1965 के सितंबर महीने में पाकिस्तान ने अपने नापाक मंसूबों को लेकर भारत पर हमला कर दिया था, लेकिन पाकिस्तान ये भूल चुका था कि भारतीय सेना उसके नापाक इरादों को असफल करने के लिए पूरी तरह से तैनात बैठी थी।
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आज हम आपको 1965 युद्ध में शहीद वीर जवान अब्दुल हमीद की शाहादत की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आप भी गर्व महसूस करेंगे।
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1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो भारत के वीर सपूतों ने मोर्चा संभाला। आठ सितंबर की रात अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में तैनात थे। इसी मोर्चे पर पाकिस्तान ने अपने अपराजेय माने जाने वाले टैंक अमेरिकन पैटन को लड़ाई में उतारा।
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पाक के इन टैंकों ने खेमकरण सेक्टर में हमला कर दिया। देश के वीर सपूत अब्दुल हमीद ने भी भारतीय सैनिकों के साथ मोर्चा संभाला। अब्दुल हामीद के पास बुलंद हौंसलों के सिवाए कोई हथियार नहीं था।
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हामीद बिना अपनी जान की परवाह किए पाकिस्तानी टैंकों के सामने खड़े हो गए। उस वक्त उनके पास सिर्फ गन माउनटेड जीप थी। उन्होंने अपने अनुभव से पाक टैंकों की कमजोरी का पता लगा लिया।
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हामीद ने इन्हीं कमजोर हिस्सों पर निशाना साधना शुरू किया और एक-एक कर पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तानाबूत करना शुरू कर दिया। उनकी वीरता ने भारतीय सैनिकों में जोश भर दिया।
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हमीद ने अकेले ही पाकिस्तान के 7 टैंकों को ध्वस्त कर दिया। हामीद और उनके साथियों के हौसले के सामने पाक सैनिक ज्यादा देर तक टिक नहीं पाए और वापस लौटने को मजबूर हो गए। वीर हामीद यहां भी नहीं रुके, वो वापस भाग रहे पाक सैनिकों का पीछा करने लगे। इसी दौरान उनकी जीप पर एक बम का गोला आ गिरा। इसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए। 10 सितंबर को वे शहीद हो गए।
सरकार ने अब्दुल हामीद की वीरता को सलाम करते हुए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा। आज पूरा देश अब्दुल हामीद की वीरता को सलाम कर रहा है।