कारगिल में ऊंचाई पर बैठे दुश्मन तक पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन भारतीय सेना ने एक खास 'ट्रिक' अपनाकर इसे मुमकिन बनाया और दुश्मन का खात्मा करके ही सांस ली।
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कारगिल युद्ध
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
ये ट्रिक कुछ और नहीं, बल्कि एक खास ट्रेनिंग थी, साइलेंट मूवमेंट। परमवीर चक्र विजेता सूबेदार संजय कुमार ने बताया कि मुश्किल हालात से निपटने के लिए भारतीय सेना ने युद्ध में एक खास रणनीति ‘साइलेंट मूवमेंट’ का इस्तेमाल किया। जवानों व अफसरों को युद्धक्षेत्र में जाने से पहले बाकायदा साइंलेंट ड्रिल भी करवाई गई थी।
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पहाड़ों पर दुश्मन की ओर बढ़ते हुए इस ‘साइलेंट मूवमेंट’ में जवानों व अफसरों को गोली लगने के बाद घायलावस्था में कराहने तक की इजाजत नहीं थी। आंखों की भाषा को समझकर आगे बढ़ते हुए दुश्मन के बंकरों को ढूंढ कर उन पर हमला बोलना था ताकि दुश्मन को संभलने और फायरिंग करने का मौका ही न मिले। भारतीय सेना की ये रणनीति कई मोर्चों पर कारगर साबित हुई।
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दरअसल, दुश्मन एलओसी की ऊंची पहाड़ियों पर भारतीय जमीन पर कब्जा करके बैठा था और नीचे भारतीय फौज को दुश्मन को खत्म करके जमीन वापस लेने का टास्क दिया गया था। कई सैन्य प्लाटूनों को एलओसी के विभिन्न मोर्चों पर पाकिस्तानी फौज से लोहा लेना था। मुश्किल यह थी कि ऊपर बैठा दुश्मन नीचे भारतीय फौज की मूवमेंट देख पा रहा था।
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भारतीय जवानों और अफसरों को ऊपर चोटियों पर छिपे न तो पाकिस्तानी दिख रहे थे और न ही उनके बंकर। इसके लिए ही यह साइलेंट रणनीति अपनाई गई और ऊपर-नीचे की मुश्किल स्थिति को भेद कर दुश्मन का खात्मा किया गया। ऐसे में एलओसी की दुर्गम परिस्थितियों में लड़ा गया 1999 का कारगिल युद्ध दो देशों के बीच एक दुर्लभ सशस्त्र लड़ाई थी।
परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार के अनुसार युद्ध में कई मौकों पर ऐसी परिस्थितियां भी बन गई कि इन शूरवीरों को दुश्मन के एकदम आमने-सामने होकर युद्ध करना पड़ा। उन्होंने बताया जवान व अफसर एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहते थे, जिससे जोश, जुनून और जज्बा बरकरार रहता था।