चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिवसीय दौरे पर 11 अक्तूबर को भारत पहुंचे रहे हैं। जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात चेन्नई में होगी। इसके बाद दोनों नेता महाबलिपुरम के तीन प्रसिद्ध स्मारकों और एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। इस महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के लिए आखिर ममल्लापुरम (महाबलीपुरम) को चुनने के पीछे कोई खास वजह होगी।
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ममल्लापुरम (महाबलीपुरम) के मंदिरों में शिल्प का नमूना
- फोटो : PTI
ममल्लापुरम और चीन के बीच का संबंध काफी पुराना है। ममल्लापुरम बंदरगाह पर पल्लव वंश का अधिकार एक लंब अरसे तक था। जानकारों के मुताबिक द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के लिए यहां से दूत चीन भेजे गए थे।
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mamallapuram, mahabalipuram
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ममल्लापुरम को खास तौर पर पत्थर की नक्काशी और पल्लव वंश के काल में पत्थरों से बने मंदिरों के लिए जाना जाता है। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में भी शामिल है।
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ममल्लापुरम के ज्यादातर स्मारकों को नरसिंह वर्मन प्रथम के शासन (630-670 ई.) के दौरान बनवाया गया। पुरातत्विदों की माने तो इसी काल के चीन के सिक्के भी तमिलनाडु में पाए गए थे। इससे इस बात के संकेत मिलते हैं कि प्राचीन काल में भी भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध थे।
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प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु व्हेन सांग भी कांचीपुरम आए थे। माना जाता है कि वह ममल्लापुरम भी आए थे। इसके बाद उन्होंने शहर में मंदिरों के दर्शन करने शुरू किए थे। बौद्ध धर्म को और जानने के लिए वह कांचीपुरम गए थे।
पूर्वी तमिलनाडु में पहली और दूसरी शताब्दी के मिट्टी के बर्तन यहां पाए गए थे। यह इस बात का प्रमाण है कि चीनी लोगों का यहां आना जाना था। इसी तरह से चीन में तमिल में लिखे पात्र मिलते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी से जिनपिंग की मुलाकात के दौरान इस भारत और चीन के इन ऐतिहासिक संबंधों पर भी रौशनी डाली जा सकती है।