फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

By-Election : रामपुर और आजमगढ़ में कैसे जीत गई भाजपा, सपा को क्यों करना पड़ा हार का सामना? जानें पांच बड़े कारण

Mon, 27 Jun 2022 10:37 AM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रामपुर में भाजपा प्रत्याशी घनश्याम लोधी ने करीब 42 हजार मतों से समाजवादी पार्टी के आसिम रजा को मात दे दी। वहीं, आजमगढ़ में भोजपुरी गायक और भाजपा के उम्मीदवार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव को परास्त कर दिया। 
विज्ञापन
1 of 7
आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव - फोटो : अमर उजाला
रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा सीट पर उपचुनाव में बड़ा उलटफेर हुआ। भाजपा ने ये दोनों सीटें सपा से छीन लीं। रामपुर में भाजपा प्रत्याशी घनश्याम लोधी ने करीब 42 हजार मतों से समाजवादी पार्टी के आसिम रजा को मात दी। वहीं, आजमगढ़ में भोजपुरी गायक और भाजपा उम्मीदवार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव को हराया।

भाजपा के लिए यह जीत काफी मायने रखती है, क्योंकि रामपुर को सपा के कद्दावर नेता आजम खां और आजमगढ़ को अखिलेश-मुलायम का गढ़ माना जाता है। 2019 लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ से अखिलेश यादव जीते थे। वहीं, 2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद चुने गए थे। उधर, 2019 के लोकसभा चुनाव में आजम खां रामपुर में सांसद बने थे। अब ये दोनों सीटें भाजपा के खाते में चली गई हैं। 



आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में भाजपा की जीत के बाद कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। आखिर भाजपा ने अखिलेश और आजम खां के गढ़ में कैसे सेंध लगा दी? भाजपा की जीत के कारण क्या हैं? समाजवादी पार्टी क्यों हार गई? आइए जानते हैं...
 
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 7
UP Lok Sabha By Election - फोटो : अमर उजाला
पहले जानिए चुनाव में क्या हुआ?

आजमगढ़ : यहां उपचुनाव में भाजपा ने मशहूर भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ पर एक बार फिर भरोसा जताया। 2019 में भी निरहुआ इस सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए थे। तब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें हराया था। इस बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अखिलेश ने आजमगढ़ की लोकसभा सीट छोड़ दी। उपचुनाव में उन्होंने अपने भाई धर्मेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाया। हालांकि, धर्मेंद्र अखिलेश की जीत बरकरार नहीं रख पाए और चुनाव हार गए।  

रामपुर : यहां उपचुनाव में भाजपा ने घनश्याम लोधी को प्रत्याशी बनाया। घनश्याम एक समय सपा के दिग्गज नेता आजम खां के करीबी थे। वह सपा से एमएलसी भी रह चुके हैं। 2022 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लोधी ने सपा का दामन छोड़कर भाजपा जॉइन कर ली थी। तब वह पार्टी से टिकट पाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन नहीं मिल पाया। 

आजम खां के लोकसभा सीट छोड़ने पर उपचुनाव का एलान हुआ तो भाजपा ने घनश्याम लोधी को उम्मीदवार बना दिया। दूसरी तरफ सपा ने आजम खां के करीबी आसिम रजा को टिकट दिया। जेल से बाहर आने के बाद खुद आजम खां ने ही आसिम के नाम का एलान किया था, लेकिन घनश्याम लोधी ने 42 हजार मतों से जीत हासिल की। 




आगे पढ़िए भाजपा की जीत और सपा की हार के कारण...


 
विज्ञापन

3 of 7
आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव - फोटो : अमर उजाला
1. जातीय समीकरण सफल : आजमगढ़ लोकसभा सीट के तहत मेंहनगर, आजमगढ़ सदर, मुबारकपुर, सगड़ी और गोपालपुर विधानसभा सीटें आती हैं। यहां यादव और मुस्लिम वोटर्स की संख्या सबसे ज्यादा है। दलित और कुर्मी वोटर्स भी निर्णायक भूमिका में हैं। आमतौर पर यादव वोटर्स सपा के साथ जाते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी स्थानीय स्तर पर निरहुआ जनता के बीच रहकर काम कर रहे थे। इसका फायदा उन्हें मिला और सपा के कोर वोटर्स भी भाजपा में शिफ्ट हो गए। वहीं, मुस्लिम वोट शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली और सपा के धर्मेंद्र यादव में बंट गए। 

रामपुर में सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बाद लोधी, सैनी और दलित मतदाताओं की संख्या भी काफी है। कहा जाता है कि घनश्याम लोधी इन जातियों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। इसके अलावा अन्य ओबीसी और सामान्य वर्ग ने भी भाजपा का साथ दिया। चूंकि इस बार बसपा और कांग्रेस ने भी चुनाव नहीं लड़ा, इसलिए हिंदुओं का वोट भी एकजुट हो गया और लोगों ने भाजपा को समर्थन दे दिया। वहीं, कांग्रेस नेता और 2019 लोकसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे नवाब काजिम अली खान ने भी भाजपा के समर्थन का एलान किया था। ऐसे में उनके समर्थक भी भाजपा के लिए प्रचार कर रहे थे। 

 

4 of 7
आजम खान, अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव। - फोटो : अमर उजाला
2. अखिलेश-आजम की लड़ाई का असर : आजम खां और अखिलेश यादव के बीच मतभेद की खबरें खूब सामने आईं। इसके चलते दोनों के समर्थक भी कई बार खुलकर एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए दिखे। विधानसभा चुनाव के बाद आजम खां के समर्थकों ने आरोप लगाया कि यादव वोटर्स ने सपा को वोट ही नहीं दिया। वहीं, बुलडोजर व अन्य मामलों में मुस्लिमों का साथ न देने का भी आरोप सपा पर लगा। यूपी की राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले प्रो. अजय सिंह कहते हैं कि इसके चलते मुस्लिमों का सपा से मोह भंग हुआ। आजमगढ़ में मुस्लिमों ने बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली पर ज्यादा भरोसा जताया। इसके चलते मुस्लिम वोट बंट गए। वहीं, निरहुआ पर यादव के साथ-साथ दलित और कुर्मी वोटर्स ने भी विश्वास जताया। 

 
विज्ञापन

5 of 7
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव। - फोटो : amar ujala
3. अखिलेश का प्रचार न करना : सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने उपचुनाव प्रचार से दूरी बना ली थी। इसका असर परिणाम पर देखने को मिला। अखिलेश ने रामपुर और आजमगढ़ में एक दिन भी प्रचार नहीं किया, जबकि आजमगढ़ उनका लोकसभा क्षेत्र भी रह चुका है। इसके चलते स्थानीय लोग नाराज दिखे। लोगों का कहना था कि आजमगढ़ के लोगों ने जिसे चुनाव जिताया, उसने एक बार में ही आजमगढ़ को बेगाना कर दिया। वहीं, आजम खां भी काफी समय तक जेल में रहे। इसके चलते वह रामपुर से कट गए थे। 
 
विज्ञापन

6 of 7
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : अमर उजाला।
4. योगी का क्रेज : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर रूप यूपी समेत पूरे देश में छाया हुआ है। रामपुर और आजमगढ़ में भी इसका असर देखने को मिला। रामपुर में आजम खां के कई ठिकानों पर सरकार का बुलडोजर चला। वहीं, आजमगढ़ के कई अपराधियों पर यूपी पुलिस ने शिकंजा कसा। इसका सकारात्मक संदेश वोटर्स के बीच गया। इसके अलावा मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना जैसी नीतियां भी भाजपा के लिए कारगर साबित हुईं। 

 
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
इस बार कम वोटिंग हुई। - फोटो : सोशल मीडिया
5. कम वोटिंग का दिखा असर :  प्रोफेसर डॉ. अजय सिंह कहते हैं कि परिणाम में कम वोटिंग का असर भी देखने को मिला है। रामपुर में इस बार केवल 41 प्रतिशत वोटिंग हुई, वहीं आजमगढ़ में 49 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला। 2019 के मुकाबले दोनों क्षेत्रों में वोटिंग पर्सेंटेज घटा। चूंकि दोनों जगह सपा ने 2019 में जीत हासिल की थी, इसलिए कम वोटिंग का नुकसान भी सपा को ही उठाना पड़ा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें