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Kargil Vijay Diwas 2025: पिता वतन पर कुर्बान, अब बेटे सरहदों के निगहबान, कम नहीं हुआ जज्बा

Sat, 26 Jul 2025 05:53 AM IST
अंकेश डोगरा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला

सार

Kargil Vijay Diwas 2025: आज हम आपको हिमाचल प्रदेश के उन सपूतों की कहानियां बताएंगे जिन्होंने अपने प्राण देश के लिए न्योछावर कर दिए। साल 1999 में ऑपरेशन विजय में सेना के 527 जवान बलिदान हुए। इनमें से 52 हिमाचली जवान थे। सबसे अधिक कांगड़ा के 15 जवान शामिल थे।
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Kargil Vijay Diwas 2025 - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
Kargil Vijay Diwas 2025: कारगिल में पाकिस्तान पर भारत की जीत को आज 26 साल हो गए हैं। न जोश कम हुआ है न ही जज्बा। कारगिल युद्ध में हिमाचल के 52 जांबाज बलिदान हुए। सेना में हिमाचल के सैकड़ों जवानों ने विपरीत परिस्थितियों में दुश्मन के छक्के छुड़ाए। कैप्टन विक्रम बतरा और सूबेदार मेजर संजय कुमार को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। कारगिल में देश के लिए कुर्बान हुए हिमाचल के कई जांबाजों के बेटे भी अब सरहद की निगहबानी कर रहे हैं। युद्ध में पति को खो चुकीं कई वीर नारियों ने अपने बेटों को सेना में भेज दिया है। जिस गांव के सपूत ने शहादत पाई, प्रेरित होकर उसी गांव के कई युवा सेना में भर्ती हो गए। इस जज्बे को सलाम...

52 हिमाचली जवानों के नाम कुछ इस प्रकार हैं- परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बिक्रम बतरा, कैप्टन सौरभ कालिया, ग्रेनेडियर विजेंद्र सिंह नंदलु, बलराम दास, राइफलमैन राकेश कुमार, अशोक कुमार, लांस नायक वीर सिंह बलदोआ, लखबीर सिंह, संतोष सिंह, जगजीत सिंह, हवलदार सुरेंद्र सिंह, राइफलमैन सुनील जंग, योगिंद्र सिंह, सुरजीत सिंह और लांस नायक पदम सिंह शामिल हैं। मंडी से कैप्टन दीपक गुलेरिया, नायब सूबेदार खेम चंद राणा, हवलदार कृष्ण चंद, नायक सरवन कुमार, सिपाही टेक राम मस्ताना, सिपाही राकेश कुमार चौहान, सिपाही नरेश कुमार, सिपाही हीरा सिंह, जीडीआर पूर्ण सिंह, हवलदार गुरदास सिंह। हवलदार कश्मीर सिंह(एम-इन-डी), हवलदार राजकुमार (एम-इन-डी), सिपाही दिनेश कुमार, हवलदार स्वामी दास चंदेल, सिपाही राकेश कुमार, आरएफएन प्रवीण कुमार, सिपाही सुनील कुमार, आरएफएन दीप चंद(एम-इन-डी)। हवलदार उधम सिंह, नायक मंगल सिंह, आरएफएन विजय पाल, हवलदार राजकुमार, नायक अश्वनी कुमार, हवलदार प्यार सिंह, नायक मस्त राम। जीएनआर यशवंत सिंह, आरएफएन श्याम सिंह (वीआरसी), जीडीआर नरेश कुमार, जीडीआर अनंत राम। ऊना से कैप्टन अमोल कालिया वीर चक्र, आरएफएन मनोहर लाल। सोलन (2) सोलन से सिपाही धर्मेंद्र सिंह, आरएफएन प्रदीप कुमार, सिरमौर (2) सिरमौर से आरएफएन कुलविंद सिंह, आरएफएन कल्याण सिंह (सेना मेडल) चंबा (1) सिपाही खेम राज, कुल्लू (1)  हवलदार डोला राम (सेना मेडल)
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बलिदानी प्रदीप कुमार - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
प्रदीप ने कारगिल में शहादत पाई तो पंदल गांव के 12 युवक हो गए सेना में भर्ती 
सोलन के रामशहर के पंदल के बलिदानी प्रदीप कुमार कारगिल युद्ध में देश की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज उनसे प्रेरणा लेकर गांव के बारह युवा देश की सरहदों के निगेहबान बने हैं। गांव के 12 युवाओं ने प्रदीप कुमार से प्रेरणा ली और देश के लिए कुछ भी करने की ठानी और सेना में भर्ती हो गए। नालागढ़ उपमंडल के रामशहर के पंदल गांव के 4 जेक राइफल के राइफलमैन प्रदीप कुमार (23) नौ जुलाई 1999 को बलिदान हो गए थे। प्रदीप कुमार उस समय 20 आरआर यूनिट में कुपवाड़ा में तैनात थे। भारत-पाक युद्ध शुरू होने से परिजनों की बेटे की शादी के लिए की तैयारियां भी धरी की धरी रह गईं। शहीद प्रदीप कुमार की बहन जमना कौशिक ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान नौ जुलाई 1999 को उनके भाई ने देश के लिए कुर्बानी दी थी। उन्होंने कहा कि घर में भाई की शादी की तैयारियां चल रही थीं। भाई ताबूत में लिपटकर वापस आया। जमना ने बताया कि उनके जाने के बाद गांव के युवाओं ने उनसे प्रेरणा ली और आज गांव के 12 युवा देश सेवा के लिए सरहदों पर तैनात हैं। जब भी वह छुट्टियों में घर आते हैं तो उनके भाई की शहादत को याद करते हैं। जमना ने बताया कि उनके परिवार में भी देश सेवा का जज्बा पहले से ही है। उनके पिता जगन्नाथ भी सेना से सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और 1961 और 1965 की लड़ाई लड़ चुके हैं।
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कारगिल विजय दिवस/ बलिदानी श्याम सिंह भीखटा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
कैप्टन विक्रम बतरा की टीम का हिस्सा थे बलिदानी श्याम सिंह भीखटा
चौपाल उपमंडल के कलारा गांव के सपूत राइफलमैन श्याम सिंह भीखटा ने मात्र 25 वर्ष की आयु में 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान बलिदान दिया था। कलारा में 26 जनवरी 1974 को नंद राम और देवकू देवी के घर जन्मे श्याम सिंह को बचपन से ही सेना में भर्ती होने का जुनून था। 29 दिसंबर 1994 को वह 13 जैक राइफल में भर्ती हो गए। 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठियों को कारगिल से खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया। ऑपरेशन विजय में चार्ली कंपनी की असॉल्ट टीम के सदस्य बने श्याम सिंह कंपनी के साथ परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बतरा के नेतृत्व में पांच जुलाई को कारगिल में टाइगर हिल की मशको घाटी के प्वाइंट 4875 के लिए निकले थे। बेहद खराब मौसम और विपरीत परिस्थितियों के बीच उनकी टीम आगे बढ़ रही थी। प्वांइट 4875 में बड़ी संख्या में दुश्मन छिपे थे, जिसका उन को अंदाजा नहीं था। इस दौरान घात लगाकर बैठे दुश्मनों ने भारतीय जवानों पर हमला कर दिया। अदम्य साहस का परिचय देते हुए श्याम सिंह ने एक घुसपैठिए को वहीं ढेर कर दिया, जबकि एक को घायल कर दिया। श्याम सिंह के साहस से प्रेरणा ले कर उनकी टुकड़ी के अन्य जवान भी दोगुने जोश के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ते गए। दुश्मन को खदेड़ कर उनकी टीम ने प्वाइंट विक्रम बत्रा के नेतृत्व में 4875 पर कब्जा कर लिया। चार्ली कंपनी जीत का जश्न मना भी नहीं सकी थी कि श्याम सिंह दुश्मन की एक स्नाइपर राइफल से चली गोली से बलिदान हो गए। शहीद श्याम सिंह को मरणोपरांत विशेष सेना मेडल वीर चक्र प्रदान किया गया।

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शहीद राजकुमार की वीर नारी रक्षा देवी/कारगिल शहीद हवलदार राजकुमार। (फाइल फोटो) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तीन बेटे हैं, एक ही जा पाया सेना में, नाती- पोतों को भी देश सेवा के लिए भेजूंगी : रक्षा
शहादत के 26 साल बाद भी उनकी वीर पत्नी रक्षा देवी की आंखों में गर्व है और जुबां पर संकल्प। कहती हैं कि अब नाती-पोतों को भी फौज में भेजूंगी। जब राजकुमार बलिदान हुए। तब उनके बड़े बेटे राहुल वशिष्ठ की उम्र आठ साल, दूसरे बेटे रजत की उम्र महज छह साल। छोटा बेटा रॉबिन महज चार साल का था। रक्षा देवी ने उसी समय ठान लिया था कि उनके बेटे भी सेना में जाएंगे। उसी समय बेटे रजत ने छह साल की उम्र में ही सेना में जाने का निश्चय कर लिया। आज वह भारतीय सेना में जम्मू की अग्रिम चौकी पर तैनात हैं। हालांकि, दो बेटे किन्हीं कारणों से सेना में नहीं जा सके। उनमें से बड़े बेटे राहुल वशिष्ठ घुमारवीं में पेट्रोल पंप चलाते हैं, जबकि छोटे भाई रॉबिन निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। राहुल कहते हैं कि वह खुद भी सेना में जाना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया। कहा कि जब रजत सेना में शामिल हुआ तो वो पल पूरे परिवार के लिए सबसे भावुक और गर्व भरा था। राहुल ने कहा कि जब पिता जब शहीद हुए तो उनकी उम्र बहुत कम थी, लेकिन पिता की शहादत ने उन्हें हमेशा गौरवान्वित किया। संयुक्त परिवार था तो चाचा और ताया ने कभी उन्हें परेशान नहीं होने दिया। एक चाचा तो हाल ही में सेना से सेवानिवृत हुए हैं। उन्होंने मांग की कि मोरसिंघी स्कूल और टिक्कर-कसोलियां सड़क का नाम उनके शहीद पिता राजकुमार के नाम पर किया जाए, ताकि भावी पीढ़ी को भी प्रेरणा मिलती रहे। बताते चलें कि शहीद राजकुमार के परिवार की कहानी सिर्फ बलिदान की नहीं, बल्कि संकल्प, समर्पण और संस्कार की कहानी है,जो हर कारगिल दिवस पर देश को गर्व और प्रेरणा दोनों देती है। 
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कैप्टन अमोल कालिया के घर रखी तोप/बलिदानी कैप्टन अमोल कालिया की फोटो (फाइल)। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
शहीद अमोल के घर में रखी तोप के मॉडल का मुंह पाकिस्तान की ओर
कारगिल युद्ध के बलिदानी कैप्टन अमोल कालिया की यादों को ताजा रखने के लिए परिवार ने उनकी हर चीज को सहेज कर रखा है। इसमें एक मारुति कार भी है। परिवार ने मकान की छत पर एक तोप का मॉडल भी बना कर रखा है, जिसका मुंह पाकिस्तान की तरफ किया गया है। बलिदानी कैप्टन अमोल कालिया मेमोरियल सोसायटी हर साल शहीद कै. अमोल कालिया के जन्मोत्सव और शहीदी दिवस को उत्साह के साथ मनाती है। अमोल कालिया के बड़े भाई अमन कालिया भी देश सेवा में तत्पर हैं। वह वायु सेना में बतौर ग्रुप कैप्टन तैनात हैं और इस वक्त राजस्थान के सूरतगढ़ में सेवाएं दे रहे हैं। खास है कि अमोल कालिया और अमन कालिया का कमीशन वर्ष 1995 में हुआ था। कारगिल युद्ध में अमन कालिया ने अपने छोटे भाई को खो दिया। अमोल कालिया मूलत: ऊना जिले के चिंतपूर्णी के थे और उनका परिवार नया नंगल पंजाब में रहता है। अमोल कालिया और अमन कालिया के बाद अगली पीढ़ी भी सेना में जाने की तैयारी में है। शहीद कैप्टन अमोल कालिया को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने करीब साढ़े तीन साल भारतीय सेना में सेवाएं दी। कैप्टन अमोल कालिया के पिता सतपाल कालिया का कहना है कि हाल ही में भारत की ओर से किए ऑपरेशन सिंदूर में सेना ने शानदार कार्य किया। डॉ. कालिया कहते हैं कि अब उम्र हो गई है, लेकिन बेटे की बहादुरी से सीना चौड़ा हो जाता है। अमोल कालिया स्वामी विवेकानंद को अपना अपना आदर्श मानते थे और बलिदान के समय पर भी उनके पार्थिव शरीर से उनकी जेब से स्वामी विवेकानंद का प्रेरक संदेश मिला था। उसमें लिखा था ..विश्वास करो कि तुम महान हो और महान कार्यों के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम कुत्तों के भौंकने से न डरो, न ही बिजली के गड़गड़ाने से घबराओ, उठो काम करो, तुम्हारे देश को वीर नायक चाहिए। वीर बनो चट्टान की तरह स्थिर रहो। सत्य की सर्वदा विजय होती है। बहादुर बनो, बहादुर बनो... मनुष्य केवल एक ही बार मरता है, विद्युतीय संचार से नवप्राण भर दो।
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बलिदानी डोला राम की फोटो (फाइल)/बलिदानी डोला राम का सम्मारक। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बलिदानी डोला राम आज भी युवाओं के हीरो, नित्थर के 20 जवान सेना में
कारगिल युद्ध के दौरान कुल्लू से एकमात्र नित्थर उपतहसील के गांव शकरोली के बलिदानी डोला राम आज भी युवाओं के लिए हीरो हैं। उनके बलिदानी होने के बाद अब तक क्षेत्र से बीस युवा में सेना में जा चुके हैं। बलिदानी डोला राम की पत्नी प्रेमा देवी बताती हैं कि देश प्रेम उनकी नस-नस में भरा था और बलिदान होकर देश के लिए अपना कर्ज भी चुका गए। आज बलिदानी के बेटे अश्वनी कटोच और अंकुश कटोच अपना व्यवसाय कर रहे हैं। वे केंद्र सरकार से जो सुविधा मिल रही है, इससे संतुष्ट हैं। बलिदानी डोला राम की देश के प्रति समर्पण को भावना को देखते हुए नित्थर क्षेत्र से तब से लेकर अभी तक बीस से ज्यादा जवान सैनिक बन चुके हैं और अभी भी सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। क्षेत्र का हर युवा सेना में जाना चाहता है। डोला राम के छोटे भाई स्वर्ण कटोच का कहना है कि डोला राम अच्छे बॉक्सर थे। उस समय इतनी सुविधा गांव के स्कूल में नहीं थी। उनकी रुचि स्पोर्ट्स में बहुत थी। मैं खुद कबड्डी में स्टेट और नेशनल खेला हूं। माता का देहांत 2002 में हुआ। मुझे मेरे भाई की वजह से काफी सम्मान मिला है l डोला राम के चाचा के लड़के पूर्व सैनिक हीरा सिंह कटोच ने बताया कि बलिदानी डोला राम की रुचि सेना में जाने की थी। कारगिल युद्ध के दौरान सियाचिन की चोटी पर दुश्मनों की टोह लेने के लिए सैनिक डोला राम को भेजा गया। ऑपरेशन विजय के दौरान डोला राम और उनके साथी अपनी टुकड़ी को चोटी पर पहुंचाने के लिए सबसे आगे जाकर रास्ता बना रहे थे। उन्हें सियाचिन की चोटी पर पहुंच कर दुश्मनों की तमाम जानकारी अपनी सेना की टुकड़ी तक पहुंचानी थी। इसी बीच शहीद डोला राम की नजर बंकर में छिपे घुसपैठियों पर पड़ी। इसके बाद डोला राम ने अपने साथियों के साथ आतंकियों को बंकरों में घुसकर मारना शुरू किया। छाती पर पांच गोलियां खाने के बावजूद डोला राम और उनके साथियों ने बलिदान होने से पहले 17 आतंकियों को मार गिराया था।
 
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कारगिल विजय दिवस/बलिदानी लांस नायक नंद लाल (फाइल फोटो) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
लांस नायक नंद लाल ने दिया बलिदान, अब बेटे ने कैप्टन बनकर बढ़ाया मान
कारगिल युद्ध के बलिदानी जोगिंद्रनगर की नौहली पंचायत के बतनाहर गांव के लांस नायक नंद लाल की पत्नी मनोरमा ने अपने बेटे रोहित को भारतीय सेना में कैप्टन बनाकर क्षेत्र का मान बढ़ाया है। वह राजस्थान के जोधपुर में अग्रिम मोर्चे पर तैनात हैं। शहीद की पत्नी ने विकट परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और अपने संघर्ष से बेटे को इस मुकाम पर पहुंचाया। कैप्टन रोहित कुमार की मां मनोरमा देवी ने बताया कि जब उनके बलिदानी पति जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में 7 डोगरा यूनिट की बटालियन में अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे, तभी आतंकवादियों की ओर से बिछाए गए बारूद में हुए ब्लास्ट से गंभीर रूप में घायल होकर उन्होंने देश के लिए जब सर्वोच्च बलिदान दे दिया। तब उनके बेटे रोहित की उम्र महज छह साल की थी। बेटी अंजना भी तीन साल की थी। पति के बलिदान होने परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वह स्तब्ध थी, लेकिन अपने जीवन के संघर्ष को निर्धारित लक्ष्य को चुनौती मानकर उन्होंने जैसे तैसे बेटे की परवरिश की और 2013 में भारतीय सेना में भर्ती करवाकर अपने जीवन की पहली मंजिल को हासिल किया। मनोरमा देवी बताती हैं कि उन्होंने बेटे को सेना के उच्च ओहदे तक पहुंचाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। 2022 में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बने उनके बेटे रोहित को आज भारतीय सेना में कैप्टन बनकर बेटा देश की सेवा में अग्रिम मोर्चे पर देखकर वह गर्व महसूस कर रही है। शहीद नंद लाल की पत्नी मनोरमा ने बताया कि उन्होंने अपने पति की पेंशन से एक और जहां बेटी अंजना की पढ़ाई पूरी की। वहीं बेटे को भी भारतीय सेना में अफसर बनाया। बेटी की शादी भी एक साल पहले हो गई।

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बलिदानी कैप्टन सौरभ कालिया (फाइल फोटो) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पहले बलिदानी कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों को आज भी इंसाफ का इंतजार
कारगिल युद्ध के प्रथम बलिदानी कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों को अभी भी बेटे की अमानवीय यातनाओं से हुई मौत के मामले में न्याय नहीं मिला है। परिजनों को इस बात का मलाल है कि भारत सरकार अभी तक न पाकिस्तान और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके बेटे का मुद्दा उठा सकी। कोरोना के बाद अभी तक सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले की कोई सुनवाई नहीं हुई है। हालांकि, परिजनों ने आस नहीं छोड़ी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में पिछले करीब पांच साल से एक बार भी सुनवाई न होने से विश्वास डगमगाता दिख रहा है। परिजनों की मानें तो जब तक विदेश मंत्रालय इस मामले को पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं उठाता, तब तक इंसाफ की उम्मीद कम दिखती है। अपने बलिदानी बेटे के मामले में इंसाफ न मिलता देख पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया का दर्द कारगिल विजय दिवस पर फिर से छलका है। कहा कि भारत के विदेश मंत्रालय को चाहिए कि यह मामला पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती के साथ रखे। अभी तक ऐसा न होने से करीब ढाई दशक से परिजन परेशान हैं। कैप्टन सौरभ कालिया का मामला अभी तक सुप्रीम कोर्ट में चला हुआ है, लेकिन वहां पर भी कोरोना के बाद इस मामले की कोई सुनवाई नहीं हुई है। 1999 में हुए कारगिल युद्ध में बलिदानी हुए कैप्टन सौरभ कालिया को पाकिस्तान सेना ने अमानवीय यातनाएं दी थी। कालिया के अंगों को क्षत-विक्षत कर दिया गया है। उनके शरीर पर सलाखों के निशान थे। इस पर कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों ने आपत्ति जताई थी। कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच अन्य दोस्त कारगिल में पाकिस्तान सेना की टोह में निकले थे, लेकिन बाद में उनके शव क्षत विक्षत हालत में मिले थे। बलिदानी कैप्टन सौरभ कालिया के पिता डाॅ. एनके कालिया का कहना है कि जब तक विदेश मंत्रालय पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे को मजबूती से नहीं उठाता, तब तक इंसाफ मिलने की उम्मीद कम लगती है। कहा कि दुख इस बात का है कि भारत सरकार इस मामले में अभी तक कुछ नहीं कर पाई।

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कारगिल बलिदानी स्वामी दास चंदेल/ बलिदानी स्वामी दास चंदेल का बेटा रजनीश चंदेल। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बेटे की जिद के आगे मानी मां, सरहद पर कारगिल बलिदानी का बेटा
तीन जुलाई 1999। तीन बच्चों के सिर से जब बाप का साया छिना तो मां किरना देवी अंदर तक टूट गई। बेटा जवान हुआ तो उसने भी कारगिल बलिदानी पिता स्वामी दास चंदेल की तरह ही सेना की राह पकड़ी। ग्रिनेडियरर रेजिमेंट के जबलपुर सेंटर में भर्ती की सूचना मिली तो बेटा रजनीश सेना में शामिल होने की जिद करने लगा। मां किरना देवी ने पहले तो मना किया, लेकिन बेटा नहीं माना। अपने नाना सेना से सेवानिवृत्त हुए रावण राम के जरिये मां को मनाकर रजनीश भी देश की सेवा के लिए सेना में भर्ती हो गए। यह कहानी हमीरपुर के बगबाड़ा पंचायत के समलेड़ा गांव के कारगिल बलिदानी स्वामी दास चंदेल के परिवार की है। इस परिवार की तीन पीढ़ियां सेना से जुड़ी हैं। स्वामी दास के पिता कांशी राम भी चार ग्रिनेडियर में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए। अब बेटा रजनीश 12 ग्रनेडियर में सेवाएं दे रहा है। वर्तमान में वह श्रीनगर में तैनात हैं। बलिदानी स्वामी दास के बड़े भाई भी सेना से सेवानिवृत्त हुए हैं। भतीजा वायु सेना में सेवाएं दे रहा है। बलिदानी के बड़े बेटे मनीष चंदेल ने बताया कि जब कारगिल युद्ध में तीन जुलाई 1999 को उनके पिता बलिदान हुए, तो बड़ी बहन दसवीं कक्षा में, वह स्वयं नौवीं कक्षा में और उनका छोटा भाई रजनीश तीसरी कक्षा में पढ़ता था। मां किरना देवी कहती हैं कि बेटे रजनीश ने जब होश संभाला तो वह सेना भर्ती की तैयारी में जुट गया। उसे स्नातक की पढ़ाई के लिए कॉलेज में प्रवेश दिलाया, लेकिन उसने सेना में जाने का मन बना लिया था और द्वितीय वर्ष में जबलपुर में भर्ती के लिए जाने की जिद की। पहले तो मना कर दिया, लेकिन जब रजनीश के नाना ने समझाया तो बेटे को देश सेवा में जाने से नहीं रोका। आज जब भी युद्ध के हालत होते हैं, तो दिल सहम जाता है। सरकार ने शहादत के वक्त किए हर वादे को पूरा किया है, लेकिन अपनों की कमी हमेशा खलती है। पति के बलिदान पर गर्व है। जिले के अंदराल ऊहल गांव के बलिदानी सैनिक दिनेश कुमार के पिता कैप्टन भूप सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि बेटे के बलिदान की याद से आज भी सीना चौड़ा हो जाता है। वर्ष 1971 में खुद जंग लड़ी है। उन्होंने कहा कि मौत हर किसी को आनी है, लेकिन सरहद पर देश के लिए कुर्बान होने का सौभाग्य सभी को नहीं मिलता है। मैं खुद वर्ष 1994 में सेना से सेवानिवृत्त हुआ और वर्ष 1997 में दिनेश पंजाब रेजिमेंट में भर्ती हुआ। जब भी उसके नाम के स्कूल की पटि्टका को देखता हूं फख्र होता है। बलिदानी का भाई राकेश कुमार भी सेना से वर्ष 2009 में सेवानिवृत्त हुए हैं। 17 जून 1999 को बलिदान हुए दिनेश की पार्थिव देह को बलिदानी का भाई ही घर लेकर आया था।

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बलिदानी अनंत राम (फाइल फोटो)। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बलिदानी अनंत राम के नाम से स्कूल का करने नामकरण में लगे 25 साल
उपमंडल सुन्नी के भराड़ा गांव के 18 ग्रेनेडियर के अनंत राम ने महज 23 वर्ष की आयु में कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था लेकिन उनके नाम पर भराड़ा उच्च विद्यालय का नामकरण करने में सरकार को 25 साल का लंबा समय लग गया। उनके चचेरे भाई पूर्ण सिंह ने बताया कि तत्कालीन सरकार ने भराड़ा के उच्च विद्यालय का नाम बलिदानी के नाम पर करने की घोषणा की थी, लेकिन 25 वर्षों तक यह घोषणा पूरी नहीं हो पाई। तीन महीने पहले भराड़ा उच्च विद्यालय का नाम बलिदानी अनंत राम राजकीय उच्च विद्यालय रखा गया है। बलिदानी के नाम पर स्कूल का नामकरण होने से परिवार को संतोष है लेकिन घोषणा को इतना लंबा समय लगने पर रोष भी है। उन्होंने बताया कि बलिदानी अनंत राम 20 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए और तीन वर्षों तक सेवाएं देने के बाद देश की रक्षा करते हुए वह बलिदान हो गए।
 
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कारगिल विजय दिवस/बलिदानी विक्रम बत्रा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बचपन से ही देश सेवा की बातें करते थे विक्रम बतरा
कारगिल के हीरो बलिदानी कैप्टन विक्रम बतरा के पिता जीएल बत्रा ने कहा कि बेटा शुरू से ही देश सेवा की बातें करता था। वह सेना में ही जाना चाहता था। उन्होंने 23 साल की उम्र में कंबाइड डिफेंस सर्विस (सीडीएस) की परीक्षा पास कर सपना पूरा कर लिया। 1997 में आईएमए देहरादून से पासआउट हुए विक्रम बतराअपनी यूनिट 13 जैक राइफल में चले गए। कारगिल के युद्ध में हर मोर्चे पर रहने वाले विक्रम बतरा सात जुलाई 1999 को देश की सरहदों की रक्षा करते 4875 चोटी पर बलिदान हो गए थे। विक्रम बत्रा की प्रारंभिक शिक्षा पांचवीं तक डीएवी स्कूल पालमपुर में हुई। इसके बाद उन्होंने जमा दो तक की पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय पालमपुर से ही की। उन्होंने सेना में जाने का पूरा मन बनाया और वह सेना में चले गए। विक्रम बतरा के जुड़वां भाई विशाल बतरा हैं। विक्रम बत्रा अपने भाई से 14 मिनट बड़े हैं। लिहाजा, विक्रम बत्रा को घर में लव और विशाल को कुश कहा जाता था। विशाल  एक निजी बैंक में अधिकारी हैं। विक्रम बत्रा की शहादत और उनके जज्बे को देख बॉलीवुड ने उनके जीवन पर शेरशाह फिल्म बनाई थी। जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था।
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