया था फोन
अगर समय पर फोन उठा लिया होता तो चिशोती हादसे में जानमाल का नुकसान कम हो सकता था। लेकिन फोन की घंटी बजती रही और जिसे फोन किया जा रहा था वो सोता रहा। दरअसल, हादसे के समय एक गडरिया पहाड़ पर बकरियों के साथ मौजूद था। जैसे ही हादसा हुआ उसने चिशोती में अपने एक परिचित को फोन मिलाना शुरू कर दिया। वह लगातार फोन करता रहा, लेकिन सामने वाले ने उसे नहीं उठाया। जिस जगह बादल फटा वहां से सैलाब को चिशोती पहुंचने में पांच से सात मिनट का समय लग गया था। संदेश समय पर पहुंच जाता तो इस हादसे की त्रासदी कम हो सकती थी।
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सामान समेटते ग्रामीण
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
नूडल बनाती रही महिला, बह गई दुकान
माता मचैल मंदिर मार्ग पर एक नेपाली महिला की दुकान है। महिला हादसे के समय नूडल बना रही थीं और दुकान में बहुत से लोग मौजूद थे। जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। दुकान के ठीक ऊपर मकान मालिक का घर है। मकान मालिक ने सैलाब देखने के बाद महिला को जानकारी दी। महिला और दुकान में बैठे लोग जैसे ही बाहर निकले पूरी दुकान मलबे में बदल गई। इस हादसे में दुकान के साथ मकान की सीढ़ियां भी बह गईं और मकान मालिक ऊपर की मंजिल में फंस गए। हालांकि उफान थमने के बाद उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
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किश्तवाड़ आपदा
- फोटो : अमर उजाला
आज ही डलना था पुल पर लेंटर
मचैल माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क का निर्माण किया जा रहा है। चिशोती में इस सड़क के लिए एक पुल तैयार किया गया था। इस पुल के दोनों ओर पिलर डाल दिए गए थे। पुल को ऊपर से पिलर के साथ जोड़ा गया था। इस पुल पर 18 अगस्त को लेंटर डाला जाना था। चौदह अगस्त को आई आपदा में पुल बह गया। अब इस पुल के अवशेष भी बाकी नहीं बचे हैं। यहां दोबारा पुल बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। यहां सेना ने एक अस्थायी पुलिया का निर्माण किया है और अब लोग यहीं से आ-जा पा रहे हैं।
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किश्तवाड़ आपदा
- फोटो : अमर उजाला
मेहनत पर फिरा कीचड़
नलदेई के पास भी हादसे की कहानी है। उनके अनुसार, साल में स्थानीय लोगों के पास कमाने का यही एक समय होता है। करीब दो महीने यात्रा चलती है और इस दौरान कारोबार हो जाता है। इसके अलावा गांव के ज्यादातर लोग मेहनत मजदूरी ही करते हैं। मेले के लिए लोगों ने ऋण लेकर दुकानें सजाई थीं और सामान बेच रहे थे। हादसे वाले दिन भारी सैलाब आने से सभी दुकानें बह गईं। किसी को भी सामान उठाने का मौका नहीं मिला। कुछ कारोबारियों ने भाग कर अपनी जान तो बचा ली, लेकिन जमा पूंजी नहीं बचा पाए।
ढाबे पर आ गया सैलाब
चौदह अगस्त की दोपहर को जिस समय हादसा हुआ विमला अपने ढाबे पर थीं। ढाबा मेला मैदान के बिल्कुल सामने है। विमला के अनुसार उस समय लोगों की काफी भीड़ उनकी दुकान पर थी। लोग दोपहर का खाना खा रहे थे। उनके ढाबे के बाहर मेले का बाजार सजा था और बिल्कुल ऊपर लंगर भवन में लोग भोजन कर रहे थे। अचानक से उनकी आंखों के सामने सैलाब बढ़ता हुआ मेला मैदान की तरफ आ गया। वे पत्थर और गाद को देख पा रही थीं। इसके बाद ढाबे में भगदड़ मच गई। उनकी जान तो किसी तरह बच गई।