होली के नाम से ही मथुरा और बरसाना याद आता है, जहां के रोम-रोम में कृष्ण व राधा की लीलाएं बसी हुई हैं। लेकिन एक और चीज की याद दिलाती है होली। वह परम्परा जो 300 साल पहले अरब से यहां लाई गई थी।
विज्ञापन
पीठ पर पड़ेंगे, तो बिखरेंगे रंग और खुशबू
2 of 5
गुलाल गोटा
- फोटो : अमर उजाला
हम बात कर रहे हैं जयपुर में सदियों से चली आ रही एक विशेष परम्परा की। यहां होली खेलने के लिए लड्डू के आकार के गुलाल गोटे बनाए जाते हैं। ये गुलाल से बनते हैं, जो होली के दौरान एक-दूसरे पर फेंके जाते हैं। डरिये मत, ये लगते ही फूट जाते हैं और फिजाओं में गुलाल के सात रंग व खुशबू बिखेर देते हैं। होली खेलते समय जब ये पीठ पर गोल-गोल गोटे पड़ते हैं, तो बिखरने वाले सात रंग विदेशी सैलानियों की यादों में राजस्थान की यादें ताजा रखते हैं।
विज्ञापन
300 साल से इसी काम में लगा है परिवार
3 of 5
गुलाल गोटा
- फोटो : अमर उजाला
जयपुर में खास तौर पर लड्डू के आकार के गुलाल गोटे तैयार किए जाते हैं और परिवार भी 300 सालों से इस काम में लगे हुए हैं। जयपुर के पुराने शहर में रह रही गुलाल गोटा की महिला कारीगर मुसर्रत जहां ने बताया कि उनका परिवार 300 साल से गुलाल गोटा बनाने की परम्परा निभा रहा है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों को कच्छावा राजा ने 300 साल पहले अरब से लाकर यहां बसाया था। राज परिवार उनके पूर्वजों के बनाए गुलाल गोटों से होली खेलता था, लेकिन अब ये खेल राज परिवार से निकलकर आम जनता तक पहुंच चुका है।
श्रीकृष्ण के चरणों में होते हैं अर्पित
4 of 5
गुलाल गोटा
- फोटो : अमर उजाला
जानकारी के अनुसार मथुरा के उदासीन कासीन आश्रम में जयपुर के मणिहार मुस्लिम परिवार द्वारा गुलाल गोटा तैयार किया जाता है, जिसे सम्पूर्ण श्रद्धा से सराबोर होकर श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित किया जाता है। इसके बाद शुरू होती है होली।
जयपुर के पुराने शहर में स्थित मणिहारों के रास्ते में रहने वाले गुलाल गोटे के प्रख्यात कारीगर आवाज मोहम्मत मणिहार के अनुसार वे हर साल मथुरा के आश्रम में 5 हजार गुलाल गोटे बनाकर भेजते हैं। साथ ही, गुजरात के स्वामी नारायण मंदिर में भी गुलाल गोटे यहीं से जाते हैं। गुलाल गोटे के एक अन्य कारीगर रिफाकत सुल्ताना ने बताया कि हमारे यहां विदेशी सैलानी खास तौर पर गुलाल गोटा बनता हुआ देखने के लिए आते हैं।