यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के प्रोफेसर प्रभात झा के मुताबिक भारत में 2010 में पूरे साल जितने लोगों की मौत हुई उसमें 10 फीसदी मौतें सिगरेट पीने से हुई थी। मरने वालों में तीस फीसदी वो लोग थे वो जिनकी उम्र 30 साल से कम थी।
2017 के आंकड़े बताते हैं कि शहरी इलाकों में धूम्रपान करने वाले युवाओं की संख्या में 68 फीसदी का इजाफा हुआ है। अब इनकी तादाद 1.9 करोड़ से बढ़कर 3 करोड़ हो चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बढ़त 26 फीसदी है। धूम्रपान करने वालों की कुल संख्या 6.1 करोड़ से बढ़कर 7.7 करोड़ तक पहुंच गई है। इसमें महिलाओं की संख्या पुरुषाें की संख्या का 10वां हिस्सा है। 2015 में लगभग 1.1 करोड़ महिलाएं धूम्रपान का शिकार थी। एक रिपोर्ट की मानें तो युवाओं ने धूम्रपान की आदत में कमी लाई है मगर धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई सकी है।
सिगरेट पीने के के दौरान नब्ज बढ़ जाती है क्योंकि सिगरेट में मौजूद निकोटिन अनुकंपी तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर देता है। आखिरी सिगरेट के 20 मिनट बाद नब्ज की दर और ब्लड प्रेशर दोबारा सामान्य हो जाते हैं।
सिगरेट छोड़ने के महीनेभर बाद रक्त सप्लाई बेहतर हो जाती है। फेफड़ों द्वारा ऑक्सीजन लेना 30% तक बढ़ जाता है। खांसी का दौरा भी कम हो जाता है, फेफड़ों की सफाई करने वाले सिलिया दोबारा से उग जाते हैं। धूम्रपान नहीं करने वालों में धूम्रपान नहीं करने वालों के मुकाबले हार्ट अटैक की दर 70 फीसदी अधिक होती है। सिगरेट पीने से स्वाद और गंध की समझ भी प्रभावित होती है। यह समझ आखिरी सिगरेट के दो दिन बाद सामान्य होने लगती है।
कार्बन मोनोऑक्साइड की वजह से प्रभावित कोशिकाएं ऑक्सीजन नहीं ले जा पातीं। सिगरेट छोड़ने के 12 घंटे बाद खून में मोनोऑक्साइड का स्तर गिर जाता है और खून में ऑक्सीजन का स्तर सामान्य हो जाता है।
सिगरेट छोड़ने के एक साल बाद दिल की बीमारी का खतरा 50 फीसदी कम हो जाता है। वहीं फेफड़ों के कैंसर से मौत का जोखिम 10 साल में आधा हो जाता है। 15 साल बाद कोरोनरी हृदय रोग का उतना ही होता है मानों कभी सिगरेट पी ही न हो।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में विश्व की कुल उत्पादित सिगरेट का 12 फीसदी हिस्सा इस्तेमाल होता है।