चेहरों पर खौफ और जुबां पर सरकार के खिलाफ भारी गुस्सा। बूढ़े, बच्चे और जबान सब हांफते हुए चले आ रहे हैं। कोई दो पहिया वाहन तो कोई बाइक पर। एक जल्दी सी है, मानों मौत पीछे लगी हो। हकीकत भी यही थी। इन लोगों ने सारी रात मौत को पल-पल अपनी आंखों के सामने देखा था। बस कुछ वक्त मिला तो वह जान हथेली पर रखकर गांव से निकल पड़े सुरक्षित स्थान की ओर।
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बचकर भागती महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
सांबा का गांव बैन गलाड़। बार्डर से बिल्कुल सटा हुआ। तीन हजार से अधिक आबादी है गांव की। मंगलवार रात दो बजे पाकिस्तान ने इस गांव पर गोले बरसाना शुरू कर दिए। लोग पूरी रात मदद को तरसते रहे। घरों में छोटे-छोटे बच्चे रोते बिलखते रहे। मजबूर मां बाप बच्चों को लेकर घर के एक कोने में डरे सहमे बैठे रहे। जैसे ही सुबह हुई तो पाकिस्तान ने गोले बरसाना और तेज कर दिया। इसके बाद जैसे हर चंद मिनटों के लिए गोले रुके तो लोग गांव से भागने लगे। जिस किसी को भी गांव से निकलने के लिए जो कोई साधन मिला वह भाग निकला। कई लोग ट्रैक्टर ट्रालियों में निकले। कई पैदल ही भागने लगे। हर कोई इतनी स्पीड में निकला, जैसे पीछे मौत लगी हुई है।
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खुद बुलेट प्रूफ वाहन में गए, लोगों को एंबुलेंस में निकाला
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सुरक्षित स्थान पर जाते लोग
- फोटो : अमर उजाला
सांबा के डीसी और एसएसपी सहित अन्य पुलिसकर्मी बुलेट प्रूफ बंकर वाहन में गांव बैनगलाड़ तक पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों को एंबुलेंस और अन्य वाहनों में बाहर लाया गया। साथ ही कुछ मिनी बस इस्तेमाल की गई।
सारी रात बंकर में बैठे रहे, कोई मदद को नहीं आया
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सुरक्षित स्थान पर जाती महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
बंकरों से निकलते लोगों के चेहरों पर खौफ साफ दिख रहा था। मोनी देवी ने कहा कि दो बजे गोलाबारी शुरू हो गई थी। वह किसी तरह से घरों से निकल कर इस बंकर तक पहुंचे हैं। सारी रात बंकर में बैठ कर निकाली है। उनकी मदद के लिए कोई नहीं आया। सुबह 10 बजे तक लोग बंकर में ही थे। इनके साथ कई बच्चे भी थे। बच्चे भूख प्यास से तड़प रहे थे।
एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता एक मिनी बस लेकर पहुंचा। इन लोगों को बंकरों से बाहर निकाल कर कंगवाला में लाया गया। यहां एक कम्युनिटी हाल में इन लोगों को बिठाया गया। इनमें अधिकतर महिलाएं शामिल थीं। कुछ बुजुर्ग भी थे। स्थानीय लोगों ने इनके लिए चाय का बंदोबस्त किया।
गांव खाली करा दिए हैं, तो अब पाक पर हमला कर खत्म करो खेल
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गोलीबारी से खौफ में बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
गांव तो पूरे खाली हो ही गए हैं। हर तीन चार महीने के बाद ऐसा करना पड़ता है। जब सभी गांव खाली करा ही दिए हैं तो अब पाकिस्तान पर चढ़ाई कर ही दो। क्यों यह रोज-रोज का ड्रामा लगा रखा है। एक बार अब युद्ध हो ही जाना चाहिए। क्योंकि हमारे लिए यह युद्ध ही है। बंबो चक के रबेल सिंह कहते हैं कि बच्चे पढ़ नहीं सकते। परिवार दरबदर हो रहा है। आखिर कब तक चलता रहेगा ऐसा। अब हम तंग आ चुके हैं। बच्चे और बुजुर्गों के लिए सबसे मुश्किल है। वह कहां रोज रोज भाग कर जाएंगे। गांव गोविंदगढ़ के रहने वाले सूचा सिंह का कहना है कि एक गोला घर के आंगन में आकर गिरा है। बड़ी मुश्किल से भाग कर आए हैं।