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इबारत 2018 : इंसान और इंसानियत को गहरे जख्म देकर जा रहा है यह साल

Sat, 29 Dec 2018 04:21 AM IST
Gaurav Pandey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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चंद दिन और, फिर नया साल। लोगों में उत्साह होगा साथ ही खट्टी-मीठी यादें भी, लेकिन इन सबसे इतर 2018 में घटी वह घटनाएं जिन्होंने न केवल देश-दुनिया को प्रभावित किया बल्कि ऐसी टीस छोड़ कर गईं जो लंबे समय तक मानवता के माथे पर दाग बन कर रहेंगी। बिहार के आश्रय गृह में बच्चियों के साथ दुष्कर्म से लेकर पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र के बिगड़ते हालात तक, पढ़िए हर प्रमुख घटनाक्रम इबारत-2018 में...
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डरो हमसे, हम इंसान नहीं ‘मर्द’ हैं

41 बेसहारा बच्चियों में 34 के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई। मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई, तो पता चला कि संचालक ही बना था बच्चियों का दुश्मन।
बेसहारा बच्चियों को सहारा देने के नाम पर आश्रय गृह खोलकर किस तरह का घिनौना खेल खेला जाता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, बिहार के मुजफ्फरपुर का बालिका गृह कांड। इस कांड का खुलासा होने पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। 

पुलिस के मुताबिक, मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में 41 लड़कियां थीं और मेडिकल रिपोर्ट में 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई। इस मामले में बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा को भी आरोपित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने शेल्टर होम में लड़कियों से कथित यौन हिंसा और दुष्कर्म के आरोपों की जांच कर रहे सीबीआई की रिपोर्ट को ‘भयानक' और ‘डरावना' बताया था। 

इसके अलावा यूपी के देवरिया जिले में भी ऐसा ही मामला सामने आया। मामले का खुलासा उस समय हुआ जब एक लड़की किसी तरह भागकर महिला थाने पहुंची और आपबीती सुनाई। इसके बाद पुलिस ने देर रात छापा मारकर वहां से 24 लड़कियों को मुक्त कराया। वहीं, इस वर्ष दुष्कर्म की कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिससे लोगों का खून खौल उठा। 

साल की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई। घटना के 7 दिन बाद बच्ची का शव जंगल से बरामद हुआ। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। एक और दिल दहला देने वाली घटना जून में घटी। मध्यप्रदेश के मंदसौर में सात साल की बच्ची के साथ निर्भया जैसी दरिंदगी की गई। इस घटना को लेकर लोगों में काफी रोष देखा गया। लोग न्याय के लिए सड़कों पर उतर गए। इस मामले में 55 दिन बाद दो आरोपियों को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। 

वहीं, गुजरात के साबरकंठा जिले में 28 सितंबर को 14 माह की एक बच्ची के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में एक प्रवासी युवक की गिरफ्तारी के बाद आक्रोशित स्थानीय लोगों ने गैर गुजरातियों को निशाना बनाया। यहां सबसे ज्यादा भयावह बात यह है कि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिसमें छोटी बच्चियों को निशाना बनाया जा रहा है। 
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इंसानियत बेचता इंसान

मुंबई पुलिस ने 18 अगस्त को राजूभाई गमलेवाला को 300 से ज्यादा छोटे बच्चों को अमेरिका में बेचने के जुर्म में गिरफ्तार किया। इसी तरह 8 सितंबर को साइदुल शेख को बांग्लादेश से 500 लड़कियों को अगवा कर मुंबई में बेचने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया। बच्चे इंसानियत का भविष्य होते हैं। समाज की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हर बच्चा महफूज रहे। हर मां-बाप का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने बच्चों को बेहतरीन जिंदगी दे। लेकिन नैतिकता की तब कमर टूट जाती है और कर्तव्य कराहते रह जाते हैं, जब समाज का एक हिस्सा मासूमों का सौदा करता है। उन लोगों को भी माफ नहीं कर सकते, जो मजबूरी के नाम पर बच्चों को बेच देते हैं। 

इस तरह के मामलों में बड़े रसूखदार लोग शामिल होते हैं और पीड़ित इतने कमजोर होते हैं कि शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाते हैं। ऐसे में किसी भी कानून से क्या हासिल होगा?

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अमृतसर दशहरा हादसा : लोग कटते रहे, वादे बंटते रहे और नेताजी हंसते रहे

अमृतसर में दशहरा के दिन रावण दहन के लिए जमा हुए लोगों की मौत सामूहिक सामाजिक चेतना शून्यता का वीभत्स उदाहरण है। 60 लोग ट्रेन की चपेट में आकर मर जाते हैं, लेकिन जिम्मेदार लोग एक-दूसरे पर अंगुलियां उठाते नजर आते हैं। यह पहला या इकलौता मामला नहीं जब सरकार, प्रशासन और नेताओं ने इस तरह से ढिठाई  दिखाई हो। जांच हुई, ट्रेन के ड्राइवर्स को निलंबित कर दिया गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई गलती ड्राइवर्स की थी। असल जिम्मेदार तो वह लोग हैं, जिन्होंने वहां भीड़ जुटाई।
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आरबीआई : उर्जित पटेल का इस्तीफा बताता है कि सब ठीक नहीं है

उर्जित पटेल का इस्तीफा एक रहस्य है। आखिर उनके के गुस्से की वजह क्या है? आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का समय से पहले इस्तीफा देना कई सवाल खड़े करता है। समय से पहले इस्तीफा देना सहज बात नहीं होती है। यह गुस्से या भारी दबाव की वजह से उठने वाला कदम है। भले ही वे अपनी और सरकार की गरिमा बचाए रखने को इस्तीफे के लिए निजी वजह बता गए हों, लेकिन उर्जित पटेल का इस तरह से जाना बताता है कि देश की सरकार और देश की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े नियामक के बीच सबकुछ ठीक नहीं है। इससे तमाम लोग गुस्से में भी हैं और गुस्सा जायज भी है। 
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सीबीआई बनाम सीबीआई : ‘तोतों’ की लड़ाई में मर्यादा तार-तार

सीबीआई को तोता पहले ही बताया जा चुका था, लेकिन अब तोतों की लड़ाई दुनिया देख रही है। यह निर्लज्जता के विरले उदाहरणों में से एक है कि अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के दो सबसे बड़े अधिकारी घूसखोरी के मामले में आपस में उलझ रहे हैं। सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना द्वारा सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर घूसखोरी का आरोप लगाने से मामला शुरू हुआ। इसके बाद आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना पर कई मामलों में संदिग्ध होने का आरोप लगाया। इस मामले का अंजाम चाहे जो रहे, लेकिन इस तरह की घटनाएं लोगों में गुस्सा जगाती हैं और भरोसा तोड़ती हैं।
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छुट्टी न मिलने पर मारी गोली

गुरुग्राम के एडिशनल सेशन जज कृष्णकांत शर्मा के गनर महिपाल ने उनकी पत्नी रेणु और बेटे ध्रुव को गोली मार दी। इसके बाद जज के बेटे को शैतान और उसकी मां को शैतान की मां कहकर चिल्लाने लगा था। उसने ध्रुव को कार में डालने की कोशिश भी की थी, लेकिन जब सफल नहीं हुआ, तो कार लेकर भाग गया। आरोपी महिपाल ने वारदात से 4-5 दिन पहले जज से छुट्टी मांग रहा था, लेकिन छट्टी नहीं मिलने से वह परेशान था। 

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महिला सिपाही की डेंगू से मौत पर प्रशिक्षु सिपाहियों ने अफसरों को पीटा

पटना में एक प्रशिक्षु महिला सिपाही की डेंगू से मौत के बाद गुस्साए करीब 400 प्रशिक्षु सिपाहियों ने अधिकारियों को पीटा। सविता नाम की प्रशिक्षु सिपाही को तीन दिन से बुखार था। उसने छुट्टी की मांग की थी, लेकिन उसे छुट्टी नहीं दी गई। उल्टा उसे ट्रैफिक ड्यूटी पर लगा दिया गया। जब उसकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई तो साथी पुलिसकर्मी उसे अस्पताल ले गए, जहां उसकी मौत हो गई।

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सिद्धू का पाकिस्तान प्रेम

भारत में आतंक फैला रहे पाकिस्तान के प्रति जब जनता का चुना हुआ नेता कहता है कि उसे ‘पाक’ से प्रेम है, तो लोगों का गुस्सा आसमान तक पहुंचना भी असामान्य नहीं। कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू लगातार पाक के प्रति अपना प्रेम जाहिर करते हैं। उन्हें देश की एकता बनावटी लगती है और पाकिस्तान में प्रेम और शांति दिखाई देती है।
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प. बंगाल में कराहता लोकतंत्र

अप्रैल-मई 2018 में बंगाल में हुए पंचायत चुनावों में 16 हजार से ज्यादा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को निर्विरोध जीत मिली। चुनावों के दौरान करीब दो दर्जन लोगों को राजनीतिक मतभेद के चलते मौत के घाट उतार दिया गया। बंगाल में चुनावी हिंसा नई बात नहीं है। लेकिन, जिस स्तर पर यह हुआ वह चौंकाने वाला था। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ तौर पर कहा कि बंगाल में पंचायत स्तर पर लोकतंत्र काम नहीं कर रहा है। यह बेहद चौंकाने वाला है कि 58,692 ग्राम पंचायतों में से करीब 48,000 ग्राम पंचायतों में टीएमसी को जीत मिली है और इसमें भी 16000 ग्राम पंचायतों में निर्विरोध जीत मिली है। न्यायालय ने दोबारा मतदान की अपील खारिज कर दी।
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