कृषि कानूनों को रद्द कराने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसानों ने शुक्रवार को भारत बंद का फैसला लिया। चार महीने और 11 दौर की बातचीत के बाद भी न सरकार मान रही है और न किसान। जनवरी के बाद से बातचीत का दौर भी थमा हुआ है। सरकार किसानों से बातचीत नहीं कर रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार भारत बंद के बाद भी न मानी तो क्या होगा। सूत्रों के अनुसार, अगर सरकार न झुकी तो किसान बड़ा फैसला ले सकते हैं। शुक्रवार के भारत बंद को जहां पंजाब में पूरा समर्थन मिला वहीं हरियाणा में इसका मिला जुला असर दिखा। अब किसान नेताओं का कहना है कि कृषि कानून रद्द कराने के बाद ही हम वापस जाएंगे। चार महीने से किसान हाईवे पर डटे हैं। किसानों व सरकार के बीच कई बार बातचीत हो चुकी है। गृहमंत्री अमित शाह भी किसानों से वार्ता कर चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक कोई हल नहीं निकल सका है। सरकार को किसानों की ताकत का अंदाजा नहीं है।
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भारत बंद के दौरान चंडीगढ़ में सड़क पर बैठे किसान।
- फोटो : अमर उजाला
किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी, राकेश टिकैत समेत कई नेता पहले से बड़े फैसले के पक्ष में खड़े थे, वहीं अब अन्य कई संगठनों के नेता भी उस पर सहमति दे रहे हैं। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा ने साफ कर दिया है कि भारत बंद की समीक्षा के लिए बैठक की जाएगी। इसके बाद ही आंदोलन की अगली रणनीति बनाई जाएगी।
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हरियाणा में भारत बंद
- फोटो : अमर उजाला
अब किसान संगठनों में संसद कूच से लेकर अन्य नेशनल हाईवे जाम करने सहित कई कड़े निर्णय लेने पर चर्चा चल रही है। सरकार से बातचीत का प्रस्ताव नहीं मिलने के कारण किसानों का धैर्य भी खत्म होता जा रहा है।
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चंडीगढ़ में दुकानें बंद करवाते किसान।
- फोटो : अमर उजाला
दूसरी ओर फसल कटाई का काम भी शुरू हो गया है। ऐसे में किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर रोकना किसान नेताओं के लिए मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दो महीने बाद भारत बंद का बड़ा फैसला लिया गया।
भारत बंद के दौरान सड़कों पर बैठे किसान।
- फोटो : अमर उजाला
आंदोलन लंबा हो रहा है और किसानों का धैर्य भी जवाब देने लगा है। किसान अपना हक लेने के बाद ही घर में कदम रखेगा। सरकार इसलिए बातचीत नहीं कर रही है, ताकि किसान परेशान होकर वापस चला जाए। यह सरकार की गलतफहमी है। किसानों को बड़ा फैसला लेना होगा और संयुक्त किसान मोर्चा के अधिकतर संगठन इस पक्ष में खड़े हो रहे हैं। - गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष भाकियू हरियाणा