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Swaroopanand: आजादी के लिए 19 साल की उम्र में जेल गए, जानें कैसे क्रांतिकारी से शंकराचार्य बने स्वरूपानंद?

Sun, 11 Sep 2022 05:44 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती का जन्म मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में जबलपुर के पास दिघोरी गांव में हुआ था। माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में ही स्वामी स्वरूपानंद ने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक यात्रा शुरू कर दी।
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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती - फोटो : अमर उजाला
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का आज निधन हो गया। स्वामी स्वरूपानंद की उम्र 99 साल थी। उन्होंने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में आखिरी सांस ली। स्वामी स्वरुपानंद कम उम्र में घर छोड़कर वह काशी आ गए और यहां वेद की शिक्षा हासिल की। देश की आजादी के लिए उन्होंने लड़ाई भी लड़ी और जेल भी गए। 

आइए जानते हैं स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बारे में सबकुछ। कैसे वह एक क्रांतिकारी से करोड़ों भारतीयों की आस्था के केंद्र द्वारका पीठ के शंकराचार्य बनें? 
 
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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के साथ प्रियंका गांधी। - फोटो : अमर उजाला
जन्म से शुरुआत करते हैं
स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती का जन्म मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में जबलपुर के पास दिघोरी गांव में हुआ था। माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में ही स्वामी स्वरूपानंद ने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक यात्रा शुरू कर दी। देश के तमाम हिंदू तीर्थ स्थलों का भ्रमण करने के बाद वह काशी (वाराणसी) पहुंचे। यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग, शास्त्रों और धर्म की शिक्षा ग्रहण की। 


 
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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी। - फोटो : अमर उजाला
आजादी की लड़ाई भी लड़ी और जेल भी गए
साल 1942 की बात है। तब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की उम्र महज 19 साल थी। उस वक्त पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का आंदोलन चल रहा था। स्वामी स्वरूपानंद भी इसमें शामिल हुए। उन्होंने आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम चलाई। तब स्वामी स्वरूपानंद क्रांतिकारी साधु के रुप में प्रसिद्ध हुए थे। अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए उन्हें पहले वाराणसी की जेल में नौ महीने और फिर मध्य प्रदेश की जेल में छह महीने रहना पड़ा। इस दौरान वह करपात्री महाराज के राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी रहे। 
 

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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती - फोटो : अमर उजाला
1950 में दंडी संन्यासी बने, फिर शंकराचार्य की उपाधि भी मिली
1950 में स्वामी स्वरूपानंद दंडी संन्यासी बनाये गए। शास्त्रों के अनुसार दंडी संन्यासी केवल ब्राह्मण ही बन सकते हैं। दंडी संन्यासी को ग्रहस्थ जीवन से दूर रहना पड़ता है। उस दौरान उन्होंने ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-संन्यास की दीक्षा ली थी। इसके बाद से ही उनकी पहचान स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के रूप में हुई। 1981 में स्वामी स्वरूपानंद को शंकराचार्य की उपाधि मिली। 
 
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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने आज आखिरी सांस ली। - फोटो : अमर उजाला
गांधी परिवार के करीबी
स्वामी स्वरूपानंद को नेहरु-गांधी परिवार का काफी करीबी माना जाता था। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक स्वामी स्वरूपानंद का आशीर्वाद ले चुके हैं। अक्सर गांधी परिवार स्वामी स्वरूपानंद के दर्शन के लिए मध्य प्रदेश जाता रहता था।
 
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स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती - फोटो : अमर उजाला
शंकराचार्य पद को लेकर विवाद भी रहा
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में एक उत्तरखंड के जोशीमठ की ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी को लेकर विवाद देश की आज़ादी के समय से ही शुरू हो गया था। 1960 से यह मामला अलग- अलग अदालतों में चला। 1989 में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के गद्दी संभालने के बाद द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उनके खिलाफ इलाहाबाद की अदालत में मुकदमा दाखिल किया और उन्हें हटाने की मांग की थी। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इलाहाबाद की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में करीब तीन साल पहले इस मामले की सुनवाई डे-टू-डे बेसिस पर शुरू हुई थी।

निचली अदालत में दोनों तरफ से करीब पौने दो सौ गवाहों को पेश किया गया था। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी को लेकर करीब सत्ताइस साल तक चले मुकदमे में इलाहाबाद की जिला अदालत ने साल 2015 की पांच मई को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के हक में फैसला सुनाया था और 1989 से इस पीठ के शंकराचार्य के तौर पर काम कर रहे स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती की पदवी को अवैध करार देते हुए उनके काम करने पर पाबंदी लगा दी थी।

इलाहाबाद जिला अदालत के सिविल जज सीनियर डिवीजन गोपाल उपाध्याय की कोर्ट ने 308 पेज के फैसले में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती की वसीयत को फर्जी करार दिया था। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। इस बीच शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने भी हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर मामले का निपटारा जल्द किये जाने की अपील की थी। 2017 में कोर्ट ने दोनों को ही शंकराचार्य मानने से इंकार कर दिया था। अब तक ये मामला लगातार विवादों में ही रहा है।
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