रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर मां राज्ञा माता (क्षीर भवानी या राग्याना देवी) ने रावण को दर्शन दिए। जिसके बाद रावण ने उनकी स्थापना श्रीलंका की कुलदेवी के रूप में की। (सभी फोटो- सोशल मीडिया)
लंका से कश्मीर कैसे पहुंची रावण की कुलदेवी
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लेकिन कुछ समय बाद रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी उससे रूष्ठ हो गईं और श्रीलंका से जाने की इच्छा व्यक्त की।
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मान्यता है कि जब राम ने रावण का वध कर दिया तो राम ने हनुमान को यह काम दिया कि वह देवी के लिए उनका पसंदीदा स्थान चुनें और उनकी स्थापना करें। इस पर देवी ने कश्मीर के तुलमुल को चुना।
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माना जाता है कि वनवास के दौरान राम राग्याना माता की आराधना करते थे तो मां राज्ञा माता को रागिनी कुंड में स्थिपित किया गया।
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मान्यता है कि क्षीर भवानी माता किसी भी अनहोनी का संकेत पहले ही दे देती हैं और उनके कुंड यानि चश्मे के पानी का रंग बदल जाता है। इतना ही नहीं क्षीर भवानी के रंग परिवर्तन का जिक्र आइने अकबरी में भी है।
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प्राचीन समय में एक कश्मीरी पुरोहित को माता ने सपने में बताया कि इस मंदिर का नाम खीर भवानी रखें। हर साल पूजा से पहले मंदिर के कुंड में दूध और खीर डालते हैं। इस खीर से चश्मे का पानी रंग बदलता है।
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खीर का मतलब दूध और भवानी का मतलब भविष्यवाणी है। यही कारण है कि झरने की मंदिर में बहुत महत्ता है। इस विचार से यहां के मुसलमान और पंडित दोनों सहमत हैं।
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यहां के मुस्लिमों का मानना है कि, ये हमारे लिए तीर्थ है, हमारी मुराद पूरी होती है, मेरी दादी कहती थीं, माता भगवान की चहेती महिला थीं जो कभी मछली तो कभी कोयल का रूप धारण कर कश्मीर में बस्ती रही हैं।
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बीते साल सितंबर में आई इस सदी की सबसे बड़ी बाढ़ का इशारा क्षीर भवानी मंदिर में स्थित रागिनी कुंड ने पहले ही दे दिया था। बीते साल क्षीर भवानी मंदिर में स्थित रागिनी कुंड का पानी खुद-व-खुद ही लाल हो गया था। ऐसी मान्यता है कि कुंड का पानी जब अपना रंग बदलता है तो विनाश होता है।
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इस मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह ने कराया था। बाद में महाराज हरी सिंह ने जीर्णोद्वार कराया। कश्मीर में अमरनाथ गुफा के बाद यह सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। 1989 में आतंकी घटनाओं से वहां के कश्मीरी पण्डित विस्थापित हो गए थें।
अब इन लोगों ने जम्मू में जानीपुर के निकट भवानी नगर में हूबहू मूल मंदिर की तरह एक नया क्षीर भवानी मंदिर बनवा लिया है, किन्तु 17 साल बाद सन 2007 से विस्थापित पण्डितों ने अब मूल मंदिर में जाना शुरू कर दिया है।