नब्बे के दशक की बर्बरता हो या 2 जून 2021 को हुई राकेश पंडिता की हत्या, सभी घटनाएं बार-बार एक ही सवाल करती हैं...आखिर हमारा कसूर क्या था? आखिर किस जुर्म की सजा मिली। यही बर्बरता और दर्द राकेश पंडिता के परिवार को कचोट रहा है। पंडिता की हत्या ने नब्बे और नादिमर्ग के पुराने घावों को फिर कुरेद दिया है। मृतक के परिजनों का बुरा हाल है। रोते-बिलखते लोग एक ही सवाल कर रहे हैं कि आखिर आतंकियों ने राकेश पंडिता को क्यों मारा, उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा था।
पंडितों पर बर्बरता की शुरुआत 90 के दशक में हुई। 14 सितंबर, 1989 को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य और जाने-माने वकील, कश्मीरी पंडित, तिलक लाल तप्लू की हत्या जेकेएलएफ ने कर दी। इसके बाद जस्टिस नील कांत गंजू को गोली मार दी गयी। इसी तरह सभी मुख्य कश्मीरी नेताओं को एक-एक कर मौत के घाट उतार दिया गया। एक कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के एक अस्पताल में तैनात थी, सामूहिक बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी गई।
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