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बाय-बाय 2018: साल भर निवेश को तरसता रहा जम्मू-कश्मीर, डाबर समेत अन्य कंपनियों ने खींचे हाथ

Thu, 27 Dec 2018 10:25 AM IST
Pranjal Dixit न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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investment
जम्मू-कश्मीर रियासत के लिए 2018 मिला-जुला साल रहा। अलबत्ता, खुशी इसके हिस्से कम आई। प्रदेश साल भर निवेश को तरसता रहा। यहां तक कि जिन बड़ी कंपनियों ने यहां निवेश की इच्छा जताई थी, वह भी बाद में हाथ खींच गई। डाबर समेत कई बड़ी कंपनियां इसमें शामिल रहीं। कहने को पहली ट्रेड एंड एक्सपोर्ट पालिसी भी इस साल घोषित हुई, लेकिन उसकेकिसी भी बिंदु पर आगे ठोस कदम नहीं उठा। उद्यमी नए निवेशकों को खींचने के लिए वित्तीय इन्सेंटिव की मांग ही करते रहे। आगे स्लाइड्स में जाने कुछ यूं रहा उद्योग, व्यापार के लिए यह साल...

 
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income tax
पैकेज के रूप में थोड़ी खुशी, समस्याएं बड़ी
खुशी बस स्पेशल पैकेज के एक्सटेंशन और नार्थ ईस्ट स्टेट की तर्ज पर डीआईपीपी के स्पेशल पैकेज के रूप में मिली, लेकिन उनकी तमाम मुश्किलों का हल नहीं निकल सका। सीजीएसटी रिफंड का लाभ सभी यूनिटों को मिलने पर कोई बात नहीं हुई, न ही आयकर छूट पर इसमें कोई प्रावधान किया गया।

 
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Skill Development
स्थानीय रोजगार के अनुपात में ढील नहीं
जम्मू-कश्मीर में लगने वाली औद्योगिक इकाईयों के लिए 90 फीसदी रोजगार स्थानीय युवाओं को दिया जाना जरूरी किया गया है। उद्यमी इसमें ढील की मांग कर रहे थे। स्किल्ड मैन पावर के अभाव की बात कहते हुए वह इसे 60:40 किए जाने की मांग कर रहे थे। इसके पीछे आधार वह हिमाचल की नीति को बता रहे थे, जिसमें यह अनुपात 70:30 रखा गया है। लेकिन इस मसले पर कुछ नहीं हुआ।

 

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toll tax
पूरे साल चली टोल टैक्स पर सियासत
व्यापारियों के लिहाज से सबसे बड़ा मुद्दा  टोल टैक्स था। वह इसे हटाए जाने की मांग कर रहे थे, लेकिन इस पर कोई फैसला नहीं हो सका। सरकार का रवैया टोल टैक्स को लेकर ढुलमुल रहा। व्यापारियों का आरोप था कि सरकार कश्मीर केंद्रित है, केवल वहीं की चुनिंदा इंडस्ट्री को इसका लाभ है, इसलिए इसे नहीं हटाया जा रहा। उधर, सरकार राजस्व का बड़ा जरिया बताते हुए टोल टैक्स पर कोई भी कदम उठाने से बचती रही।

 
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e-commerce
ई-कामर्स कारोबार पर नीति नहीं
ई-कामर्स कारोबार को बढ़ावे से स्थानीय कारोबार पर पड़ रहे असर को देखते हुए व्यापारी इसे कारोबार को लेकर एक रेगुलेटरी बनाए जाने की मांग कर रहे थे। उन्होंने कई दफा स्थानीय माल आदि के बाहर प्रदर्शन भी किया। अधिकारियों से कई बार मिले। प्री-बजट मीटिंग में भी उन्होंने रेगुलेटरी नीति का मसला रखा था, लेकिन बजट घोषणा में भी उनके हाथ कुछ नहीं आया।
 
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