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UP: अखिलेश ने अपने पीएस से क्यों जारी करवाई चिट्ठी, आगे क्या करेंगे ओम प्रकाश राजभर और शिवपाल सिंह यादव?

Sun, 24 Jul 2022 10:54 PM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

चिट्ठी जारी होने के बाद से तीन बड़े सवाल उठ रहे हैं। पहला ये कि आखिर अखिलेश यादव ने दोनों नेताओं के लिए खुद ही क्यों नहीं ये चिट्ठी जारी की? आखिर क्यों उन्होंने अपने पीएस के हस्ताक्षर से इसे जारी करवाया? तीसरा सवाल ये है कि अब जब समाजवादी पार्टी ने दोनों नेताओं को आजाद कर दिया है तो अब इनके पास क्या रास्ते हैं?
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समाजवादी पार्टी - फोटो : अमर उजाला
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समाजवादी पार्टी ने शनिवार को शिवपाल सिंह यादव और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर के नाम एक चिट्ठी जारी की। ये चिट्ठी चर्चा का विषय बन चुकी है। इसमें सपा ने राजभर और शिवपाल यादव से साफ कह दिया है कि उन्हें जहां सम्मान मिलता है, वह जा सकते हैं। मतलब साफ है समाजवादी पार्टी चाहती है कि दोनों नेता अब सपा का साथ छोड़ सकते हैं। दोनों किसी अन्य पार्टी के साथ जाने के लिए आजाद हैं। 

चिट्ठी जारी होने के बाद से तीन बड़े सवाल उठ रहे हैं। पहला ये कि आखिर अखिलेश यादव ने दोनों नेताओं के लिए खुद ही क्यों नहीं ये चिट्ठी जारी की? आखिर क्यों उन्होंने अपने पीएस के हस्ताक्षर से इसे जारी करवाया? तीसरा सवाल ये है कि अब जब समाजवादी पार्टी ने दोनों नेताओं को आजाद कर दिया है तो अब इनके पास क्या रास्ते हैं? आइए जानते हैं...
 
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अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला
पहले जान लीजिए चिट्ठी में क्या लिखा था? 
समाजवादी पार्टी की तरफ से शनिवार को दो चिट्ठी जारी की गई। पहली चिट्ठी शिवपाल सिंह यादव के नाम थी और दूसरी ओम प्रकाश राजभर के। दोनों चिट्ठी का मजमून लगभग एक समान था। 

शिवपाल सिंह यादव के लिए जारी चिट्ठी में बस दो लाइन लिखा है। ये कुछ इस प्रकार है- 'माननीय शिवपाल सिंह यादव जी, अगर आपको लगता है, कहीं ज्यादा सम्मान मिलेगा तो वहां जाने के लिए आप स्वतंत्र हैं।'

कुछ इसी प्रकार ओम प्रकाश राजभर के लिए चिट्ठी जारी की गई है। उसमें राजभर पर भाजपा के साथ गठजोड़ का आरोप लगाया गया है। लिखा गया, 'श्री ओम प्रकाश राजभर जी, समाजवादी पार्टी लगातार भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ लड़ रही है। आपका भारतीय जनता पार्टी के साथ गठजोड़ है और लगातार भारतीय जनता पार्टी को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। अगर आपको लगता है, कहीं ज्यादा सम्मान मिलेगा तो वहां जाने के लिए आप स्वतंत्र हैं।'
 
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अखिलेश यादव ने पत्र जारी कर शिवपाल व राजभर को संदेश दिया। - फोटो : amar ujala
चिट्ठी किसने जारी की? 
इस चिट्ठी में कहीं भी समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव का जिक्र नहीं है। ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर ये चिट्ठी जारी किसने की? हमने इसकी पड़ताल की तो मालूम चला कि ये चिट्ठी अखिलेश यादव के निजी सचिव गंगाराम के हस्ताक्षर से जारी की गई है। अब आप सोच रहे होंगे कि अखिलेश ने खुद की बजाय अपने निजी सचिव से दोनों बड़े नेताओं के लिए चिट्ठी क्यों जारी करवाई? आइए बताते हैं....
 

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अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव - फोटो : अमर उजाला
निजी सचिव से क्यों जारी करवाई चिट्ठी? 
हमने यही समझने के लिए राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. प्रवीण मिश्र से बात की। उन्होंने कहा, 'राजनीति में हर बयान, हर काम, हर पत्र और हर एक छोटी सी छोटी चीज का बहुत बड़ा मायने होता है। इस पत्र में भी बड़ा राजनीतिक मायना छिपा है।'

प्रो. प्रवीण आगे कहते हैं, 'शिवपाल सिंह यादव और ओम प्रकाश राजभर यूपी के बड़े नेता हैं। सामान्यत: इन दोनों के लिए अखिलेश यादव को खुद पत्र जारी करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक कारण है। वह यह कि अखिलेश यादव इन दोनों नेताओं को इनकी मौजूदा स्थिति बताना चाहते हैं। वह यह बताना चाहते थे कि समाजवादी पार्टी को इनकी जरूरत नहीं है। इसलिए बाहर से धमकी देना बंद करके जो करना है करें। अखिलेश ने अपने समर्थकों को भी इसके जरिए संदेश दिया। वह यह कि समर्थक भी इन दोनों नेताओं की बातों को गंभीरता से न लें, जैसे मैं नहीं ले रहा हूं।'
 
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शिवपाल सिंह यादव और ओम प्रकाश राजभर - फोटो : अमर उजाला
तो क्या सच में दोनों नेताओं को गंभीरता से नहीं लेते अखिलेश? 
प्रो. प्रवीण कहते हैं- नहीं, ऐसा नहीं है। अगर दोनों नेताओं से अखिलेश यादव को कोई फर्क नहीं पड़ता तो वह इसके लिए चिट्ठी नहीं जारी करवाते या फिर उन्हें नाम पर बयान नहीं देते। अखिलेश जानते हैं कि अगर ये दोनों नेता सपा के साथ रहते हुए लगातार बयानबाजी करेंगे तो इससे सपा के समर्थक और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा और वह असहज होंगे। इसलिए अखिलेश को खतरा साफ दिख रहा था। 
 
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मतदान करने के बाद शिवपाल सिंह यादव। - फोटो : amar ujala
तो अब आगे क्या करेंगे शिवपाल सिंह? 
प्रो. प्रवीण कहते हैं, 'शिवपाल सिंह यादव के पास ज्यादा विकल्प नहीं है। वह अपनी और बेटे की राजनीति बचाए रखने के लिए सत्ताधारी भाजपा की मदद ले सकते हैं। ऐसे में वह भाजपा के साथ अपनी पार्टी का विलय कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा उनके बेटे को विधान परिषद भी भेज सकती है। हालांकि, इसकी संभावना कम है।' 

प्रो. प्रवीण आगे कहते हैं, 'प्रसपा के विलय से भाजपा को ज्यादा फायदा नहीं होगा। इसलिए भाजपा के साथ गठजोड़ की ये कहानी पर्दे के पीछे से भी लिखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में भाजपा प्रसपा को मजबूत बनाने के लिए पर्दे के पीछे से शिवपाल सिंह यादव को मदद दे सकती है। इसके बदले शिवपाल लगातार अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोले रख सकते हैं। शिवपाल को समाजवादी पार्टी की पूरी कहानी मालूम है। ऐसे में अगर वह सपा के मजबूत इलाकों में सेंध लगाने की कोशिश करते हैं तो इसका नुकसान सीधे तौर पर अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को ही होगा।'

तीसरी संभावना ये भी है कि प्रसपा भी भाजपा के साथ गठबंधन कर ले। इसके जरिए अखिलेश यादव के वोटर्स में भाजपा सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, अभी प्रसपा जमीनी स्तर पर काफी कमजोर है। ऐसे में इसके लिए शिवपाल सिंह यादव को काफी कोशिश करनी होगी।  
 
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2022 में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा समेत कई छोटे दलों को साथ लाए अखिलेश। - फोटो : ANI
ओम प्रकाश राजभर के लिए क्या रास्ते हैं? 
समाजवादी पार्टी की चिट्ठी आने के बाद ओम प्रकाश राजभर ने भी अपनी राह अलग करने का एलान कर दिया है। राजभर की पार्टी और भाजपा का गठबंधन पहले भी रहा है। चुनाव के दौरान भी वह लगातार भाजपा नेताओं के संपर्क में रहे। हाल ही में उन्हें केंद्र सरकार ने वाई ग्रेड की सुरक्षा प्रदान की है। ऐसे में संभव है कि वह वापस भाजपा के साथ गठबंधन कर लें। लेकिन इसमें भाजपा को फायदे से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि राजभर बोलते ज्यादा हैं। वह पहले भी सरकार में रहते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए विवादित बयान दे चुके हैं। ऐसे में फिर से गठबंधन में लाकर उनके बयानों को बर्दाश्त करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी। 

राजभर कई बार बहुजन समाज पार्टी के साथ जाने की बात करते रहे हैं। हालांकि, यह भी मुश्किल लगता है। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी अकेले दम पर ही पार्टी को फिर से मजबूत बनाने की कोशिश कर रहीं हैं। ऐसे में वह नहीं चाहेंगी कि किसी दूसरे के साथ गठबंधन किया जाए।

हां, अगर राजभर भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद को बसपा के साथ लाने में कामयाब हो जाते हैं तो जरूर दोनों के गठबंधन की कुछ संभावना बन सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि अभी भीम आर्मी भी बसपा के लिए बड़ा खतरा बनते जा रही है। राजस्थान में भी भीम आर्मी के मुखिया जोरशोर से लगे हैं। ऐसे में अगर वहां वह कामयाब होते हैं तो इसका नुकसान बसपा को ही उठाना पड़ेगा। लेकिन अगर दोनों मिलकर चुनाव लड़ें तो बसपा को फायदा हो सकता है।
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