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लाहौर बचाने के लिए अखनूर से भागी थी पाकिस्तानी सेना

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फतेह चक्क (भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा)। 1965 के भारत-पाक युद्ध हमारी शानदार विजय को 50 साल पूरे हो रहें। सेना स्वर्ण जयंती पर अनेक आयोजन कर रही है।
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लाहौर बचाने के लिए अखनूर से भागी थी पाकिस्तानी सेना

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इसी क्रम में सोमवार को सेना ने दस्तावेजों के हवाले से बताया कि पाकिस्तान घबराहट में सियालकोट बचाने के लिए अखनूर मोर्चे से पीछे हटा था।

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इस मोर्चे से पाक सेना को पीछे हटाते हुए उसे सियालकोट और लाहौर की हिफाजत में लगा दिया गया था। पाक सेना की साजिश अखनूर पुल पर कब्जा कर घाटी को देश के अन्य हिस्सों से काटने की थी। उसके मंसूबे धरे के धरे रह गए।

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इस युद्ध में मीरां साहिब ब्रिगेड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए सबसे पहले पाकिस्तान की पीली पोस्ट, कुंदनपुर तथा अपर औैर डाउन बेंस पर कब्जा जमाया। इसके बाद सियालकोट पर भी कब्जा किया था।
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इस ब्रिगेड के मौजूदा ब्रिगेडियर एसकेएस चौहान ने सोमवार को फतेह चक्क में 65 की विजय गाथा तथा जवानों की जांबाजी के विषय में बताया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद पाकिस्तान ने तीन मोर्चों पर काम करना शुरू किया।
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1965 में आपरेशन डेजर्ट हॉक-रन आफ कच्छ चलाया। इसके बाद उसने आपरेशन जिब्राल्टर (एक से पांच अगस्त) तक चलाया। इसमें श्रीनगर के हवाई अड्डे, रेडियो स्टेशन तथा पुलिस स्टेशनों पर कब्जा करने की कोशिश की गई।
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भारत ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए 25 से 27 अगस्त के बीच उसके हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। आपरेशन ग्रैंड स्लेम के जरिये पाक सेना ने अखनूर पुल पर कब्जा जमाते हुए जम्मू, पंजाब के रास्ते दिल्ली पर कब्जा करने और घाटी को देश के अन्य हिस्सों से काटने के मंसूबे के तहत हमला किया।

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लेकिन सियालकोट से लाहौर पर कब्जा करने के लिए भारत की सैन्य टुकड़ी बढ़ती इससे पहले ही बुरी तरह से घबराए पाकिस्तान ने अखनूर मोर्चे से उलटे पांव भागते हुए अपनी पूरी सेना को सियालकोट तथा लाहौर के मोर्चे पर लगा दिया।

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चौहान ने बताया कि सियालकोट पर कब्जे के बाद तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री अयूब खान ने 6 सितंबर को भारत को हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया।

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पाकिस्तान ने सुचेतगढ़ सेक्टर में भी कब्जे की कोशिश की थी। सियालकोट पर भारत ने युद्ध समाप्ति पर 23 सितंबर से फरवरी 1966 के मध्य तक कब्जा कर रखा था।
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