संजय गांधी को भारतीय राजनीति का ऐसा पोस्टर ब्वाय कहा जा सकता है जो जितने लोकप्रिय थे उतनी ही उनके नाम की दहशत भी थी। आपातकाल और उसके बाद के कुछ सालों की राजनीति के केंद्र में संजय ही रहा करते थे। कुछ लोग आपातकाल के लिए उन्हें ही जिम्मेदार मानते हैं तो ये मानने वाले भी कम नहीं मिलेंगे कि संजय गांधी अगर कुछ दिन और जिंदा रहते तो देश की राजनीति की दशा और दिशा कुछ और ही होती। आज संजय गांधी की पुण्य तिथि है, ऐसे में याद करते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्सों को।
विज्ञापन
2 of 12
संजय गांधी को रफ्तार का बहुत शौक था, चाहे वह कार की हो या हवाई जहाज की। उनका यही शौक उनकी जान का दुश्मन बना। जिस दिन उनकी मौत हुई उस दिन वह दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर कैप्टन सुभाष सक्सेना के साथ उड़ान पर निकले थे। उड़ने के कुछ मिनट बाद ही जहाज का इंजन बंद हो गया और कुछ सेकेंड बाद ही वह अशोका होटल के पीछे जाकर गुम हो गया।
विज्ञापन
3 of 12
23 जून 1980 की सुबह हुए इस हादसे में मात्र 32 साल की उम्र में ही संजय गांधी की मौत हो गई थी। उनके साथ ही कैप्टन सक्सेना भी इस हादसे में मारे गए थे। मौत से एक दिन पहले ही संजय गांधी ने पत्नी मेनका गांधी को अपने टू सीटर हवाई जहाज में बैठाकर दिल्ली के आसमान में कई चक्कर लगाए थे।
4 of 12
संजय गांधी ने बहुत कम उम्र में राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। कहा जाता है कि आपातकाल के पहले और बाद के इंदिरा गांधी की राजनीति को पर्दे के पीछे से संजय ही संचालित करते थे। इंदिरा के ऑफिस से निकलकर तमाम फाइलें उनके छोटे बेटे के ऑफिस पहुंचती थी इसके बाद ही उन पर अमल होता था। तेजी से राजनीति में छाने का मंसूबा लेकर आए संजय गांधी के दौर में ही यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई जैसे युवा संगठनों को ऊर्जा मिली और उन्होंने तेजी से पूरे देश में पकड़ बनाई। उस दौर में तमाम अखबारों में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हुडदंग और बवाल के किस्से छाए रहते थे।
विज्ञापन
5 of 12
अपने बड़े भाई की तरह ही संजय गांधी भी प्रशिक्षित पायलट थे, लेकिन उन्होंने इसे पेशे के तौर पर नहीं अपनाया। वह मां की तरह राजनीति में आगे बढ़ने के इरादे लेकर आए थे, इसलिए संजय के दौर में राजीव पूरी तरह किनारे रहे। शायद पायलट के पेशे को छोड़कर राजनीति में आने की उनकी कोई रुचि नहीं थी। वहीं संजय गांधी पूरी तरह राजनीति को आत्मसात करना चाहते थे इसलिए अपनी मां से जुड़े तमाम छोटे बड़े फैसलों में उनकी राय समाहित रहती थी।
विज्ञापन
6 of 12
संजय के बारे में कहा जाता है कि वह राजनीति की पुरानी परिपाटी और नैतिक मर्यादाओं में विश्वास नहीं रखते थे। वह अपने फैसलों को जल्द से जल्द लागू करने की इच्छा रखते थे, उसके लिए चाहे उन्हें कितने ही कड़े कदम उठाने पड़ें। इंदिरा सरकार में लगभग सभी बड़े पदों पर धीरे धीरे संजय ने अपने विश्वासपात्र नौकरशाहों को तैनात करवा दिया था। इस बात को इंदिरा भी अच्छी तरह समझती थी लेकिन अधिकतर समय वह इसपर चुप्पी साधे रहती थीं।
विज्ञापन
7 of 12
कम लोग ही जानते होंगे कि जिन मारुति कारों को आज पूरा देश चलाता है उनकी स्थापना संजय गांधी की पहल पर हुई थी। 1971 में पीपल कार के लिए मारुति की स्थापना की गई, मात्र 25 साल की उम्र में संजय गांधी उसके पहले मैनेजिंग डायरेक्टर बनाए गए। असल में संजय गांधी को कारों का पुराना अनुभव था और वो फॉक्स वैगन में तीन साल इंजीनियर के रूप में काम कर चुके थे।
8 of 12
बहरहाल संजय गांधी की सबसे बड़ी या शायद कुख्यात पहचान बनी इमरजेंसी के दौरान। जिसमें केंद्र की सरकार ने तमाम नागरिक अधिकारों को समाप्त करते हुए देश में अभूतपूर्व आपातकाल लागू कर दिया था। सरकार के इस फैसले के पीछे भी संजय गांधी का दिमाग माना जाता था जिन्होंने अपनी मां इंदिरा गांधी को इसके लिए उकसाया। संजय पर आरोप लगते रहे हैं कि आपातकाल के जरिए वह अपने पांच सूत्रीय फैसले को लागू करवाना चाहते थे। जिनमें साक्षरता, परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन और जातिवाद को दूर करना प्रमुख था।
9 of 12
sanjay gandhi
- फोटो : sanjay gandhi
नसबंदी का उनका दांव उल्टा ही पड़ा। एक जनोपयोगी फैसले को उन्होंने जिस तरह लागू करवाया उसने उन्हें पूरे देश में अलोकप्रिय कर दिया। बताया जाता है कि आपातकाल के 19 महीनों में 50 लाख से ज्यादा लोगों की जबरन नसबंदी की गई, जिसके चलते दो हजार से ज्यादा लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। नसबंदी कार्यक्रम में एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर खूब उंगलियां उठीं। यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता जबरन लोगों के घरों में घुस जाया करते थे और फिर पुरुष सदस्यों को ले जाकर नजदीक बने नसबंदी केंद्र पर ले जाकर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।
10 of 12
आपातकाल के दौरान संजय से जुड़े कई किस्से बड़े फेमस रहे थे। एक था इंद्र कुमार गुजरात से उनका झगड़ा। आपातकाल से पहले इंद्र कुमार गुजराल देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्री हुआ करते थे। इसी दौरान उनके विभाग में संजय का हस्तक्षेप बढ़ने लगा। वह सीधे गुजराल को भी निर्देश देने लगे। यह बात गुजराल को नागवार गुजरी और उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति की बात मानने से इंकार कर दिया जो इलेक्ट्रॉल नहीं था। इसके विरोध में उन्होंने मंत्रालय से इस्तीफा भी दे दिया।
11 of 12
बाद में संजय की पसंद के विधाचरण शुक्ला को देश का नया सूचना एंव प्रसारण मंत्री बनाया गया। जिसके बाद शुरू हुआ देश के संचार माध्यमों पर शिकंजा कसने का दौर। उस दौर का एक किस्सा बड़ा प्रसिद्ध हुआ। मशहूर गायक किशोर कुमार ने यूथ कांग्रेस के एक सम्मेलन में गाना गाने से इंकार कर दिया था जिसके बाद तमाम सरकारी कार्यक्रमों में किशोर कुमार के गाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसी तरह अमृत नाहटा की एक फिल्म "किस्सा कुर्सी का" पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिसको लेकर शक था कि इसमें संजय गांधी के कारण निर्माण के फैसले की निंदा की गई है।
मेनका गांधी से संजय के प्रेम संबंधों का किस्सा भी बहुत चर्चित है। उस दौर के अखबारों में दोनों की खबरें खूब सुर्खियां बना करती थीं। संजय गांधी से मेनका की मुलाकात मात्र 17 साल की उम्र में हो गई थी। मेनका पेशे से मॉडल थी और उनका बांबे डाइंग वाला ऐड काफी सुर्खियां बटोर रहा था। बाद में एक इंटरव्यू में मेनका ने बताया था कि उन्हें पहली बार देखते ही संजय गांधी फिदा हो गए थे और मुलाकात के एक साल बाद ही दोनों ने शादी कर ली। संजय मेनका से दस साल बड़े थे। जिस समय उनकी मौत हुई उनके पुत्र वरुण सात माह के थे।