चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया शुक्रवार को समूचा ब्रज ही दाऊजी के रंग में रंगा था। राधा रानी की ससुराल कहे जाने वाले कोसी-नंदगांव मार्ग पर स्थित जाव में भी हुरंगा हुआ।
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बठैन से बलदेव के सखा राधा रानी संग होली खेलने आए
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ब्रिज में हुरियारे
बठैन से बलदेव के सखा राधा रानी संग होली खेलने आए। उन्होंने शोभायात्रा निकालकर रंग-अबीर-गुलाल की वर्षा के बीच चौपाइयों का गायन किया। इसके बाद लठामार होली आयोजन हुआ। शाम चार बजे से ही जाव में हुरंगा की रौनक नजर आने लगी।
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गली-गली से चौपाई निकली
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हुरियारे
गली-गली से चौपाई निकल रही थी। ढप को सजाकर नाचते-गाते जाव वासी बठैन के हुरियारों का स्वागत कर रहे थे। उन पर अबीर-गुलाल बरस रहा था।सभी राधाकांत मंदिर में दर्शन करने पहुंचे। वहां उन पर अबीर-गुलाल बरसाया गया। हुरियारों के हाथ में बबूल की झामें (झाड़ियां) और खुर्रा (डंडे नुमा ढाल) था। लोक संगीत की फुहारों के साथ हुरियारे किशोरी वट पर आए। यहां कमीज, सायौ और ओढना ओढ़ और हाथों में लाठी लिए हुरियारिन स्वागत के लिए पहुंची हुई थीं। दिन ढलते ही किशोरी वट पर लठामार का रस बरसा।
हुरदंग मचाते हाथ में खुर्रा लिए हुरियारे ब्रज गोपिन के सामने आ डटे। झामों के बीच दाऊ जी की ध्वजा रखी गई ताकि गोपियां यहां तक न पहुंचे। इसके बाद गोपियों ने गारिन की बौछार सी की। जब नहीं माने तो लट्ठ बरसाने लगीं। गोल घेरे में लठामार होली का अद्भुत नजारा दिखा। आखिर ध्वजा गोपियों की हुई और चारों ओर राधा रानी की जय-जयकार हो उठी।